बिहार में इन दिनों कानून-व्यवस्था का एक बेहद आधुनिक, चमचमाता और खौफनाक ‘सॉफ्टवेयर’ लॉन्च हुआ है। इस सॉफ्टवेयर के मुख्य प्रोग्रामर, विधाता और सूबे के मुखिया आदरणीय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जिनके राज में न्याय की गति इतनी बुलेट ट्रेन मार्का हो चुकी है कि अब अदालत, तारीख, गवाह, वकील और दलील जैसी औपनिवेशिक रूढ़ियों की कोई जरूरत ही नहीं बची है। पुराना कानून कहता था कि ‘जब तक गुनाह साबित न हो, तब तक हर कोई बेगुनाह है’, लेकिन सम्राट बाबू के नए डिजिटल सुशासन का मूलमंत्र बदल चुका है कि अगर तुम सिस्टम के सामने मुंह खोलोगे, तो हम सीधे तुम्हारा अकाउंट ही क्लोज कर देंगे। इस त्वरित ‘ठोक दो’ न्याय प्रणाली का ताजातरीन और रूह कंपा देने वाला शिकार बना है भोजपुर जिले के शाहपुर का 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी। यह सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं है, बल्कि फेसबुक लाइव के कैमरों के सामने घुटने टेक चुके एक निहत्थे युवक को घेरकर सरकारी गोली का शिकार बना देने की वह दास्तान है, जिसने बिहार के प्रशासनिक ढांचे के अमानवीय चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
मुख्यमंत्री साहब के ‘रामराज्य’ का इकबाल देखिए कि जो 28 साल का लड़का भोजपुर के शाहपुर, बिलौटी और उसके आसपास के दर्जनों गांवों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण बना हुआ था, वह जिला प्रशासन के लिए रातों-रात दाऊद इब्राहिम से भी बड़ा ‘इंटरनेशनल थ्रेट’ बन गया। भरत का सबसे बड़ा संगीन जुर्म यह था कि वह किसी लाचार बूढ़ी दादी का हाथ पकड़कर ब्लॉक दफ्तर पहुंच जाता था और उसकी वृद्धावस्था पेंशन मंजूर कराए बिना वहां से हिलता नहीं था। बेसहारा लोगों का राशन कार्ड बनवाना, कोटेदार की कालाबाजारी के खिलाफ सीधे एसडीएम के दफ्तर में फाइल पटक देना, और इलाके की बदहाल टूटी सड़कों, अंधेरे में डूबे खंभों तथा बूंद-बूंद पानी को तरसते विस्थापितों के हक के लिए सीधे सिस्टम के हलक में हाथ डाल देना ही उसका असली क्राइम ग्राफ था। वह आए दिन भ्रष्ट अधिकारियों से भिड़ जाता था और उनकी सुख-सुविधाओं में खलल डालता था। आज भोजपुर के उन तमाम प्रभावित गांवों में जो मातम पसरा है, जो हजारों का हुजूम सड़कों पर छाती पीटकर रो रहा है, वह किसी बाहुबली या माफिया के लिए नहीं उमड़ा है। वे हजारों आंखें अपने उस भाई, बेटे और मसीहा के लिए रो रही हैं, जो उनके अधिकारों के लिए सरकारी बाबू की टेबल पर मुक्का मारना जानता था। जिन घरों के चूल्हे भरत की पैरवी के कारण मिलने वाले राशन से जलते थे, आज उन चूल्हों में सिर्फ आंसुओं का धुआं है।
अन्य माध्यमों और ग्राउंड जीरो से छनकर जो कड़वी हकीकत सामने आई है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। इस खूनी खेल की पटकथा दो दिनों तक लिखी गई। पहले दिन (मंगलवार) की काली रात को पुलिस अचानक भारी दलबल, अत्याधुनिक हथियारों और भारी पुलिस फोर्स के साथ भरत तिवारी के पैतृक घर पर धमकती है। किसी पेशेवर अपराधी या खूंखार अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी की तरह उसके पूरे घर को चारों तरफ से घेर लिया जाता है। घर के भीतर मौजूद बूढ़े मां-बाप और परिजन सहम जाते हैं। पुलिस का रवैया बेहद तल्ख, हिंसक और डराने वाला था। भरत को जैसे ही इस बात का अहसास हुआ कि स्थानीय प्रशासन और कुछ रसूखदार माफिया मिलकर उसकी जान के पीछे पड़े हैं और पुलिस किसी कानूनी कार्रवाई के लिए नहीं बल्कि उसका ‘काम तमाम’ करने के इरादे से आई है, वह अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागा। लेकिन खाकी का जाल पहले से बिछ चुका था।
बात सिर्फ उस एक रात की नहीं थी, यह मानसिक प्रताड़ना और घेराबंदी अगले दिन (बुधवार) की सुबह तक जारी रही, जब जिला पुलिस के साथ एसटीएफ (STF) की भारी टुकड़ियों ने पूरे इलाके को एक अभेद्य किले में तब्दील कर दिया। बुधवार सुबह जब यह अंतिम प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हुई, तब कानून के राज के इतिहास में वह काला अध्याय दर्ज हुआ जिसने सबको झकझोर दिया।
इस पूरी पटकथा की सबसे रोमांचक और शर्मनाक कड़ी पुलिस का वह सरकारी बयान है, जिसे सुनकर न्यूटन और आइंस्टीन भी अपनी कब्र में करवट बदल लें। जब चारों तरफ थू-थू होने लगी और स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश ज्वालामुखी बनकर फटने लगा, तो सम्राट चौधरी की हाई-टेक पुलिस ने अपनी लाज बचाने के लिए एक और मास्टरस्ट्रोक मारा और बड़े ही दार्शनिक अंदाज में बयान जारी कर दिया कि लड़का मानसिक रूप से अस्वस्थ था। कमाल का विश्लेषण है हुजूर, जो लड़का सैकड़ों पीड़ितों को उनका हक दिलवाने के लिए पंचायती राज व्यवस्था से लेकर सरकारी नियमावलियों की एक-एक धारा को उंगलियों पर नचाता था, वह अचानक मुख्यमंत्री जी की पुलिस के लिए पागल हो गया। और चलिए, अगर दो पल के लिए मान भी लें कि वह लड़का डिप्रेशन या किसी मानसिक तनाव में था और फेसबुक पर कुछ गुस्से में लिख रहा था, तो सम्राट बाबू की संवेदनशील सरकार की जिम्मेदारी क्या बनती थी, उसे किसी अच्छे डॉक्टर के पास भेजना या उसकी काउंसलिंग कराना? लेकिन नहीं, सुशासन बाबू के सिपहसालारों के पास डॉक्टरों से ज्यादा सटीक और अचूक इलाज सीधे सरकारी असलाहखाने में मौजूद है; डिप्रेशन का ऐसा मुकम्मल इलाज कि मरीज हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो जाए।
इसके बाद पुलिस बड़े गर्व से कहती है कि उन्होंने आत्मरक्षा में पैर पर गोली मारी थी। हुजूर, कानूनन पुलिस को घुटने से नीचे गोली मारने का अधिकार आत्मरक्षा में सिर्फ काबू पाने के लिए होता है, जान लेने के लिए नहीं। लेकिन सुशासन की यह कैसी त्वरित व्यवस्था है कि पैर में लगी एक सरकारी गोली भी अस्पताल पहुँचते-पहुँचते युवक के जीवन की आखिरी सांस को ही छीन लेती है?
और इस पूरे थियेटर का सबसे बड़ा सस्पेंस तो खुद भरत तिवारी छोड़ गए, जिन्होंने मरते-मरते भी मुख्यमंत्री जी की स्क्रिप्ट की धज्जियां उड़ा दीं। बुधवार सुबह जब यह घेराबंदी अंतिम दौर में थी, तब वह लड़का फेसबुक पर लाइव था और पूरी दुनिया ने अपनी नंगी आंखों से देखा कि कैसे उस निहत्थे युवक ने पुलिस के सामने अपना हथियार नीचे फेंक दिया और दोनों हाथ उठाकर सरेंडर कर दिया। वह बार-बार गुहार लगा रहा था, अपनी जान की भीख मांग रहा था और आत्मसमर्पण कर रहा था। लेकिन पुलिस को तो शायद ऊपर से टारगेट पूरा करने का अल्टीमेटम मिला था, इसलिए सरेंडर कर चुके और घुटने पर आ चुके युवक पर इस तरह बल प्रयोग करना वीरता नहीं बल्कि वर्दी की आड़ में की गई क्रूरता है। आपकी व्यवस्था ने उस दिन सिर्फ भरत को नहीं मारा, बल्कि उस लाइव कैमरे पर सुशासन के बचे-खुचे भ्रम को भी हमेशा के लिए दफन कर दिया।
इस बर्बर घटना के बाद जब भरत तिवारी के घर का आंगन चीत्कारों से गूंज उठा, तो माता-पिता का दर्द फूट पड़ा। लाचार मां ने बिलखते हुए कहा, “मेरा बेटा चोर-डकैत नहीं था। उसने किसी की जेब नहीं काटी, किसी की जमीन नहीं हड़पी। उसका कसूर बस इतना था कि वह गरीब माताओं और बहनों के हक के लिए राशन दफ्तर में अधिकारियों से लड़ जाता था। जब पुलिस मेरे घर आई, तो ऐसा लग रहा था कि किसी बड़े डकैत को पकड़ने आई हो। मेरा बेटा डर गया था कि ये लोग उसे मार डालेंगे, और अंततः वही हुआ। पुलिस ने मेरे लाल को घेरकर, तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतार दिया। बाबू, सरकार से पूछो कि क्या गरीबों की मदद करना अब बिहार में फांसी की सजा बन गया है? मुझे मेरा बेटा वापस चाहिए, ये सुशासन नहीं, यमराज का राज है।” वहीं, टूट चुके पिता ने भरभराते गले से आक्रोश जताते हुए कहा, “भरत हमेशा कहता था कि पिताजी, अगर हम सीधे रास्ते से चलेंगे तो ये भ्रष्ट अधिकारी गरीबों को खा जाएंगे। वह उनके हक के लिए लड़ता था। पुलिस का कहना है कि मुठभेड़ के दौरान स्थिति ऐसी बनी, यह सरासर झूठ है। सोशल मीडिया पर सबने देखा कि उसने अपने हाथ खड़े कर दिए थे। वह सरेंडर कर रहा था। पुलिस चाहती तो उसे गिरफ्तार कर जेल भेज देती, अदालत में केस चलाती। लेकिन अधिकारियों को डर था कि अगर भरत जेल से बाहर रहा, तो उनके भ्रष्टाचार की कई और पोल खोलेगा। यह कोई सामान्य कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सोची-ऐसी राजनीतिक और प्रशासनिक हत्या है।”
अब जब हजारों की संख्या में रोती-बिलखती जनता सड़कों को जाम कर चुकी है और विपक्ष के नेता मुआवजे के चेक और फैक्ट-फाइंडिंग कमेटियों के साथ दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने तरकश से वो सबसे पुराना, जंग लगा और घिसा-पिटा तीर निकाला है जिसे उच्च स्तरीय न्यायिक जांच का आदेश कहते हैं। वाह मुख्यमंत्री जी, गजब का न्याय है, एक सेवानिवृत्त जज साहब अब आराम से चश्मा लगाकर फाइलों के पन्ने पलटेंगे और गवाहों को समन भेजेंगे, जबकि पूरी हकीकत सोशल मीडिया पर करोड़ों लोग लाइव वीडियो में पहले ही देख चुके हैं। इस जांच की टाइमलाइन तब तक चलेगी जब तक लोग इस मामले को भूल न जाएं या कोई नया मामला सुर्खियां न बन जाए। सिस्टम का क्रूर मजाक यहीं खत्म नहीं होता; एक तरफ आप जांच का नाटक रचते हैं, और दूसरी तरफ अपनी खाकी का रौब दिखाने के लिए मृतक भरत तिवारी के बूढ़े, रोते-बिलखते पिता और सगे भाई पर ही एफआईआर दर्ज कर देते हैं कि उन्होंने अपने बेटे की लाश सड़क पर रखकर न्याय क्यों मांगा और रास्ता क्यों जाम किया। यानी आपकी पुलिस बेटे की जान भी ले लेगी और अगर बाप रोएगा, तो आप उसे जेल में भी डाल देंगे।
सम्राट चौधरी जी, सत्ता की मखमली कुर्सी पर बैठकर, माथे पर बड़ा सा साफा बांधकर बयानों की कलाबाजी करना और प्रेस कॉन्फ्रेंस में कानून का पाठ पढ़ाना बेहद आसान होता है। लेकिन कभी पटना के एलीट कमरों से बाहर निकलकर भोजपुर के उन सुदूर गांवों की धूल फांकिए, जहां आज हजारों लोग भूखे पेट सिर्फ इसलिए रो रहे हैं क्योंकि उनका भरत अब कभी लौटकर नहीं आएगा। आप खौफ का यह नया मॉडल बिहार में लाकर अपनी पीठ तो थपथपा सकते हैं, लेकिन इसे सुशासन का नाम देकर उस पीड़ित इलाके की जनता की समझदारी और उनके आंसुओं का क्रूर मजाक मत उड़ाइए। अदालतें भले ही आपकी सरकारी फाइलों और बंद लिफाफों का इंतजार करें, लेकिन जनता की अदालत में लाइव कैमरे के सामने आपकी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का असली, हिंसक और बेनकाब चेहरा पूरी तरह से नंगा हो चुका है। अब जवाब देते नहीं बनेगा हुजूर, क्योंकि कैमरे झूठ नहीं बोलते, भले ही आपकी पुलिस और फाइलें कितना भी झूठ बोल लें। भोजपुर के इन आंसुओं और लाइव कैमरे पर बहे खून का हिसाब तो आपको इस जन-अदालत में देना ही होगा। – निमिषा सिंह ( लेखिका)


