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27 साल से लटकी महिला आरक्षण बिल के सांसद के इस विशेष सत्र में पास होने की संभावना बढ़ी

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बीरेंद्र कुमार झा

केंद्रीय कैबिनेट ने सोमवार की शाम महिला आरक्षण बिल्कुल मंजूरी दे दी है। अब यह बिल संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।आंकड़ों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 15% से कम है जबकि कई राज्यों की विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व 10% से भी कम है।महिला आरक्षण बिल के पारित होने से यह प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा।महिला आरक्षण बिल को संसद से पारित करने के लिए आखिरी बार ठोस प्रयास यूपीए सरकार में वर्ष 2010 ईस्वी में हुआ था,जब राज्यसभा ने इसका विरोध करने वाले कुछ सांसदों को मार्सेलो द्वारा बाहर निकाल दिए जाने के बाद विधेयक को पारित कर दिया था।लेकिन लोकसभा में जाकर यह विधेयक लटक गया। निचले सदन ने इसे पारित नहीं किया।

कांग्रेस ,बीजेपी बिल की हमेशा पक्षधर

बड़े दलों खासकर बीजेपी और कांग्रेस ने हमेशा इस विधेयक का समर्थन किया है, जबकि अन्य छोटे दल इसका विरोध इस मांग के साथ करते रहे हैं कि महिलाओं के लिए 33% दिए आरक्षण के भीतर भी पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जाए।फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद हैं जो कुल संख्या 543 का 15 % से भी कम है।सरकार द्वारा पिछले दिसंबर में संसद के साथ साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14 फ़ीसदी ही है।

राज्य विधानसभा की स्थिति

आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम ,गोवा, गुजरात,हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, उड़ीसा,सिक्कम, तमिलनाडु ,तेलंगाना और त्रिपुरा सहित कई राज्य विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10% से कम है। दिसंबर 2022 की सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार,हरियाणा, पंजाब ,राजस्थान,उत्तराखंड ,उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 10 से 12% महिलाएं विधायक थी। छत्तीसगढ़ ,पश्चिम बंगाल और झारखंड में यह आंकड़ा क्रमश:14.4% ,13.7% और 12.35 प्रतिशत है।

कितने प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव

पिछले कुछ हफ्तों से बीजेडी और बीआरएस सहित कई दल राज्य सभा में पास हुए पुराने महिला आरक्षण विधेयक की जगह नए सिरे से विधेयक को फिर से पेश करने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस ने भी रविवार को अपने हैदराबाद कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में इस पर एक प्रस्ताव पारित किया है ,जबकि बीजेपी ने 18 सितंबर को अपने मंत्रिमंडल की बैठक में महिला आरक्षण पर अपने निर्णय लिया है। बीजेपी संसद के इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को सदन में मंजूरी के लिए पेश करेगी।

हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि नए विधेयक में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव किया जा रहा है और उसमें भी ओबीसी कैटेगरी की महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित किया गया है या नहीं। 2008 के बिल में जिसे लोकसभा के विघटन से पहले 2010 में राज्यसभा में पारित किया गया था ,लोकसभा और विधानसभा के सभी सीटों में से एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव किया गया था।महिला आरक्षण बिल को पास करने की आखिरी कोशिश मनमोहन सिंह के सरकार में हुई थी।

महिला आरक्षण बिल का इतिहास

यूपीए के शासनकाल में वर्ष 2008 और 2010 के असफल प्रयास से पहले भी इस महिला आरक्षण विधेयक वाले मुद्दे का इतिहास उतार – चढ़ाव भरा रहा है, क्योंकि इसी तरह का विधेयक 1996 ,1998 और 1999 में पेश किया गया था। गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति ने 1996 के विधेयक की जांच की थी और 7 सिफारिश की थी।इनमें से पांच को 2008 के विधायक में शामिल किया गया था,जिसमें एंग्लो इंडियन के लिए 15 साल की आरक्षण अवधि और उपआरक्षण शामिल था।

एसपी, आरजेडी और जेडीयू ने किया था कड़ा विरोध

2008 के विधायक का एसपी, आरजेडी और जेडीयू ने कड़ा विरोध किया था।इन दलों ने विधेयक में ओबीसी महिलाओं के लिए भी छैतिज आरक्षण की मांग की थी।संसद में हंगामा को देखते हुए 2008 के विधेयक को संसद की कानून और न्याय संबंधी स्थाई समिति को भेजा गया था,लेकिन समिति आम सहमति तक पहुंचने में विफल रही।ओबीसी महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर समिति ने कहा कि विधेयक के पारित होने के मौजूदा समय में अन्य सभी मुद्दों पर सरकार बिना किसी देरी के उचित समय पर विचार कर सकती है।महिला आरक्षण विधेयक पारित करने के लिए सरकार को संसद के प्रत्येक सदन में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी।

 

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