अगर पसमांदा मुसलमानो को बीजेपी साध गई तो विपक्ष का खेल ख़राब हो सकता है —

0
95


अखिलेश अखिल 

बीजेपी बड़े स्तर पर अब पसमांदा मुसलमानो को अपने पाले में लाने का अभियान चला रही है। इसी अभियान को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी रविवार को लखनऊ में पसमांदा मुसलमानो का बड़ा सम्मलेन करने जा रही है। कहा जा रहा है कि इस सम्मलेन में यूपी के पसमांदा तो जुटेंगे ही ,कई और राज्यों के पसमांदा मुसलमान भी आ रहे हैं। कल के इस सम्मलेन के बाद बीजेपी 27 तारीख से पसमांदा स्नेह यात्रा की शुरुआत करने जा रही है। बीजेपी का यह पूरा  कार्यक्रम बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ,राष्ट्रवादी मुस्लिम पसमांदा महज कर रहा है। योगी सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी इस पुरे कार्यक्रम को आगे बढ़ाने लगे हुए हैं। पसमांदा स्नेह यात्रा तो पुरे देश से गुजरेगी लेकिन इसकी शुरुआत गाजियाबाद से शुरू होगी और सभी मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरेगी। पुरे देश में यह कार्यक्रम होना है। बड़ी संख्या में पसमांदा मुसलमान इस अभियान से जुड़ भी रहे हैं।    
       बीजेपी को लग रहा है कि देश के मुसलमान उन्हें वोटर नहीं देते और इसमें सच्चाई भी है। जब से मोदी की राजनीति की शुरुआत हुई तभी से मुस्लिम समाज में एक भय का वातावरण पैदा है। मुसलमानो को लग रहा है कि बीजेपी और संघ के लोग उन्हें टारगेट करते हैं। लेकिन अब पीएम मोदी की नजर पसमांदा मुसलमानो पर जा पड़ी है। मुसलमानो की आबादी में 80 फीसदी पसमांदा मुसलमान ही है। ये मुसलमान काफी गरीब हैं और मुस्लिम समाज के सबसे नीचले पायदान पर खड़े हैं। बीजेपी को लग रहा है कि इनको आगे बढाकर और िंबके कार्यक्रम शुरू करके इन्हे अपने पाले में लाया जा सकता है। बीजेपी को इधर कुछ सालों में लाभ भी हुआ है।        
      यूपी निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 391 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। बीजेपी के इतिहास में पहली बार ऐसा प्रयोग किया गया, जो एक हद तक सफल रहा। निकाय चुनाव में बीजेपी के 61 मुस्लिम कैंडिडेट यूपी में जीत गए। चेयरमैन की 5 सीटों पर बीजेपी के मुस्लिम कैंडिडेट ने जीत हासिल की। बीजेपी के स्थानीय नेतृत्व में पसमांदा मुसलमानों को शामिल किया गया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके तारिक मंसूर अब भाजपा के कोटे से विधान परिषद के सदस्य हैं। योगी सरकार के एकमात्र मुस्लिम मंत्री दानिश आजाद अंसारी को भी पसमांदा होने का फायदा मिला।
                   उत्तरप्रदेश में करीब चार करोड़ मुसलमान हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल मुसलमानों की आबादी में 80-85 प्रतिशत पसमांदा मुसलमान हैं। इस लिहाज से उत्तरप्रदेश में पसमांदा समाज की आबादी करीब तीन करोड़ है। मुसलमानों में सैफी, अंसारी, अल्वी, कुरैशी, मंसूरी, इदरीसी, सलमानी, रायन समुदाय के लोग पसमांदा की कैटिगरी में आते हैं। पसमांदा समाज के लोग पारंपरिक तौर से दर्जी, धोबी, नाई, कसाई, मेहतर, धुनिया और जुलाहे काम करते रहे हैं। मुस्लिम मजहब में सैद्धांतिक तौर से जाति प्रथा नहीं है, मगर भारत में मुसलमान अंदरुनी तौर पर तीन हिस्सों में बंटे हैं। यह बंटवारा हिंदू धर्म जैसा ही है। सवर्ण कैटिगरी के मुस्लिम अशराफ हैं। अजलाफ को ओबीसी और अरजाल को दलित माना जा सकता है। पसमांदा मुसलमान राजनीतिक और प्रशासनिक तौर से ओबीसी कैटिगरी में रहना चाहते हैं। पसमांदा दशकों से नौकरी और सरकारी सिस्टम में ओबीसी आरक्षण का लाभ देने की वकालत करते हैं। राजनीतिक दलों ने उनकी इसी मंशा को भांप लिया है और बीजेपी ने अब पसमांदा को राजनीतिक तौर से लुभाने की तैयारी कर ली है।
               दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में नए वोटरों से जुड़ने की अलग रणनीति बनाई है। यूपी में बीजेपी में गैर जाटव दलितों के बीच पैठ बनाई, क्योंकि जाटव बिरादरी लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी है। बिहार में भी गैर यादव ओबीसी नेतृत्व को मौका दिया। लालू प्रसाद यादव के बिहार में यादव वोटरों पर एकछत्र प्रभाव है। महाराष्ट्र में भी भारतीय जनता पार्टी ने गैर मराठा नेताओं में रुचि दिखाई। हरियाणा में गैर जाट नेताओं को आगे बढ़ाया। इसी कड़ी में बीजेपी ने मुस्लिम वोटरों तक पहुंचने के लिए पसमांदा को चुना। 90 के दशक में पसमांदा आंदोलन शुरू होने के बाद भी मुसलमानों का नेतृत्व शेख, पठान जैसे अशराफ कैटिगरी के नेताओं के पास रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने पसमांदा नेताओं पर जो दांव खेला है, उसका फायदा यूपी के 20 लोकसभा क्षेत्र में मिल सकता है, जो अभी तक बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के लिए वोट करते रहे हैं। इसके अलावा बिहार के सीमांचल, झारखंड, असम और मध्यप्रदेश में भी पसमांदा कार्ड का असर दिख सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here