केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में यह कहा कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के नियमों की पुनः समीक्षा के लिए एक विशेष समिति का गठन कर रही है। केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि सरकार स्टूडेंट्स की चिंताओं का समाधान करने के उपायों पर विचार कर रही है।सरकार यह प्रयास करेगी कि यूजीसी के नये नियमों से छात्र समुदाय का कोई भी वर्ग खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस न करे। यहां यह समझना जरूरी है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने यह बयान क्यों दिया और ऐसा कौन सा नियम सरकार लेकर आई थी, जिससे छात्रों में असंतोष है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव नजदीक है। बीजेपी सरकार इस राज्य को खोना नहीं चाहती है, यही वजह है कि वह हर कदम फूंक-फूंक कर उठा रही है।बिहार के बांकीपुर विधानसभा चुनाव में जिस तरह यूजीसी का मसला उठाया गया, उसके बाद बीजेपी सवर्णों को नाराज नहीं करना चाह रही है। इसी वजह से सरकार ने नियमों में सुधार का आश्वासन केंद्र सरकार को दिया है।
सरकार जो नया नियम लागू करना चाहती थी उसका नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियमन, 2026 था । यूजीसी ने इस नियम को इसी वर्ष 13 जनवरी 2026 को लागू किया था। इस नियम का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकनाऔर एससी,एसटी और ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों को शिकायत दर्ज कराने तथा न्याय पाने की व्यवस्था देना था इस नियम के तहत जो व्यवस्थाएं की गई थी वो इस प्रकार हैं-
इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर: वंचित वर्गों के विद्यार्थियों की मदद और भेदभाव संबंधी शिकायतों के समाधान के लिए।
इक्विटी कमेटी: भेदभाव की शिकायतों की जांच और कार्रवाई के लिए।
इक्विटी स्क्वॉड: संस्थान में भेदभाव रोकने और निगरानी के लिए।
शिकायत निवारण: शिकायतों पर निर्धारित समय सीमा में कार्रवाई की व्यवस्था। इन नियमों में एससी, एसटी और ओबीसी के विद्यार्थियों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया है।
यूजीसी ने जब नए नियमों को लागू किया, तो उसपर सामान्य वर्ग के छात्रों द्वारा आपत्ति दर्ज कराई गई और यह कहा गया कि इससे उनके अधिकारों का हनन होगा और नये कानून का दुरुपयोग होगा। इन नियमों पर सबसे बड़ी आपत्ति नियम 3(1)(c) को लेकर है। इसमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा देते हुए एससी, एसटी और ओबीसी के सदस्यों के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव का जिक्र किया गया है। जो मुख्य आपत्तियां सामने आई हैं, वो इस प्रकार हैं.
सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को संरक्षण नहीं:सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अगर किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसे शिकायत करने और संरक्षण पाने का समान अधिकार मिलना चाहिए।
कानून का दुरुपयोग:जिन लोगों ने नये नियम का विरोध किया है उनका कहना है कि अगर झूठे केस दर्ज होते हैं तो उन शिकायतों से बचाव के लिए स्पष्ट प्रावधान उपलब्ध नहीं हैं।इससे नियम का दुरुपयोग बढ़ेगा।
नियम में सभी तरह के भेदभाव का जिक्र है:सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर भी सवाल उठे कि नियमों में रैगिंग को अलग से भेदभाव के एक रूप के तौर पर क्यों नहीं शामिल किया गया? इसके अलावा हॉस्टल, क्लासरूम और मेंटरशिप समूहों में अलगाव से जुड़े प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठे हैं।
यूजीसी के इस नए नियम का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगाते हुए कुछ अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने यह आदेश भी जारी किया कि जब तक नये नियमों को लेकर स्पष्टता नहीं होती है, तब तक 2012 के नियमों को ही लागू रखा जाए।

