Hepatitis B का इलाज बदलने वाली नई दवा! 20 साल बाद वैज्ञानिकों को मिली बड़ी सफलता

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Hepatitis B Treatment: हेपेटाइटिस-बी के इलाज के क्षेत्र में करीब दो दशक बाद एक महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल में बेपिरोविर्सेन (Bepirovirsen) नामक नई प्रायोगिक दवा ने ऐसे नतीजे दिए हैं, जिन्होंने विशेषज्ञों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। शुरुआती परिणाम बताते हैं कि भविष्य में कुछ मरीजों को लंबे समय तक या पूरी जिंदगी दवा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ सकती। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती नई दवा नहीं, बल्कि संक्रमण से ग्रसित लोगों की समय पर पहचान और इलाज सुनिश्चित करना है।

भारत में करोड़ों लोग संक्रमित, लेकिन अधिकांश को जानकारी तक नहीं

विश्व हेपेटाइटिस दिवस (28 जुलाई) के अवसर पर लिवर विशेषज्ञों ने बताया कि देश में करीब 3.5 करोड़ लोग हेपेटाइटिस-बी संक्रमण के साथ जीवन जी रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से बड़ी संख्या में लोग अपनी बीमारी से अनजान हैं। अनुमान के मुताबिक, इलाज प्राप्त कर रहे मरीजों की संख्या 10 लाख से भी कम है।

सबसे बड़ी जरूरत है स्क्रीनिंग और समय पर इलाज

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में सबसे अहम काम संक्रमित लोगों की पहचान, उनकी जांच और उन्हें इलाज से जोड़ना है। वर्तमान में उपलब्ध एंटीवायरल दवाएं राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत भी उपलब्ध हैं और उनकी कीमत भी अपेक्षाकृत कम है। इसके बावजूद बहुत कम मरीज समय पर उपचार तक पहुंच पाते हैं।

29 देशों में हुआ बड़ा क्लिनिकल ट्रायल

द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित फेज-3 अध्ययन में 29 देशों के 1,834 मरीजों को शामिल किया गया। जिन मरीजों को सामान्य एंटीवायरल दवाओं के साथ बेपिरोविर्सेन दी गई, उनमें लगभग 19 प्रतिशत मरीजों ने ऐसा परिणाम हासिल किया जिसे चिकित्सा विशेषज्ञ ‘फंक्शनल क्योर’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि इलाज बंद होने के छह महीने बाद भी उनके शरीर में वायरस का पता नहीं चला। वहीं, प्लेसीबो समूह में ऐसा परिणाम देखने को नहीं मिला।

करीब 20 साल बाद इलाज में बड़ी प्रगति

लिवर विशेषज्ञों के अनुसार, हेपेटाइटिस-बी के उपचार में यह पिछले लगभग 20 वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जा रही है। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में इसी दिशा में कई नई दवाएं विकसित हो सकती हैं। हालांकि किसी भी नई दवा के व्यापक इस्तेमाल से पहले उसकी सुरक्षा, नियामकीय मंजूरी और आम मरीजों की पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी होगा।

मौजूदा इलाज से कैसे अलग है नई दवा?

फिलहाल उपयोग में आने वाली एंटीवायरल दवाएं वायरस को पूरी तरह खत्म नहीं करतीं, बल्कि उसकी सक्रियता को नियंत्रित रखती हैं। यही कारण है कि अधिकतर मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं।

इसके विपरीत बेपिरोविर्सेन वायरस के शुरुआती जीवन चक्र को प्रभावित करने का प्रयास करती है। इससे वायरस की संख्या घटने के साथ उन प्रोटीनों का निर्माण भी कम हो सकता है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे इलाज के क्षेत्र में एक नई दिशा के रूप में देख रहे हैं।

‘फंक्शनल क्योर’ क्यों है खास?

विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल वायरस को नियंत्रित रखना और फंक्शनल क्योर हासिल करना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि मरीज इस अवस्था तक पहुंच जाता है तो भविष्य में लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा काफी कम हो सकता है। साथ ही संक्रमण के दूसरों तक फैलने की संभावना भी घट जाती है।

क्या हर मरीज को मिलेगा इसका फायदा?

विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह दवा सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जा रही। शुरुआती संकेत बताते हैं कि इसका सबसे अधिक लाभ उन मरीजों को मिल सकता है जिनका संक्रमण पहले से एंटीवायरल दवाओं की मदद से नियंत्रित है और जिनके शरीर में वायरस की मात्रा कम है।

टीकाकरण अब भी सबसे मजबूत हथियार

नई दवा के सकारात्मक नतीजों के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस-बी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण ही है। नवजात शिशुओं का समय पर टीकाकरण, संक्रमित व्यक्ति के परिवार के सदस्यों, स्वास्थ्यकर्मियों, डायलिसिस मरीजों और अन्य उच्च जोखिम वाले लोगों की जांच और वैक्सीनेशन बेहद जरूरी है।

भारत में आने में लग सकते हैं 2 से 5 साल

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद इस दवा को भारत तक पहुंचने में करीब दो से पांच वर्ष लग सकते हैं। इसके अलावा इसकी कीमत भी एक महत्वपूर्ण पहलू होगी। ऐसे में फिलहाल देश के लिए प्राथमिकता अधिक से अधिक लोगों की जांच, समय पर उपचार और व्यापक टीकाकरण अभियान को मजबूत करना है।

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