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समाज सुधारक से सांसद, विधायक, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री, शिबू सोरेन की जीवन यात्रा

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झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिशोम गुरु शिबू सोरेन नहीं रहे।81 साल की उम्र में आज उनका निधन हो गया। इसकी जानकारी सीएम हेमंत सोरेन ने एक्स पर दी।दिशोम गुरु के निधन के बाद झारखंड में 3 दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया है।उनके निधन की खबर आते ही झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की पार्टी के झंडे झुका दिये गये।

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की मृत्यु लंबू बीमारी की वजह से हुई।शिबू सोरेन जून 2025 से दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती थे। शिबू सोरेन को कई पुरानी बीमारियां थीं।वह किडनी के रोग से पीड़ित थे।उन्हें डायबिटीज थी।हृदय संबंधी जटिलताओं के बाद उन्हें हाल में ब्रेन स्ट्रोक हो गया था। इसके बाद वह करीब एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहे।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन डायलिसिस पर थे।उनकी बायपास सर्जरी भी हो चुकी थी।जुलाई 2025 में शिबू सोरेन के स्वास्थ्य में मामूली सुधार हुआ था। अगस्त की शुरुआत में उनकी हालत फिर से गंभीर हो गयी। इसके चलते उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था।दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी।

दिशोम गुरु का जब सर गंगाराम अस्पताल में निधन हुआ, तब उनके पास उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अलावा उनकी पुत्रवधु और विधायक कल्पना सोरेन सहित पूरा परिवार वहां मौजूद थे।

हजारीबाग के नेमरा गांव (अब रामढ़ जिले में) में जन्मे शिबू सोरेन छोटी उम्र में ही समाज सुधारक की भूमिका में आ गये थे। उनके पिता की महाजनों ने हत्या कर दी, तो शिबू सोरेन ने अपनी पढ़ाई छोड़कर आदिवासियों को एकजुट करना शुरू किया।उन्हें शिक्षा के प्रति जागरूक करने लगे।महाजनों के खिलाफ धनकटनी आंदोलन शुरू किया। देखते ही देखते उन्होंने अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।समाज सुधारक से वह राजनेता बन गये।वे सांसद, विधायक, केंद्रीय मंत्री और झारखंड में 3 बार मुख्यमंत्री बने।

शिबू सोरेन के समाज सुधारक के रूप में एक घटना मेरे समय में भी घटी थी। तब दुमका मे सिदो कान्हो की मूर्ति को किसी ने रात में तोड़ दिया था। सुबह यह खबर आज की तरह फैलने लगी। डर इस बात की थी कि कहीं इसे गलत रूप से भड़काकर आदिवासी और गैर आदिवासी का मुद्दा बनाकर यहां दंगा ना भड़का दिया जाए। शिबू सोरेन ने मुझे बातचीत में बताया था की देश के साथ-साथ कई विदेशी शक्तियां उन्हें इस मामले को आदिवासी और गैर आदिवासी का मुद्दा बनाने के लिए बड़ी धनराशि की पेशकश कर रहे थे। लेकिन इन्होंने न सिर्फ उन लोगों को यहां आने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे दी बल्कि दूसरे ही दिन मूर्ति के टूटे हुए हिस्से की मरम्मत प्रशासन से करवाकर इस मामले को तूल पकड़ने से रुकवा दिया था।

शिबू सोरेन ने समाज सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता तक का सफर तय किया। अलग झारखंड राज्य के लिए उन्होंने कई कुर्बानियां दीं।यही वजह है कि झारखंड के सभी दलों के लोग उनकी इज्जत करते हैं। उनके कर्मों का ही परिणाम रहा कि दिशोम गुरु ने लोकसभा के चुनावों में जीत दर्ज की, तो उच्च सदन राज्यसभा के भी सदस्य बने।2-2 बार केंद्रीय मंत्री बने।3 बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने. हालांकि, न केंद्रीय मंत्री के रूप में वह कभी अपना कार्यकाल पूरा कर पाये, न मुख्यमंत्री के रूप में। हर बार उन्हें कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देना पड़ा। कभी जेल जाने की वजह से, तो कभी उपचुनाव में हार की वजह से।

11 जनवरी 1944 को जन्मे शिबू सोरेन से कई विवाद भी जुड़े हुए थे। उन पर कई गंभीर आरोप भी लगे। इसमें कुछ प्रमुख विवाद चिरूडीह हत्या कांड,शशि नाथ झा हत्या कांड,सांसद रिश्वत कांड और कोयला घोटाला जैसे मुद्दे प्रमुख थे।हालांकि इसमें किसी भी मुद्दे में इनपर अपराध सिद्ध नहीं हुआ और ये राज्य के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता बने रहे। आइए डालते हैं उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा पर एक नजर।

इन्होंने 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया।
1980 में ये लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
ये 1986 में झामुमो के महासिचव बने।
1989 में ये लोकसभा के लिए दूसरी बार चुने गये।
ये 1991 में तीसरी बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
ये 1996 में चौथी बार लोकसभा के सदस्य बने।
ये 8 जुलाई 1998 से 18 जुलाई 2001 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। पुनः ये
10 अप्रैल 2002 से 2 जून 2002 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।
2002 में ये पांचवीं बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
फिर मई 2004 में छठी बार लोकसभा के सदस्य बने।
मई 2004 से 10 मार्च 2005 तक ये केंद्र में कोयला मंत्री रहे।
इन्होंने जुलाई 2004 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया।पहली बार ये 2 मार्च 2005 से 11 मार्च 2005 तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे।इसके बाद ये पुनः दो बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने।
29 जनवरी 2006 से 28 नवंबर 2006 तक ये केंद्र में कोयला मंत्री रहे।
26 नवंबर 2006 को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इन्हें इस पद से इस्तीफा देना पड़ा।
2009 में ये 15वीं लोकसभा में 7वीं बार सांसद चुने गये।
31 अगस्त 2009 को कोयला और स्टील की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य बने।
ये 23 सितंबर 2009 को वेतन और भत्तों की संयुक्त समिति के सदस्य बने।
मई 2014 में ये आठवीं बार लोकसभा के लिए चुने गये
7 अक्टूबर 2014 में ये खाद्य आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों की स्थायी समिति के सदस्य बने।
ये स्टील मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे।

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