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त्रिपुरा में ईसाई आदिवासियों का एसटी दर्जा समाप्त करने को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने निकाली रैली

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न्यूज़ डेस्क  
त्रिपुरा में ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके आदिवासियों का अनुसूचित जनजाति दर्जा समाप्त करने की मांग करते हुए हिंदूवादी संगठन जनजातीय सुरक्षा मंच  यानी जेएसएम ने मंगलवार को अगरतला के विवेकानंद स्टेडियम में एक मेगा रैली निकाली, जिसमें हजारों महिला एवं युवा आदिवासी शामिल हुए।

जेएसएम केंद्रीय समिति के सदस्य प्रकाश सिंह उइके ने सभा को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि जिन मापदंडों के आधार पर किसी समुदाय को सरकारी कार्यक्रमों का लाभ प्रदान करने के लिए एसटी का दर्जा दिया जाता है, उसके आधार पर ईसाई कभी भी एसटी नहीं हो सकते हैं। एक समुदाय को कुछ मापदंडों के आधार पर ही आदिवासी का दर्जा दिया जाता है।

 उइके ने कहा कि किसी समुदाय को एसटी की सूची में शामिल करने के पीछे मुख्य कारण यह सुनिश्चित करना है कि समुदाय की सांस्कृतिक एवं पारंपरिक प्रथाओं को संविधान द्वारा प्रदान किए गए सुरक्षात्मक उपायों द्वारा संरक्षित किया जाए। उन्होंने कहा, “अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित होता है, तो वह व्यक्ति या तो स्वेच्छा से या किसी ऐसे व्यक्ति से प्रभावित होता है जो पूरी तरह से अलग धर्म का पालन करता है और निश्चित रूप से उसे सांस्कृतिक प्रथाओं का पालन करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए उन्हें एसटी का दर्जा नहीं मिलना चाहिए।” उन्होंने कहा कि यह मांग कोई नयी नहीं है और यह केवल पूर्व सांसद स्वर्गीय कार्तिक उरांव की विरासत को आगे बढ़ा रही है, जिन्होंने पहली बार संसद में इस मुद्दे को उठाया था।

इस संबंध में प्रस्तुत किए गए विधेयक की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था। विधेयक का सार यह था कि अगर कोई एसटी संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार अन्य धर्मों में परिवर्तित होता है तो वह अपने संवैधानिक अधिकारों को खो देता है, तो अनुच्छेद 342 में ऐसी कोई बाध्यता क्यों नहीं होगी जो एसटी से संबंधित है।

विपक्षी टिपरा मोथा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस ने आदिवासियों के एसटी दर्जा समाप्त करने की मांग का विरोध किया और कहा कि भाजपा समाज को और बांटने के लिए विभाजनकारी राजनीति का सहारा ले रही है। माकपा के राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी ने आरोप लगाया कि पहले समाज को हिंदू और मुस्लिम में विभाजित किया गया, फिर आदिवासी और गैर-आदिवासी में और अब भविष्य पर इसके प्रभाव पर विचार किए बिना और वोट बैंक की राजनीति के लिए हिंदू और ईसाई धर्म के आधार पर आदिवासियों में विभाजित किया जा रहा है।

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