उत्तर प्रदेश में जातीय जनगणना पर रार ,सपा और बसपा को है इस गणना का इन्तजार !

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अखिलेश अखिल 
बिहार में जातिगत जनगणना क्या शुरू हुई यूपी की राजनीति हिचकोले मारने लगी। यूपी में विधानमंडल का सत्र चल रहा है और विपक्ष के नारे जातिगत जनगणना को लेकर लग रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष में रार है लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो बहन मायावती को जातिगत जनगणना का इंतजार है। विपक्ष की पार्टियां सरकार के पास पहुंची की जातिगत जनगणना कराई जाए लेकिन योगी सरकार विपक्ष की कहाँ सुनते ! उन्होंने इंकार कर दिया। कहा यह सब केंद्र सरकार का काम है। और आगे कहा कि इससे समाज का तानाबाना ख़राब होगा।    
    सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा जातीय जनगणना से ही लोकतंत्र होगा मजबूत। रामराज और समाजवाद तभी संभव है, जब जातीय जनगणना होगी। जातीय जनगणना से ही भेदभाव खत्म होगा और लोकतंत्र मजबूत होगा। मौजूदा समय में यह सबसे जरुरी है। उड़ाए कांग्रेस की भी यही आवाज है। वह भी इसकी मांग कर रही है लेकिन उसके पास संख्या बल कहाँ ! लेकिन आवाज तो निकल रही है। कांग्रेस की यूपी इकाई जोर शोर से इसे उठा रही है। इसके साथ ही बसपा सुप्रीमो मायावती भी जातीय जनगणना की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सबकी निगाहें यूपी पर हैं कि यह प्रक्रिया कब शुरू होगी।             
      यूपी में मुख्य विपक्षी दल सपा का कहना है कि देश की 60 फीसदी राष्ट्रीय संपत्ति पर देश के 10 फीसदी समृद्ध सामान्य वर्ग के लोगों का कब्जा है। जातीय जनगणना से सभी वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में नौकरियों व अन्य संसाधनों में हिस्सेदारी मिल सकेगी। इससे नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। इंडिया के सभी घटक दल भी अब जातीय जनगणना के पक्ष में हैं।
                    प्रदेश सरकार जातीय जनगणना के लिए तैयार नहीं है। प्रदेश सरकार ने विधानसभा में लिखित उत्तर में कहा कि जातीय जनगणना राज्य का नहीं, बल्कि केंद्र का विषय है। भाजपा समेत जो पार्टियां जातीय जनगणना की समर्थक नहीं हैं, उनका मानना है कि ये समाज को बांटने वाला कदम होगा। हालांकि, सार्वजनिक मंचों से कई बार भाजपा के पिछड़े वर्ग का चेहरा माने जाने वाले केशव प्रसाद मौर्य जातीय जनगणना का समर्थन कर चुके हैं।
                बता दें कि साल 2011 में सामाजिक आर्थिक और जातीय जनगणना करवाई तो गई, लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। साल 2015 में कर्नाटक में जातीय जनगणना करवाई गई, लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।
                 केंद्र की कांग्रेस से लेकर भाजपा तक की सरकारें जातीय जनगणना से परहेज करती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले से जुड़े मामलों में दोहराया कि कानून के हिसाब से जातीय जनगणना नहीं की जा सकती क्योंकि, संविधान जनसंख्या को मानता है, जाति और धर्म को नहीं मानता।  
                     लेकिन बिहार में जारी जातिगत जनगणना ने यूपी की राजनीति में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है। बिहार में जनवरी 2023 में जाति आधारित जनगणना की प्रक्रिया शुरू हुई। बिहार सरकार ने सर्वे करवाने की जिम्मेदारी वहां के सामान्य प्रशासन विभाग को सौंपी है। वहां जातीय जनगणना से संबंधित 80% काम पूरा हो चुका है। पटना हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाने संबंधी सभी याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि राज्य सरकार योजनाएं तैयार करने के लिए सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को ध्यान में रखकर गणना करा सकती है। इससे भविष्य में सरकारी योजना का लाभ देना आसान होगा। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई, पर वह खारिज हो गई।

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