परिमल नाथवानी, जिन्होंने तोड़ा राहुल-हेमंत का चक्रव्यूह

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झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए बेहद रोमांचक मुकाबले में बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला। चुनावी मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी ने उम्मीद के मुताबिक जादुई आंकड़ा हासिल कर जीत दर्ज की। सत्ताधारी महागठबंधन (झामुमो और कांग्रेस) के पास संख्या बल होने के बावजूद राहुल गांधी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीतिक किलेबंदी परिमल नाथवानी को रोकने में नाकाम रही। भारतीय जनता पार्टी के मजबूत और रणनीतिक समर्थन के दम पर मिली इस जीत ने सत्ताधारी पार्टियों के हौसलों को पस्त कर दिया। मध्य प्रदेश और बिहार के बाद झारखंड के इस चुनावी नतीजे ने साबित कर दिया है कि एनडीए का चुनावी चक्रव्यूह विरोधियों पर भारी पड़ रहा है।

परिमल नाथवानी देश के बड़े उद्योगपति हैं। बड़े औद्योगिक घराने से इनका घनिष्ठ संबंध है। राजनीति में वे कोई नए नाम नहीं हैं। इससे पहले भी वे साल 2008 से 2020 तक झारखंड से दो बार राज्यसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उद्योग जगत के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी उनके गहरे व्यक्तिगत संबंधों और बेजोड़ चुनावी प्रबंधन के लिए उन्हें जाना जाता है।
साल 2008 में परिमल नाथवानी पहली बार झारखंड से राज्यसभा सांसद बने
साल 2014 में झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे
साल 2020 आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस से राज्यसभा के सांसद बने

साल 2026 में एनडीए के समर्थन से फिर राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए
परिमल नाथवानी गुजरात के प्रमुख उद्योगपतियों में गिना जाता है
नाथवानी का वर्तमान राज्यसभा कार्यकाल 21 जून 2026 तक है
झारखंड से निर्दलीय राज्यसभा चुनाव जीतकर शुरुआत की थी
प्रसिद्ध द्वारकाधीश देवस्थान समिति के उपाध्यक्ष भी हैं।

इस चुनाव को ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के बड़े नेताओं के लिए साख की लड़ाई माना जा रहा था। कांग्रेस आलाकमान और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने उम्मीदवारों की जीत तय करने के लिए विधायकों की सख्त घेराबंदी की थी। कागजी तौर पर गठबंधन के पास बहुमत का आंकड़ा सुरक्षित था, लेकिन मतदान के समय परिमल परिमल नाथवानी की जमीनी पैठ के आगे ये सारी रणनीति बिखर गई।

हाल के दिनों में जिस तरह बीजेपी और एनडीए ने मध्य प्रदेश और बिहार के राजनीतिक घटनाक्रमों में अपनी रणनीतिक कुशलता साबित की थी, ठीक वही कहानी झारखंड में भी दोहराई गई। विपक्ष की आंतरिक कलह और एनडीए की एकजुटता ने इस सीट को बीजेपी समर्थित खेमे की झोली में डाल दिया, जिससे राज्य में भगवा खेमे का उत्साह सातवें आसमान पर है।

चुनाव में सभी 81 विधायकों के शत-प्रतिशत मतदान के बाद से ही क्रॉस वोटिंग की चर्चाएं तेज थीं। राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि सत्ताधारी गठबंधन के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर नाथवानी के पक्ष में मतदान किया, जिसने अंततः जीत-हार का अंतर तय किया। परिमल नाथवानी ने बिना किसी बड़े पार्टी सिंबल के दोनों गठबंधनों के वोट बैंक में सेंध लगाई। बीजेपी और आजसू (AJSU) सहित सभी सहयोगी दलों ने पहले दिन से परिमल नाथवानी के पक्ष में लामबंदी की थी। इस हार से कांग्रेस प्रत्याशी की उम्मीदें टूट गईं, जिससे सत्तापक्ष में मायूसी का माहौल है।

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