ढहता लोकतंत्र : गरीब देश के करोड़पति और दागी सांसदों की गजब दास्तान  

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अखिलेश अखिल 

देश का सदन अब करोड़पतियों का अड्डा बन गया है। मामला चले लोकसभा का हो या फिर राज्यसभा का या फिर राज्य विधान सभाओं का ,यहां पहुँचने वाले अधिकतर नेता कहलाते हैं किसान और आम लोग लेकिन सच तो यही है कि सदन में पहुँचने वाले अधिकतर सदस्य करोड़पति है। इन करोड़पतियों को देखकर तो यही लगता है कि कोई भी आम आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता।  लूट, दलाली, रंगदारी के साथ ही कथित व्यापार के नाम पर जिन धनधारियों के पास अकूत संपत्ति है वही अब चुनाव लड़ सकते हैं।         
संसद में ऐसे नेताओं की संख्या अब लगातार बढ़ रही है। स्थिति तो यह है कि अगले चुनाव तक सम्भावना है कि पूरा सदन करोड़पतियों के हवाले होगा और आम जनता टुकुर टुकुर सब देखती रहेगी। 2009 के चुनाव में सदन पहुँचने वाले करोड़पतियों की संख्या 315 थी यानी करीब 58 फीसदी सांसद करोड़पति थे। इनकी संख्या 2014 के चुनाव में 442 हो गई यानी 82 फीसदी सांसद करोड़पति थे। मौजूदा 2019 के चुनाव में 475 करोड़पति सांसद सदन में पहुंचे जो कुल सांसदों का 88 फीसदी है। ऐसे में यह भी हैं कि करोड़पतियों के लिए भी सदन में आरक्षण हो गया है। यानी 85 फीसदी सीट करोड़पति सांसदों के लिए आरक्षित हो गई है। लोकतंत्र के इस खेल को आप क्या कहेंगे ?
           ऐसा नहीं है कि केवल लोकसभा में ही दागी नेताओं की भरमार है। राज्यों के विधान सभाओं की स्थिति पर नजर डालें तो वह और भी डरावना है और लोकतंत्र के अपराधीकरण की पुष्टि करते हैं। यूपी के हालिया चुनाव में 403 में से 255 दागी उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधान सभा पहुंचे हैं। इन विधायकों पर तरह-तरह के गंभीर दाग है। किसी पर बलात्कार के मामले दर्ज हैं तो किसी पर महिला उत्पीड़न के मामले। कोई हत्या के आरोपी हैं तो कोई हत्या के प्रयास के मामले में दागी है। किसी पर डकैती के आरोप हैं तो कोई ठगी और फरेबी के मामलो के सामना कर रहे हैं। इस चुनाव में बीजेपी को 255 सीटें मिली थी। बीजेपी के 255 में से 111 विधायक दागी हैं यानी बीजेपी के लगभग आधे विधायक अपराधी किस्म के हैं। सपा के 111 विधायकों में से 71 दागी हैं। इसके अलावा यूपी के इसी विधान सभा में इस बार 366 विधायक करोड़पति हैं। यानी हर दस विधायकों में से 9 करोड़पति। भारत के लोकतंत्र का यह एक नया तमीज और नया रूप है।
             लेकिन अपराध के राजनीतिकरण की मौजूदगी कोई यूपी तक ही नहीं है। कमोबेश यही हाल हर सूबे और हर विधान सभा का है । मध्य प्रदेश के मौजूदा विधान सभा में 41 फीसदी विधायक दागी हैं तो महाराष्ट्र के 288 सदस्यीय विधान सभा में 176 विधायक दागी हैं और 264 करोड़पति। गुजरात के 182 विधायकों में 47 दागी हैं और 141 करोड़पति। पंजाब के 117 विधायकों में 58 पर केस दर्ज है और इनमे 27 पर गंभीर आरोप है। इस बार 87 करोड़पति विधायक सदन पहुंचे हैं। बिहार के 243 विधायकों में 136 पर आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं और इनमे से 27 पर गंभीर धाराएं लगी हुई है। यही हाल हरियाणा, ओडिशा, कर्नाटक, झारखंड, पश्चिम बंगाल, गोवा और पुदुच्चेरी और उत्तराखंड समेत बाकी विधान सभाओं के हैं जहां एक से बढ़कर एक दागी नेता जनप्रतिनिधि के तौर सदन में विराजे हैं।
              राजनीति के आपराधिकरण पर 90 के दशक में देश में खूब चर्चा हुई थी। तबके पूर्व लोकसभा स्पीकर रवि राय ने 93 में गठित बोहरा कमेटी की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखने की बात की थी, ताकि राजनीति के अपराधीकरण की सच्चाई सामने आ सके। लेकिन किसी भी पार्टी ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके पीछे का कारण यह था कि तत्कालीन गृह मंत्री को लगता था कि अगर बोहरा कमेटी की रिपोर्ट का खुलासा हो गया तो सरकार गिर जाएगी।
               बोहरा कमेटी दरअसल राजनीति में बढ़ते अपराध और राजनीति के साथ अपराधियों के सांठ गाँठ पर गठित की गई थी। लेकिन इस कमेटी की रिपोर्ट तब सदन के पटल पर लाया गया जब देश में नयना साहनी कांड हुआ और राजनीति के अपराधीकरण पर हल्ला शुरू हुआ। लेकिन उस रिपोर्ट पर कभी बहस नहीं हुई। कहा गया कि रिपोर्ट आधी अधूरी है। जबकि रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा गया था कि कुछ राजनेता माफिया गनिग और प्राइवेट आर्मी के नेता बन गए हैं और सालों से चुनाव जीतते आ रहे हैं। इस वजह से आम आदमी की संपत्ति और सुरक्षा को गंभीर खतरा है। लेकिन इस पर आगे कोई चर्चा नहीं हुई। तब रवि राय ने कहा था कि ”संसद और विधान सभाओं में अपराधियों की पहुँच से खतरनाक स्थिति राजनीतिक दलों और उसके नेताओं की है और सरकार की है जो अपराधियों को दोषी मानते ही नहीं। और इस खेल में सभी दल सामान रूप से भागीदार हैं। जब सरकार ही ऐसे दागी नेताओं को सजा नहीं देना चाहती तो दागी दागी चिल्लाने से क्या होगा। सच यही है राजनीति में अपराध को सभी ने स्वीकार कर लिया है।”
               

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