महाराष्ट्र और देश के संदर्भ में विदर्भ का अस्तित्व और प्रभावी मुद्दे

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बीरेंद्र कुमार झा
कभी मध्य प्रदेश का हिस्सा रहा विदर्भ का महाराष्ट्र के इतिहास और राजनीति के साथ – साथ देश में भी हमेशा महत्वपूर्ण स्थान रहा है।भौगोलिक स्थिति की बात करें तो विदर्भ नागपुर और अमरावती दो स्पष्ट भागों में बंटा है।विदर्भ का सबसे बड़ा शहर नागपुर है ।यह नारंगी के उत्पादन एवम व्यापार के लिए जाना जाता है।यह महाराष्ट्र की उपराजधानी है।इसलिए नागपुर की अपनी बड़ी राजनीतिक अहमियत भी है।

महाराष्ट्र विधानसभा की कुल 288 विधानसभा सीटों में से 62 सीटें केवल विदर्भ में है।महाराष्ट्र विधानसभा का शीतकालीन सत्र नागपुर में होता है। इसलिए विदर्भ की प्रशासन के नज़रिये से भी ख़ास अहमियत है।

एक नज़र विदर्भ के राजनीतिक प्रभाव पर

बात अगर विदर्भ की राजनीति की की जाए तो प्रारंभिक समय से लेकर एक लंबे समय तक इस क्षेत्र पर कांग्रेस का प्रभाव रहा ।विदर्भ से जीतने वाले कांग्रेसी नेता हमेशा से दिल्ली के नेताओं के क़रीबी होने के लिए जाने जाते रहे हैं।जातीय समीकरण का ख्याल रखते हुए कांग्रेस ने विदर्भ में अपनी जड़ें मज़बूत की थी।कांग्रेस के कार्यकाल में विदर्भ ने महाराष्ट्र को मारोतराव कन्नमवार, वसंतराव नाइक, सुधाकरराव नाइक जैसे मुख्यमंत्री दिए हैं।

बीजेपी का बढ़ता प्रभाव

समय के साथ विदर्भ कांग्रेस में आंतरिक संघर्ष बढ़ा और बीजेपी और शिवसेना ने इसका फ़ायदा उठाया।2014 ईस्वी में बीजेपी शिवसेना गठबंधन की बनी सरकार में विदर्भ के नागपुर दक्षिण – पश्चिमी से जीते देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे।2019 ईस्वी में जनता ने एक बार फिर से बीजेपी शिव सेना के पक्ष में मतदान किया,लेकिन मुख्यमंत्री के सवाल पर उद्धव ठाकरे से हुई टकराहट में बीजेपी सत्ता से छिटककर दूर हो गई और उद्धव ठाकरे एनसीपी तथा कांग्रेस का सहयोग लेकर 28 नवम्बर 2919 को मुख्यमंत्री बन बैठे। कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक ठाक चला, लेकिन फिर बीजेपी ने ऐसी चाल चली की 29 जून 2022 को उद्धव ठाकरे को बड़े बेआबरू होकर इस्तीफा देना पड़ा।इतना ही नही इसके बाद शिव सेना टुकड़ों में बंट गयाऔर फिर 30 जून को शिंदे गुटवाले शिव सेना के एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। देवेंद फड़नविश इस सरकार में उपमुख्यमंत्री बने,लेकिन सरकार का कोई भी प्रमुख निर्णय बिना विदर्भ के इस नेता फड़नविस के सहमति के नही होते हैं।

बीजेपी में विदर्भ क्षेत्र के कद्यावर नेता की बात करें तो नितिन गडकरी के योगदान को कोई नहीं भूल सकता। यहां की जनता में नितिन गडकरी का इतना पकड़ है कि इन्होंने कानपुर संसदीय क्षेत्र से लगातार दो दो बार चुनाव जीता है, जबकि पूर्व में यह कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। भू – तल परिवहन और जहाजरानी मंत्री होने के नाते नितिन गडकरी सबसे ज्यादा सड़क निर्माण करने वाले मंत्री माने जाते हैं। बीजेपी में इनके कद अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की लालकृष्ण आडवाणी की जगह जब नरेंद्र मोदी को बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनाने की चर्चा चली, तब बीजेपी का नेतृत्व इन्हीं के हाथों में था ,हालांकि बाद में चुनाव के वक्त इनका कार्यकाल पूरा हो जाने के कारण बीजेपी अध्यक्ष की बागडोर दोबारा राजनाथ सिंह के हाथों में जा पहुंची।

विदर्भ के नागपुर में है आरएसएस मुख्यालय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय नागपुर में स्थित है। आरएसएस का मुख्यालय होने के कारण विदर्भ के इस क्षेत्र को बीजेपी का चिंतन शिविर माना जाता है। बीजेपी की केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक की कार्यशैली,संघ के इस चिंतन शिविर से निकली विचारधारा से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होती है।

आरएसएस ने बीजेपी को कई बड़े नेताओं की सौगात दी है।लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक कई नेता संघ के सानिध्य में रहकर कुंदन की तरह दमके और न सिर्फ बीजेपी में बल्कि सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।नरेंद्र मोदी ने तो भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देश और विदेश हर जगह भारत का परचम लहराया है।

विदर्व के महत्वपूर्ण मुद्दे

जब विदर्भ की राजनीति की बात आती है, तो एक अलग विदर्भ का मुद्दा हमेशा चर्चा में होता है।विभिन्न राजनीतिक दल इसे लेकर समय – समय पर वादे करते रहे ,लेकिन बात आई गई होती रही।साल 2014 में जब केंद्र और राज्य में बीजेपी की सरकारें सत्ता में आईं तो इस मुद्दे को एक बार फिर से हवा मिली क्योंकि बीजेपी के कई नेताओं ने अलग विदर्भ राज्य के गठन का वादा किया था, लेकिन यह वादा तब भी पूरा नहीं हुआ।उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री वाली शिव – सेना एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार की तो बात छोड़िए,एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बीजेपी के वर्चस्ववाली शिव सेना, बीजेपी और एनसीपी अजीत पवार गुट के गठबंधन वाली सरकार भी विदर्भ को अलग राज्य बनाने की दिशा में कुछ करती नहीं दिखती है।

विदर्भ की राजनीति में किसानों की समस्या भी एक प्रमुख मुद्दा है.

विदर्भ का इलाका आमतौर पर उन्नत कृषि के लिए जाना जाता है,जिसमें लागत अधिक आती है।इसके लिए ये बड़े पैमानों पर बैंकों से ऋण लेते हैं।सब कुछ अनुकूल रहा तब तो हर किसी की बल्ले – बल्ले,लेकिन मौसम जरा भी प्रतिकूल हुआ तो सबकी शामत।बैंकों के तकादे और सूदखोरों की जिल्लत से बचने के लिए कई बार किसान सामूहिक। आत्महत्या तक कर लेते हैं।

 

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