न्यूज़ डेस्क
कर्नाटक की जीत से कांग्रेस बम बम हैं। चारो तरफ इसकी चर्चा चल रही है। दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत के कांग्रेसी अपनी मूछों पर ताव फेरते नजर आ रहे हैं। जो कल तक मौन साधे बैठे थे ,अब हुंकार भर रहे हैं। लेकिन सबसे राजनीति राजनीति हरियाणा में होती दिख रही है। यह राजनीति सुरजेवाला की सफलता को लेकर है। सुरजेवाला कर्नाटक में जो कमाल किया है उसकी धमक हरियाणा की राजनीति में ज्यादा देखी जा रही है। कई लोग मान रहे हैं कि सुरजेवाला की सफलता से हरियाणा के सबसे बड़े कांग्रेसी क्षत्रप हुड्डा की परेशानी परेशानी बढ़ेगी।
हरियाणा के पूर्व मंत्री रणदीप सुरजेवाला कर्नाटक के प्रभारी हैं। वे कोई एक साल से कर्नाटक के प्रभारी हैं और इस दौरान उन्होंने जबरदस्त मेहनत भी की। वे लगातार कर्नाटक में डटे रहे और उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव की रणनीति बनाने तक वे हर जगह स्थानीय नेताओं के साथ मौजूद रहे। टिकट के फैसले में भी सुरजेवाला का रोल बहुत सकारात्मक था। उन्होंने किसी तरह की गड़बड़ी की बजाय चुनाव जीतने के पैमाने को आगे रखा।
इस जीत के बाद सुरजेवाला का कद बढ़ेगा और उसके साथ साथ हरियाणा कांग्रेस के सबसे बड़े क्षत्रप भूपेंदर सिंह हुड्डा की चिंता भी बढ़ेगी। ध्यान रहे हरियाणा में हुड्डा को चुनौती देने वाले पुराने क्षत्रप जैसे कुमारी शैलजा, किरण चौधरी आदि किनारे हो गए हैं और बीरेंद्र सिंह पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं। अब अकेले सुरजेवाला बचे हैं, जो हुड्डा को चुनौती देते हैं। दोनों के बीच खींचतान की खबरें अक्सर आती हैं। उनके कर्नाटक जाने के बाद हरियाणा में हुड्डा का एकछत्र राज बना था। उनकी पसंद का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे अपनी इस स्थिति को बनाए रखना चाहेंगे तो सुरजेवाला राज्य की राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाएंगे। टकराव की तैयारी अभी से शुरू हो गई है और इसका संकेत नतीजों के दिन हुड्डा के अपने सारे विधायकों को लेकर जंतर मंतर पर जाने और धरना दे रहे पहलवानों के समर्थन में दिखा। उन्होंने इस काम के लिए नतीजों का दिन चुना ताकि प्रदेश में सुरजेवाला से ज्यादा चर्चा उनके नाम की हो।
आगे क्या होगा इसे तो देखना होगा। लेकिन लोग यह भी मान रहे हैं कि बदलती राजनीति में अगर हुड्डा और सुरजेवाला एक हो गए तो हरियाणा की राजनीति कांग्रेस के पक्ष में आ सकती है। जानकार मान रहे हैं कि पार्टी आलाकमान को भी इसका भान तो हो रहा है लेकिन पार्टी आगे क्या कुछ फैसला लेता है इसे देखना होगा। अगर पार्टी एक जुट होकर चुनाव लड़ेगा तो इसके परिणाम भी सुखद हो सकते हैं और अगर मनमुटाव बढ़ा तो खेल बिगड़ भी सकता है।

