ट्रंप ने की यूएस-चीन रिश्तों की तारीफ, लेकिन जिनपिंग ने ताइवान पर किया अलर्ट

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ करीब दो घंटे लंबी अहम बैठक की।खबरों के मुताबिक, वाशिंगटन रवाना होने से पहले दोनों नेताओं के बीच एक और दौर की बातचीत हो सकती है, जिसमें ईरान युद्ध, व्यापार, तकनीक और ताइवान जैसे मुद्दों पर बड़े फैसले संभव हैं।

बैठक के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि अमेरिका और चीन नए द्विपक्षीय संबंधों पर सहमत हुए हैं।उन्होंने बताया कि यह नया विजन अगले तीन वर्षों तक दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को दिशा देगा।

हालांकि, ताइवान मुद्दे पर शी ने अमेरिका को साफ चेतावनी दी।उन्होंने कहा कि अगर ताइवान को लेकर तनाव बढ़ता है, तो इससे दोनों देशों के संबंध खराब हो सकते हैं। उन्होंने अमेरिका से इस मुद्दे पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की अपील की और कहा कि सही तरीके से संभालने पर ही रिश्ते मजबूत रहेंगे।

बैठक में दोनों देशों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। व्हाइट हाउस के अनुसार, यह बातचीत सकारात्मक रही और इसमें आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।

चर्चा के दौरान अमेरिकी कंपनियों को चीन के बाजार में अधिक पहुंच देने, चीन द्वारा अमेरिकी उद्योगों में निवेश बढ़ाने, फेंटेनिल से जुड़े रसायनों की तस्करी रोकने और कृषि उत्पादों के व्यापार को बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भी बात हुई।

इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों की चिंता सामने आई।उन्होंने माना कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए इस मार्ग का खुला रहना बेहद जरूरी है।शी जिनपिंग ने इसके सैन्यीकरण और किसी तरह के टोल लगाने का विरोध किया।यह बैठक अमेरिका-चीन संबंधों को संतुलित करने और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

ईरान युद्ध के बीच डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक को लेकर व्हाइट हाउस ने बड़ा दावा किया है। अमेरिका और चीन दोनों इस बात पर सहमत हुए हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहना चाहिए, ताकि वैश्विक बाजार में ऊर्जा (तेल-गैस) की सप्लाई बिना रुकावट जारी रह सके।शी जिनपिंग ने साफ कहा कि चीन इस समुद्री मार्ग के सैन्यीकरण (militarization) और इसके इस्तेमाल पर किसी भी तरह का शुल्क (टोल) लगाने का विरोध करता है।

चीन ने संकेत दिया है कि वह भविष्य में ज्यादा अमेरिकी तेल खरीद सकता है, ताकि इस रणनीतिक मार्ग पर अपनी निर्भरता कम कर सके। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि ईरान को किसी भी हालत में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।

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