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ललन सिंह से जेडीयू अध्यक्ष का पद छीनने के बाद अब नीतीश के आगे की राह

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बीरेंद्र कुमार झा

जैसा की विपक्षी गठबंधन इंडिया की दिल्ली में हुई चौथी बैठक में ममता बनर्जी के द्वारा विपक्षी गठबंधन के पीएम उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रस्तावित करने के बाद से ही नीतीश कुमार के हाव-भाव दिखने लगे थे ,उसमें यह तय माना जा रहा था कि नीतीश कुमार जल्दी पार्टी की कमान अपने हाथों में ले लेंगे।दरअसल उन्हें लग रहा था कि एक तो पार्टी अध्यक्ष के रूप में ललन सिंह ने ढंग से इंडिया गठबंधन के समक्ष उनकी दावेदारी पेश नहीं की और दूसरा यह कि वे लालू यादव के करीबी होकर जेडीयू को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में उन्होंने ललन सिंह का इस्तीफा लेने का पूरी तरह से मन बना लिया था। आज ललन सिंह के इस्तीफा के बाद इस घटना का पटाक्षेप हो गया,लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा खुद जेडीयू अध्यक्ष का पद संभालने के बाद एक नए अध्याय की शुरुआत भी हो गई कि अब नीतीश की राह क्या होगी ? क्या यह आरजेडी के साथ पूर्ववत चलती रहेगी,जिसके बारे में कहा जाता था कि जल्दी ही जेडीयू का विलय आरजेडी में हो जाएगा और तेजस्वी यादव बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभालेंगे या फिर एनडीए का उन्हें साथ मिलेगा और वे यह साथ लेकर बांकी बचे समय तक आगे भी मुख्यमंत्री रहेंगे?या फिर यह सरकार गिर जाएगी और बिहार में समय पूर्व विधानसभा का चुनाव कराया जाएगा?

संभावना नीतीश कुमार के आरजेडी के साथ बने रहने का

आज की जनता दल यूनाइटेड की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पहले जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह के इस्तीफा देने और बाद में नीतीश कुमार द्वारा इस पद को संभालने के बाद महागठबन्धन के सबसे बड़े दल आरजेडी भी अचंभित है। माना जा रहा था की लालू प्रसाद यादव के द्वारा नीतीश कुमार पर इस बात का दबाव बनाया जा रहा था की वे जल्दी ही बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी तेजस्वी यादव को सौंप दें। इसी क्रम में यह बात भी उठ रही थी कि ललन सिंह जेडीयू का विलय आरजेडी में कर देंगे और इसके बाद तेजस्वी के लिए मुख्यमंत्री बनना आसान हो जाएगा। लेकिन अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा खुद ही पार्टी की कमान संभाल लिए जाने के बाद इस बात की संभावना खत्म हो जाएगी और तब लालू प्रसाद यादव के लिए भी यह तय करना कठिन हो जाएगा कि वह नीतीश कुमार से नाता तोड़कर समय पूर्व चुनाव में उतरे या नीतीश कुमार के साथ बने रहकर विधानसभा के बाकी समय तक सत्ता सुख लेते रहें।मुख्यमंत्री नहीं तो उपमुख्यमंत्री ही सही, सत्ता में तो बने रहेंगे। इस प्रकार से नीतीश कुमार ने आरजेडी पर भी एक दबाव बनाने का प्रयास किया है जिससे आरजेडी तनाव में रहे और नीतीश कुमार को आगे के निर्णय मनमर्जी से लेने में कोई कठिनाई न हो और उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी विधानसभा की समय तक सुरक्षित रह जाए।नीतीश कुमार के इस चाल के बाद अब तेजस्वी यादव ने भी अपने ऑस्ट्रेलिया की यात्रा रद्द कर दिया है ताकि आरजेडी के अंदर नीतीश कुमार के साथ रहने या ना रहने को लेकर व्यापक विचार विमर्श कर आगे की रणनीति बनाई जाए।

संभावना एनडीए के साथ जाने की

वैसे तो बीजेपी के साथ वाले गठबंधन को तोड़कर आरजेडी खेमा वाले महागठबंधन में आने के बाद से नीतीश कुमार और बीजेपी के बड़े-बड़े नेता यह कहते आए हैं कि वे एक दूसरे के साथ नहीं आएंगे,लेकिन राजनीति में कहना और कहकर पलट जाना और फिर इसके लिए कोई नई परिभाषा गढ़ लेना कोई बड़ी बात नहीं है। नीतीश कुमार इससे पहले दो बार बीजेपी और आरजेडी के साथ ऐसा कर भी चुके हैं।ऐसे में अब अंतरात्मा की आवाज पर नहीं तो ,परमात्मा की आवाज बताकर बीजेपी के साथ हो सकते हैं।साथ ही बिहार में बीजेपी की अपनी स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है।जब जब उसने यहां सफलता पाई है तब तब इसका गठबंधन नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की साथ थी। ऐसे में यह भी पिछला सबकुछ भूलकर नीतीश के साथ हो ले तो कोई आश्चर्य नहीं! नीतीश कुमार के बारे में यह कहा भी जाता है कि वे जब एक पार्टी के लिए दरवाजा बंद करते हैं, तो दूसरी पार्टी के लिए खिड़की खुली छोड़ते हैं, ताकि उस खिड़की के सहारे वह दल नीतीश से जुड़कर इन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद करे।नीतीश कुमार की बीजेपी के लिए यह खिड़की इस बार भी खुली थी। तभी नीतीश कुमार के एनडीए से नाता तोड़कर आरजेडी खेमे में जाने के बावजूद हरिवंश जो जेडीयू को बीजेपी से जोड़ने में मददगार रहे हैं ,उन्हें राज्यसभा का उपसभापति बने ही रहने दिया था।साथ ही जनता दल यूनाइटेड द्वारा नई संसद भवन के उद्घाटन में जनता दल यूनाइटेड के बहिष्कार की घोषणा के बावजूद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का वहां जाने और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के संदेश को पढ़ने के बावजूद उन पर कोई कार्रवाई न होना, यह बताने के लिए पर्याप्त था कि नीतीश कुमार देर समीर एनडीए में भी जाने का विकल्प खुला रखना चाहते हैं। बात वर्तमान संदर्भ की जाए तो इस बात की अटकल तभी से लगने लगी थी, जब हाल में अमित शाह एक केंद्रीय कार्यक्रम को लेकर बिहार में पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्री के साथ बैठक कर रहे थे, तभी नीतीश कुमार और अमित शाह मीटिंग के बाद अलग से कुछ देर के लिए मिले थे।इस मुलाकात के बाद यह चर्चा भी प्रारंभ हो गई थी की हो ना हो,कहीं नीतीश कुमार एनडीए के साथ चले जाएं! हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के कई बड़े नेता याह कहते रहे हैं कि बीजेपी का दरवाजा नीतीश कुमार के लिए सदा सदा के लिए बंद हो गया है। वैसे भी नीतीश कुमार की भी अब वह पुरानी हैसियत नहीं है।लेकिन इसके बावजूद उनके पास अपने स्वजाति और अति पिछड़े वर्गों का कुछ वोट बैंक जरूर है ,जो बीजेपी को आगामी चुनाव में मदद कर सकता है गौरतलब है कि बीजेपी का भी यहां अपना जनाधार बहुत मजबूत नहीं है। ऐसे में वह अपनी बातों से पलट कर अगर नीतीश को साथ ले ले तो कोई आश्चर्य नहीं।हालांकि इस बार बीजेपी को नीतीश को साथ लेने में एक बड़ा खतरा भी नजर आ रहा है और वह खतरा है नीतीश कुमार के प्रति एंटी इनकमबैंसी फैक्टर का। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार के विरुद्ध एंटी इनकमबैंसी फैक्टर इस स्तर पर है कि वह बीजेपी के अपने प्रयासों को भी नुकसान पहुंचा सकता है।

संभावना समयपूर्व चुनाव होने की

बिहार में समयपूर्व चुनाव होने की संभावना थोड़ी कम नजर आ रही है ।भारतीय जनता पार्टी के नेता गिरिराज सिंह ने कहा कि ललन सिंह को हटाकर नीतीश कुमार द्वारा खुद जनता दल यूनाइटेड की कमान संभालने के बाद बाद अब भले ही जेडीयू का आरजेडी में विलय टल जाए,लेकिन ललन सिंह और लालू प्रसाद के निकटता की वजह से ये लोग जेडीयू के कुछ सांसदों को टपका कर आरजेडी खेमे में लाकर नीतीश के बिना भी तेजस्वी यादव की सरकार बना सकते हैं। इससे नीतीश कुमार की कुर्सी तो चली जाएगी लेकिन बिहार में सरकार बाकी समय तक चलता रहेगा। एक दूसरी संभावना नीतीश कुमार द्वारा राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा देकर राज्य में चुनाव कराने की बात हो सकती है ,लेकिन इस स्थिति में अगर आरजेडी जदयू के कुछ विधायकों को तोड़कर अपने पक्ष में कर लेती है और फिर राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायक होने का दावा पेश करती है तो इस स्थिति में भी भले ही नीतीश कुमार की सरकार गिर जाए ,लेकिन तेजस्वी की सरकार बन सकती है। हां ! अगर बीजेपी राज्यपाल को सरकार भंग करने कह दे तो बात कुछ अलग भी हो सकती है।इसके अलावा अगर राजद के महागठबंधन से नाता तोड़कर किसी प्रकार नीतीश कुमार एनडीए का साथ ले लेते हैं तो भी नए गठबंधन वाली सरकार बाकी समय तक सत्ता में रह सकती है। अब आगे होता क्या है यह तो आने वाला वक्त बताएगा

 

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