ज्ञानवापी के एएसआई सर्वे में जीपीआर का होगा उपयोग,जानें क्या है जीपीआर

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बीरेंद्र कुमार झा

वाराणसी में ज्ञानवापी सर्वे पर लगी रोक के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है। गुरुवार को फिर मामले में विभिन्न मुद्दों पर आम जानकारी करेगा जिससे इसके नतीजे पर पहुंचा जा सके। हाईकोर्ट के फैसले पर एएसआई के सर्वे का भविष्य टिका हुआ है।हिंदू पक्ष को इससे बड़ी उम्मीद हैं।

आधुनिक तकनीक से स्ट्रक्चर की जांच

इस केस की सुनवाई का केंद्र बिंदु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)का सर्वे है जो ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) पर आधारित है। हिंदू पक्ष इसे सच्चाई सामने लाने के लिए सबसे अहम बता रहा है। इसका दावा है कि ज्ञानवापी का पूरा सच एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे के जरिए ही सामने आ सकता है। आधुनिक तकनीक से स्ट्रक्चर की जांच किया जाना पूरी तरह से सही है। संबंधित एरिया की पैमाइश और फोटोग्राफी रडार इमेजिंग से की जाएगी।

मुस्लिम पक्ष ने साक्ष्य नहीं होने का दिया हवाला

इस सर्वे के दौरान निर्माण को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।ऐसे में इस पर आपत्ति दाखिल करना किसी भी हालत में ठीक नहीं है।हालांकि मस्जिद की इंतजामिया कमेटी की ओर से इसे लेकर तमाम सवाल खड़े किए गए हैं। मुस्लिम पक्ष ने कहा है कि बिना किसी साक्ष्य के तमाम दावे किए जा रहे हैं,जिसका कोई आधार नहीं है।

एएसआई के वैज्ञानिक से भी पूछे गए सवाल

दोनों पक्षों की अपनी दलीलों के बीच मुख्य न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर ने ज्ञानवापी परिसर में सर्वे कराए जाने के मामले में दाखिल अंजुमन इंतजामिया कमेटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए एएसआई के वैज्ञानिक से भी तमाम सवाल किए। एसआई की तरफ से एडिशनल डिप्टी डायरेक्टर आलोक त्रिपाठी कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने कहा सर्वे में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाएगा कि ज्ञानवापी परिसर को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचे

अभी तक हुआ एएसआई सर्वे

प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी तक ज्ञानवापी सर्वे का केवल 5% काम ही पूरा हुआ है। पश्चिमी दीवार के पास और कुछ अन्य खुली जगहों पर ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार यानी जीपीआर का उपयोग किया गया है। अभी तक सर्वे के दौरान हर कार्य की फोटो खींची गई और वीडियोग्राफी कराई गई है। टीम ने छह समूह में परिसर के अलग-अलग हिस्सों की जांच की है।

निर्णय से पूर्व सर्वे के तरीके से तसल्ली कर लेना चाहता है हाई कोर्ट

हाई कोर्ट द्वारा सर्वे के तरीके से जुड़े सवाल को लेकर एसआई ने हाई कोर्ट को जीपीआर विधि और फोटोग्राफी विधि से सर्वेक्षण होने की जानकारी दी। इस प्रक्रिया की पूरी जानकारी देते हुए एसआई की तरफ से कहा गया कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण से मूल ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा। इस बीच कोर्ट ने एएसआई से पूछा कि अबतक कितने सर्वे हो चुका है और कब तक इस सर्वे को पूरा करा लोगे।

दरअसल एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे में बार-बार जिस ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार ‘ जीपीआर ‘ का नाम आ रहा है उसे लेकर पूरी तरह से संतुष्ट हो लेना चाहता है कि सर्वे के दौरान कोई क्षति हो सकती है या नहीं। मुख्य न्यायाधीश इस मामले में एसआई से उस मेथड के बारे में जानना चाहते हैं जिसके जरिए एएसआई की टीम सर्वे की बात कर रही है। कोर्ट में सर्वे सिस्टम का डेमो भी दिखाए जाने की बात कही जा रही है।

यह पूरी कवायद इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया है कि सर्वे से संरचना को क्षति हो सकती हैं, जिला जज को सर्वे कराए जाने का अधिकार नहीं है और यह आदेश गलत है।वहीं इस मामले में मंदिर पक्ष की ओर से जवाब दिया गया कि सर्वे के बाद ही मंदिर के स्ट्रक्चर का सही पता चल सकता है।यह भी बताया गया कि एएसआई की टीम दो तकनीकों के माध्यम से सर्वे कर रही है। इसमें वह सिर्फ फोटोग्राफी और इमेजिंग करेगी जिससे मस्जिद को किसी तरह की कोई क्षति नहीं होगी।

क्या है जीपीआर और क्यों होता है इसका उपयोग

जीपीआर भूमि की सतह से नीचे के स्तरों को देखने और वस्तुओं की गहराई का मापन करने के लिए एक उपयोगी उपकरण होता है। इसका उपयोग भू संरक्षण,भूविज्ञान, खनिज खोज, जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय अध्ययन में किया जाता है। जीपीआर उपकरण भूमि के नीचे गहराई की तस्वीरों को तैयार करता है और वस्तुओं के संरचना, गहराई और अन्य पैरामीटर्स का विश्लेषण करता है।

पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति पर होता है काम

ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार यानी जीपीआर पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति से काम करता है। इसके द्वारा विभिन्न चरणों में कार्यों का संपादन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन और भू वस्तुओं के नीचे की संरचना का अध्ययन किया जाता है। जीपीआर द्वारा निम्न चरणों में कार्यों का संपादन किया जाता है

* सेटअप लोकलाइजेशन: सबसे पहले एक ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार उपकरण का चयन किया जाता है जो उच्च तकनीकी योग्यतावाला होता है और भू मापदंडों के अनुसार उपयुक्त होता है। इसके बाद जीपीआर उपकरण को भूमि पर स्थानांतरित किया जाता है। यह उपकरण रडार ,ट्रांसमीटर और रिसीवर का संयोजन होता है।

* रडार ऑपरेशन: जीपीआर उपकरण को भूमि पर चलाया जाता है।इस दौरान रडार ट्रांसमीटर भूमि की सतह से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें उत्पन्न करता है,जो भूमि के नीचे प्रवेश करती है। ये तरंगे भूमि के विभिन्न परसों से गुजरती है और संरचनाओं की गहन जानकारी इकट्ठा करती हैं जो सबसे अंत में डाटा के जरिए सामने आता है।

* डाटा एक्विजिशन: जीपीआर रडार चलाने के दौरान तरंगे वस्तुओं से संगठित होती हैं और विभिन्न स्थानों पर परावर्तित होती हैं।रडार रिसीवर इन परावर्तित तरंगों को ग्रहण करता है और उन्हें डिजिटल डाटा में परिवर्तित करता है।रडार स्कैनिंग के माध्यम से भूमि के नीचे का चित्रण करता है ,यहां तक की यह जमीन की गहराई के विभिन्न स्तरों को भी दिखा सकता है।

* डाटा एनालायसिस: जीपीआर डाटा का विश्लेषण भूगर्भीय तत्व को पहचानने के लिए किया जाता है। सरल तरीके से समझें तो डिजिटल डाटा विश्लेषण के जरिए जमीन के नीचे की वस्तुओं की गहराई, संरचना और अन्य विशेषताओं का मूल्यांकन किया जाता है।यह पूरी प्रक्रिया डेटा विश्लेषण के तौर पर सबसे सबके सामने आती है। इसमें कई बिंदुओं का गहराई से जानकारी होती है जो सामान्य तौर पर संभव नहीं होता है।

*मैपिंग: डेटा विश्लेषण के बाद भू मानचित्र तैयार किया जाता है इसमें कई बारीक बिंदु शामिल होते हैं या मानचित्र संबंधित जगह का गहन विश्लेषण और भू वैज्ञानिक अध्ययन के लिए काफी उपयोगी होता है।

ज्ञानवापी के सर्वे में जीपीआर है बेहद अहम

जीपीआर के माध्यम से भू संरक्षण, भूविज्ञान, खनिज संसाधन, अनुसंधान ,भू मानचित्र,जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय अध्ययन और जल संसाधनों के अध्ययन जैसे क्षेत्रों में विस्तार पूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। जमीन के नीचे मौजूद किसी ऑब्जेक्ट की उम्र का पता लगाने के लिए जीपीआर तकनीक से रडार सेंसर का इस्तेमाल किया जाता है।रडार सेंसर ऑब्जेक्ट से टकराने के बाद उसकी आयु की गणना कर लेता है। इसलिए ज्ञानवापी के एएसआई सर्वे में इसका अहमियत बहुत ज्यादा है।

जमीन के इतिहास पर कब्जे की अवधि की मिलती है सटीक जानकारी

जीपीआर जमीन के नीचे छिपी कलाकृतियों और वस्तुओं का पता लगा सकता है। जीपीआर पुरातत्वविद को किसी स्थल की उपसतह की स्पेक्ट्रोग्राफी का विश्लेषण करने में मदद करता है।यह तलछट और मिट्टी की विभिन्न परतों के बीच के अंतर का विश्लेषण करता है,जिससे संबंधित संरचना के इतिहास, कब्जे की अवधि और संभावित गड़बड़ी की घटनाओं के बारे में जानकारी मिलती है।

 

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