रेबीज एक ऐसी वायरल बीमारी है, जिससे हर साल दुनिया में हजारों लोगों की मौत होती है।यह बीमारी आमतौर पर संक्रमित जानवर की लार के जरिए काटने या खरोंचने से फैलती है। इसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि जब तक लक्षण दिखाई नहीं देते, तब तक ही इलाज से संक्रमण को रोका जा सकता है। हालांकि, एक बार रेबीज के लक्षण शुरू हो जाएं तो बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए लक्षण शुरू होने के बाद इसका प्रभावी इलाज ढूंढना बड़ी चुनौती बना हुआ है। आइए जानते हैं कि रेबीज का इलाज मुश्किल क्यों है और इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए।
रेबीज का वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद नसों के रास्ते दिमाग और रीढ़ की हड्डी तक पहुंचता है।केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में पहुंचने के बाद यह गंभीर नुकसान करता है। इस स्थिति में वायरस को रोकना और शरीर को उससे उबरने में मदद करना बेहद मुश्किल हो जाता है। दिमाग की सुरक्षा करने वाली एक परत को ब्लड-ब्रेन बैरियर कहा जाता है। यह कई हानिकारक पदार्थों को दिमाग तक पहुंचने से रोकती है, लेकिन इसकी वजह से कुछ दवाओं और प्रतिरक्षा से जुड़ी चीजों का दिमाग तक पहुंचना भी कठिन हो जाता है। वैज्ञानिक अब भी ऐसी प्रभावी दवाओं और इलाज पर काम कर रहे हैं, जो लक्षण शुरू होने के बाद वायरस को रोक सकें।
जब रेबीज का वायरस दिमाग तक पहुंचता है तो वहां गंभीर सूजन और तंत्रिका तंत्र को नुकसान होता है।शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, कमजोरी या काटे गए स्थान पर दर्द और झुनझुनी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।बीमारी बढ़ने पर मरीज को बेचैनी, भ्रम, निगलने में परेशानी, पानी से डर या लकवा जैसी समस्याएं होने लगती हैं।गंभीर स्थिति में सांस लेने और दिल के काम करने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।इसी वजह से लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज लगभग हमेशा जानलेवा होता है। मौत कितने समय में होगी, यह हर मरीज में एक जैसा नहीं होता। रेबीज के इलाज के लिए मिल्वौकी प्रोटोकॉल जैसी विधियों को भी आजमाया गया है।
रेबीज से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है कि किसी संदिग्ध जानवर के काटने या खरोंचने के बाद बिना देर किए सही उपचार लिया जाए।सबसे पहले घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं। इसके बाद तुरंत अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र जाएं। डॉक्टर घाव और संपर्क की स्थिति के अनुसार, रेबीज वैक्सीन और जरूरत पड़ने पर रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन लगाने की सलाह देते हैं। इन उपायों का उद्देश्य वायरस को दिमाग तक पहुंचने से पहले रोकना है।घाव छोटा होने या जानवर पालतू होने के कारण इलाज टालना ठीक नहीं है। लक्षण आने का इंतजार भी न करें, क्योंकि संक्रमण के बाद लक्षण दिखने में कई सप्ताह या महीने लगते हैं।समय पर उपचार लेने से रेबीज को रोका जा सकता है।

