अजीत पवार को क्षेत्रीय पार्टियों के संस्थापकों से सबक लेनी चाहिए वरना —–

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अखिलेश अखिल

महाराष्ट्र की हालिया एनसीपी की घटना बहुत कुछ कहती है। एनसीपी प्रमुख फिर से पार्टी के सर्वेसर्वा हो गए। शरद पवार पहले भी सर्वेसर्वा थे। वे पार्टी के संस्थापक जो हैं। देश एक इतिहास तो यही बता रहा है कि जिसने भी क्षेत्रीय पार्टियों की स्थापना की ,सबने अपने बाल बच्चों को ही उत्तराधिकारी बनाया। अभी तक का सच यही है। यही वजह है कि क्षेत्रीय पार्टियों को घरेलु पॉकेट संस्था भी कहा जाता है। ऐसे में एनसीपी के भीतर अभी जो कुछ भी हुआ है उसमे अजीत पवार एक्सपोज हो गई है। उनकी महत्वाकांक्षा ने उनकी रजनीति को कमजोर किया है। आगे उनके साथ क्या होगा या फिर वे खुद क्या कुछ करेंगे यह कोई नहीं जनता लेकिन इतना तो साफ़ है कि अगर अजीत पवार ने कोई अलग फैसला लिया तो उनकी हालत राज ठाकरे और शिवपाल यादव जैसी हो सकती है। बेहतर यही है कि अजीत पवार को अपने चाचा शरद पवार के साथ मिलकर आगे बढ़ने की राजनीति करनी चाहिए। उन्हें यह मान लेना चाहिए कि कोई भी संस्थापक अपना उत्तराधिकारी अपने बच्चो को ही बनाता है। और शरद पवार भी ऐसा ही कुछ करेंगे। उनकी राजनीतिक विरासत उनकी बेटी सुप्रिया सुले को मिलेगी न कि उनको।
उसी महाराष्ट्र में राज ठाकरे की कहानी को कौन नहीं जानता ! राज ,बाला साहेब ठाकरे से लाफ़ी करीब थे लेकिन बाला साहेब ने शिवसेना की कमान अपने पुत्र उद्धव के हाथ में दी। राज ठाकरे दुखी हुए ,पार्टी से से निकले और फिर नै पार्टी का गठन भी किया। लेकिन आज राज ठाकरे की पार्टी का क्या हाल है कौन नहीं जानता ? उधर इसी तरह की कहानी मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव की रही है। उन्हें लगा था कि मुलायम सिंह पार्टी का बागडोर उनके हाथ में देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अपने पुत्र अखिलेश यादव पर ही उनका भरोसा रहा। नाराज होकर शिवपाल यादव पार्टी से अलग हुए। नई पार्टी भी बनाई। चुनाव भी लड़े और फिर अखिलेश यादव के साथ आ गए। उनकी पार्टी का विलय भी सपा में हो गया। आज शिवपाल यादव की जो हालत है उसे कौन नहीं जानता ? शिवपाल यादव को पता चल गया कि पार्टी संस्थापकों का राजनीतिक उत्तराधिकारी बेटा ही होता है ,भाई नहीं। देश की जनता भी यही कुछ सोंचती रही है। ऐसे में अजीत पवार को भी सबक लेने की जरूरत है। अगर उनको लगता है कि उनकी पकड़ जनता में है और वे शरद पवार से आगे बढ़ सकते हैं तो वे कोई भी निर्णय ले सकते हैं। लेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि पार्टी में जब टूट होती है तो उसके नेता फिर कहाँ -कहाँ जाएंगे यह किसको पता। पार्टी से जो लोग अभी जुड़े हैं वे पार्टी संस्थापक के नाम से जुड़े हैं। बाद में क्या होगा यह भी कौन जाने !
क्षेत्रीय पार्टियों का सच यही है। लालू यादव में राजद की स्थापना की और अपना उत्तराधिकारी फिर बेटा को ही बनाया। राम विलास पासवान ने पार्टी बनाई ,उसके उत्तराधिकारी भी उनके बेटे ही बने। दक्षिण में डीएमके की हालत को कुन नहीं जानता ! तेलंगाना की राजनीति को कौन नहीं समझ रहा है ? पंजाब में बदल परिवार की राजनीति भी सबको दिख रही है। ओडिशा में मौजूदा नवीन पटनायक की राजनीति भी परिवार की ही देन हैं। पश्चिमी यूपी की पार्टी रालोद की राजनीति को भी बानगी के तौर पर देखा जा सकता है। पहले अजीत चौधरी रालोद के मुखिया थे फिर उनके बेटे जयंत की राजनीति आगे बढ़ रही है। कर्नाटक में देवगौड़ा की विरासत को उनके बेटे कुमार स्वामी संभाल रहे हैं। पूर्वोत्तर में पीए संगमा मेघालय की राजनीति करते थे। उन्होंने एनपीपी पार्टी की स्थापना की। अब उनका बेटा पार्टी को आगे बढ़ा रहे हैं। सरकार चला रहे हैं।
ऐसे और भी कई उदहारण है। उसी तरह यह तय मानना चाहिए कि शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को ही उत्तराधिकारी बनाएंगे, अजित पवार को नहीं। अगर इस स्थिति को स्वीकार करके अजित पवार राजनीति करेंगे तो उनकी अजितदादा वाली हैसियत बनी रहेगी, अन्यथा पार्टी से बाहर होकर वे राज ठाकरे बनेंगे या वापसी करके शिवपाल यादव वाली हैसियत प्राप्त करेंगे।

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