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जेल से बाहर आ रहे हैं आनंद मोहन , क्या राजपूत वोट को महागठबंधन से जोड़ पाएंगे आनंद मोहन ?

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अखिलेश अखिल
बिहार में आनंद मोहन को कौन नहीं जानता ? और खासकर उत्तर बिहार के सीमांचल की जनता क्या उन्हे कभी भूल सकती है ? आनंद मोहन केवल एक राजनीतिक चेहरा ही नहीं रहे हैं ।उनकी पहचान यही तक की नही है कि वी राजपूतों के एक बड़े चेहरा के रूप में रहे हैं ।उनकी पहचान उनकी दवंगता से भी रही है ।वे बाहुबली भी कहलाए । रोबिनहुड की छवि भी इनमे देखी गई । वे राजपूत समाज के तारणहार भी रहे ।लेकिन वे अपराधी कहलाने से भी नही बच पाए ।इनपर हत्या ,अपहरण और फिरौती के कि मामले दर्ज हुए । बदनाम भी हुए । पुलिस की नजरों से भागते भी रहे लेकिन बावजूद इसके वे नेतागिरी भी जम कर किए ।

गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया हत्याकांड में आनंद मोहन दोषी पाए गए । पहले उन्हे फांसी की सजा दी गई फिर बाद में उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली । वे करीब 14 साल से जेल में बंद हैं । आनंद मोहन विधायक भी रहे और फिर दो बार संसद भी रहे ।इनकी पत्नी लवली आनंद भी संसद रही और अभी उनका बेटा चेतन आनंद आरजेडी से विधायक हैं । कभी लालू यादव परिवार के घोर विरोधी रहे आनंद मोहन आज लालू परिवार के साथ हैं और लालू यादव के प्रति समर्पित भी । लालू यादव हमेशा से ही आनंद मोहन को जेल से रिहा करने को मांग करते रहे हैं । तब बिहार में जदयू और बीजेपी को सरकार थी । मोहन पहले ही जेल से निकल जाते लेकिन नीतीश कुमार ऐसा नही चाहते थे । नीतीश कहते थे कि जो दोषी है उसे सजा मिलनी चाहिए ।

लेकिन जैसे ही लालू और नीतीश गिर से एक हुए आनंद मोहन की रिहाई को खानी आगे बढ़ने लगी । बाद में नीतीश कुमार ने भी माना कि आनद को बाहर लाकर बीजेपी के खिलाफ को जारी लड़ाई को आगे बढ़ाया जा सकता है । नीतीश कुमार ने जेल कानून में संशोधन किया और अब आनद मोहन किसी भी समय बाहर आ सकते हैं ।

आनंद मोहन जेपी आंदोलन को उपज हैं । उनका पूरा परिवार स्वतंत्रता सेनानियों का रहा है ।पहले वी स्थानीय स्तर पर दावांगता करते थे लेकिन 90 के दशक में जब पूरा बिहार जातीय हिंसा का गवाह था तब आनंद मोहन सीमांचल के इलाके में बाहुबली के रूप में चर्चित हो गए थे । वे अगड़ों के नेता और खासकर राजपूत समाज के तारण हार के रूप में सामने आए । तब उसी सीमांचल में पप्पू यादव से इनकी अदावत चलती थी ।कभी पप्पू इनपर भरी लड़ते थे तो कभी आनंद मोहन आज निकल जाते थे। पप्पू याद लालू यादव के साथ मिलकर पिछड़ों को राजनीति करते थे तो आनद मोहन अगड़ो की राजनीति को आगे बढ़ाते थे ।इस खेल में कई लोगों की जाने भी गई।

बाद में हालत बदले ।आंदमोहन को पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने महिषी सीट से चुनाव में उतारा । वे जीत गए और विधायक बने । पप्पू यादव भी निर्दलीय सिंहेश्वर विधान सभा से चुनाव लडे और जीते भी ।यह 1990 की बात है । कोसी अंचल में अगड़ों और पिछड़ों को लड़ाई तब काफी थी । दोनो नेता अपने बाहुबली होने का प्रमाण देते रहते थे । 1990 में हो आनंद मोहन ने लालू यादव को चुनौती देने के लिए बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना को थी । चुनाव में काफी प्रचार भी हुआ लेकिन आनद मोहन को पार्टी को कोई बड़ा लाभ नहीं हुआ । लेकिन वैशाली लोकसभा उपचुनाव में अपनी पत्नी को खड़ा कर आनंद मोहन ने आरजेडी उम्मीदवार को हरा दिया ।लवली आनंद पहली बार संसद पहुंच गई ।

इसके बाद आनद मोहन 1996 में समता पार्टी में भी गए । शिवहर से चुनाव लड़े और जीत गए । फिर 1999 में भी वे चुनाव जीते ।लेकिन जीत लालू प्रसाद को वजह से हुई । लालू और आनंद मोहन एक हो गए । पुरानी दुश्मनी खत्म हो गई लेकिन इसी बीच मुजफ्फरपुर में जी कृष्णैया को हत्या हो गई और पूरा इल्जाम एंड मोहन पर लगा । इसी दोष में वे आज भी जेल में हैं ।

पिछले दिनों अपनी बेटी को शादी के लिए एंड मोहन को पैरोल पर छोड़ा गया था ।गिर अपने बेटे चेतन आनंद की शादी के लिए भी वे पैरोल पर बाहर आए हैं । लेकों बिहार चर्चा इस बात की हो रही है कि आनंद मोहन के बाहर आने से किसको क्या लाभ होगा ?

नीतीश कुमार और लालू यादव एक हो गए हैं । बिहार की राजनीति अब 90 दशक वाली नही है। सब कुछ बदल गया है ।नीतीश की कोशिश यह है कि बिहार का राजपूत समाज जो अभी तक बीजेपी के साथ है,आनंद मोहन की वजह से वह वोट महागठबंधन के साथ जुड़े । आनंद मोहन की भी यही इच्छा है। बिहार में करीब 5 फीसदी राजपूत वोट है ।इस वोट पर अभी बीजेपी का कब्जा है। लालू यादव अब सक्रिय रूप से राजनीति से बाहर हैं और सभी समाज को मिलाकर तेजस्वी यादव आज की राजनीति करना चाहते हैं ।ऐसे में लालू और नीतीश को यही लगता है कि आनंद मोहन के जरिए राजपूत वोट महागठबंधन के साथ आ जाए तो बीजेपी को हराने में दुविधा होगी ।अब देखना है कि आनंद मोहन जेल से बाहर आकर क्या कुछ करते है लेकिन इतना साफ है की आनंद मोहन प्रखर वक्ता है और अपनी बातो का प्रभाव वे लोगो पर डालने अभी तक सफल रहे हैं।आगे राजनीति में वे कितना सफल होंगे इसे देखना बाकी है।

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