पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल पार्टी की करारी हार हुई है। इस चुनावी हार के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में बनी बीजेपी की शुभेंदु अधिकारी सरकार के विरुद्ध टीएमसी ने चुनाव के बाद की व्यापक हिंसा और रेलवे स्टेशन से भेंडरों के हटाए जाने के खिलाफ महाधरना का आयोजन किया था। 15 वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने के बाद सत्ताच्युत होने पर टीएमसी का यह पहला बड़ा समन्वित आंदोलन था।इस प्रदर्शन में शोभनदेब चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी, कुणाल घोष और ऋतब्रत बनर्जी शामिल थे। कहां तो इस आंदोलन के जरिए जन भागीदारी से जुड़े मुद्दे को उठाकर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी पार्टी अपनी पुरानी शक्ति को वापस जताने का ख्वाब देख रही थी लेकिन 80 विधायकों में से केवल 35 विधायकों ही इस कार्यक्रम में पहुंचने से टीएमसी की स्थिति मजबूत होने की जगह और खस्ता हाल होती ही नजर आने लगी।इसके मां धरना के इस प्रकार सफल हो जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं है।
टीएमसी के महा धरना के इस प्रकार से सफल हो जाने को लेकर विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने बचाव करते हुए आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज कर दिया।उन्होंने कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। चट्टोपाध्याय ने कहा कि आज के कार्यक्रम में करीब 35 विधायक मौजूद थे।कई विधायक चुनाव बाद हिंसा प्रभावित इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त थे, इसलिए वे नहीं आ सके। इसके अलावा कार्यक्रम की सूचना सिर्फ एक दिन पहले दी गई थी, ऐसे में दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले विधायकों के लिए पहुंचना मुश्किल था।
इस विरोध प्रदर्शन को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह कालीघाट में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के एक दिन बाद आयोजित किया गया था ।पार्टी सूत्रों के अनुसार, बैठक में कई विधायकों ने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस केवल रणनीतिक बैठकों के जरिए खुद को पुनर्स्थापित नहीं कर सकती और उसे जमीनी स्तर पर लोगों से दोबारा जुड़ने की जरूरत है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की उपस्थिति में मंगलवार को हुई बैठक में कुछ विधायकों ने चुनाव में हार के बाद सड़क आंदोलन से पार्टी नेतृत्व की कथित अनुपस्थिति पर चिंता व्यक्त की थी।कई विधायकों ने कथित तौर पर कहा कि बंद कमरों में बैठकें करना उस पार्टी के लिए मददगार नहीं होगा, जो अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करना चाहती है।
तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान लंबे समय तक आंदोलनों के जरिए बनी रही है। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों से लेकर वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ सड़क पर चलाए गए अभियानों तक, पार्टी की राजनीति में जन आंदोलनों की अहम भूमिका रही है। तृणमूल विधायकों ने विधानसभा में बी आर आंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष धरना दिया। उन्होंने बेदखली अभियान, बुलडोजर से इमारतें ढहाने और चुनाव बाद कथित हिंसा का विरोध किया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल विधायकों के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद विपक्षी दल की भूमिका में खुद को कितनी प्रभावी ढंग से ढाल पाती है।

