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बीजेपी अगले चुनाव में नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे को सबक सिखाने में जुटी !

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अखिलेश अखिल 
वैसे तो बीजेपी के रडार पर सीधे कांग्रेस है लेकिन बीजेपी के लिए सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बने हुए हैं। आगामी चुनाव में बीजेपी का लक्ष्य यही है कि चाहे जैसे भी हो इन  सबक सिखाया जाए। इसके लिए बीजेपी पैमाने पर तैयारी कर रही है। बीजेपी अगले चुनाव में 50 फीसदी प्लस वोट बैंक तैयार करने में जुटी है और इसके लिए वह अपने गढ़ों  को तो मजबूत कर ही रही है ,साथ ही विपक्षी दलों के मजबूत गढ़ में भी सेंध लगाने में जुट गई है।              
   बीजेपी की प्लानिंग खासकर महाराष्ट्र और बिहार को लेकर कुछ ज्यादा ही है। पिछले चुनाव  महाराष्ट्र में बीजेपी  ने शिवसेना के साथ मिलकर प्रदेश की 48 लोकसभा सीटों में से 41 पर जीत हासिल की थी। आज उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना इंडिया गठबंधन में शामिल है। इसलिए बीजेपी एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना और अजित पवार के साथ मिलकर महाराष्ट्र की सभी 48 सीटों पर जीत हासिल करने की रणनीति पर काम कर रही है। बीजेपी के नेता कहते हैं कि कहने के लिए आप कुछ भी कहिये लेकिन चुनाव के बाद जो परिणाम आएंगे उसे देखने की जरूरत है। बीजेपी का कहना है कि महाराष्ट्र में हम उद्धव शिवसेना की सीट पर भी जीत हासिल करेंगे   और हमारे टारगेट पर भी वही सीटें है। 
     इस तरह बीजेपी ने बिहार में 2019 में जेडीयू और लोजपा के साथ मिलकर राज्य की 40 सीटों में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन आज 16 सीटें जीतने वाले नीतीश कुमार विपक्षी खेमे में हैं। बीजेपी  नीतीश कुमार के वोट बैंक एवं सांसदों में सेंध लगाने के साथ ही जमीनी स्तर पर जातीय समीकरणों को साधते हुए इस बार भी पिछला प्रदर्शन दोहराना चाहती है। बता दें कि बीजेपी  को 2019 में महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर और बिहार में नीतीश कुमार एवं रामविलास पासवान के साथ मिलकर 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल हुआ था। बीजेपी  इस बार नए सहयोगियों के साथ मिलकर फिर से उसी करिश्मे को दोहराना चाहती है।
      बीजेपी चुनावी लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक साथ कई स्तरों पर काम कर रही है। एक तरफ जहां लोकसभा की कमजोर माने जाने वाली 160 सीटों पर केंद्रीय मंत्रियों और अपने  नेताओं की फौज उतारकर लोकसभा प्रवास योजना के जरिए जनाधार को बढ़ाया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ 2019 में जीतने वाले 303 सीटों पर भी इस बार कमजोर और सक्रिय नहीं रहने वाले उम्मीदवारों को बदलने के लिए नए उम्मीदवारों की तलाश की जा रही है।
            वहीं, लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर माइक्रो स्तर तक जाकर मैनेजमेंट करने के लिए और कामकाज को संगठित एवं सरल बनाने के लिए बीजेपी  ने पहली बार देशभर के सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को तीन सेक्टरों में बांट दिया है। इन सेक्टरों को – ईस्ट रीजन, नार्थ रीजन और साउथ रीजन का नाम दिया गया है। पार्टी इन तीनों रीजन में शामिल राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के नेताओं की अलग-अलग बैठक भी कर चुकी है।  
                यूपी की बात करें तो 2019 में बीजेपी  ने सहयोगी दल अपना दल (एस) के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 64 सीटों पर जीत हासिल की थी। पिछली बार हारने वाली 16 सीटों पर भी भाजपा इस बार विशेष ध्यान दे रही है। इसी के साथ पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मध्य प्रदेश की 29 में से 28 , कर्नाटक की 28 में से 25, गुजरात की 26 में से सभी 26, राजस्थान की 25 में से सभी 25 (सहयोगी दल के साथ मिलकर), हरियाणा की 10 में से सभी 10, उत्तराखंड की 5 में से सभी 5, दिल्ली की 7 में से सभी 7, हिमाचल प्रदेश की 4 में से सभी 4, झारखंड की 14 में से 11, छत्तीसगढ़ की 11 में से 9 और असम की 14 में से 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। बीजेपी मान कर चल रही है हो सकता है इन राज्यों में कुछ सीटें कम हो जाए लेकिन उसके अंतिम आंकड़े में कोई कमी नहीं आएगी। बीजेपी को इन सभी राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा  वोट मिले थे और इस बार भी वह वैसा ही वोट पाने को तैयार है।              
   हालांकि भाजपा को इस बात का भी बखूबी अहसास है कि अगर विपक्षी एकता की कोशिश सही में कामयाब हो जाती है तो पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है इसलिए पार्टी उन राज्यों पर भी ज्यादा ध्यान दे रही है जहां या तो विपक्षी एकता कतई मुमकिन नहीं है या जहां पिछली बार भाजपा का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा था या जहां पर इस बार भाजपा को अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद है। भाजपा को 2019 में आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में एक भी सीट नहीं मिली थी इसलिए भाजपा इस बार इन तीनों राज्यों में खाता खोलने की कोशिश कर रही है। आंध्र प्रदेश में वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के इंडिया गठबंधन में जाने की संभावना नहीं है। वहीं पार्टी को यह भी लगता है कि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ और सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ का मिलकर लड़ना संभव नहीं है और अगर ये मिलकर लड़ते भी हैं तो ईसाई और हिन्दू मतदाताओं के बल पर केरल में भी भाजपा का खाता खुलना तय है।

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