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बिहार में विशेष मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उससे उसके सवाल

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बिहार में चल रही मतदाता विशेष पुनरीक्षण संशोधन की बात करें तो चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत इसे करने की बात करते हुए एक सवाल उन राजनीतिक दलों पर कर रहे हैं जो इसका विरोध कर रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है क्या वे राजनेताओं की हरकत की वजह से फर्जी मतदान होते हुए देखते रहेंगे और उसमें सुधार के लिए कुछ नहीं करेंगे?

वहीं दूसरी तरफ विपक्षी राजनीतिक दल मुख्य रूप से कांग्रेस और आरजेडी इस दोनों के बीच मतदाता इस विरोध का अगवा बनने की होड़ में लगी हुई है। राहुल गांधी इसे अखिल भारतीय मुद्दा बनाने में जुटे हुए हैं।महाराष्ट्र में एनडीए की सरकार बनाने को उन्होंने चुनाव आयोग का एनडीए को दिया गया एक बड़ा उत्तरदान बताया था। संसद में इस मुद्दे पर नहीं बोलने नहीं देने का आरोप लगाते हुए वे एक नया विक्टिम कार्ड भी खेल रहे हैं, ताकि इन तमाम चीजों से बने हथियार का प्रयोग वे ओर उनकी पार्टी न सिर्फ बिहार के चुनाव जीतने में या अपने सहयोगी गठबंधन के साथियों से चुनाव में सीट ज्यादा प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे तो विभिन्न राज्यों की विधानसभा के चुनाव से लेकर आगामी लोकसभा चुनाव तक में इसके लाभ मिलने की संभावना तलाशने में जुट गए हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में जिस संविधान बदलने का मुद्दा बनाकर राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को 240 सीटों पर समेट दिया।उसे देखते हुए मतदाता विशेष पुनरीक्षण कार्यक्रम में भी राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को बड़ी संभावना नजर आती है। इसे भी वह बीजेपी और एनडीए के द्वारा संविधान बदलने की शरारत करार देने में जुट गए। खासकर राहुल गांधी इसे लेकर दो प्रमुख बात बोलते हैं। एक प्रमुख बात तो यह कि उनके पास मतदाता सूची में एनडीए के पक्ष में किए गए चुनाव आयोग की साजिश के पक्के प्रमाण हैं और दूसरा की चुनाव आयोग एनडीए के प्रभाव में आकर पिछड़ा वर्ग दलित और आदिवासियों का नाम हटा रहा है। हालांकि राहुल गांधी के पास जिस पक्के प्रमाण कि वे बात करते हैं वह है या नहीं,इसे लेकर संदेह बना हुआ है क्योंकि अभी तक कहीं भी उन्होंने उसे प्रस्तुत नहीं किया है। लेकिन इससे लाभ लेने के लिए वे पक्के तौर पर लग गए हैं। राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया आप सोचते हैं कि हम ऐसा कर लेंगे, लेकिन हम आपको ऐसा करने नहीं देंगे ।

वहीं दूसरी तरफ बिहार में महा गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में रहने वाली राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव इस मामले में एक कदम और आगे बढ़ते हुए नजर आते हैं। वह तो चुनाव आयोग को यहां तक धमकी दे रहे हैं की अगर चुनाव आयोग बिहार में विशेष मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम को नहीं रोकते हैं, तो उनकी पार्टी चुनाव बहिष्कार करने तक के विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने इसे सिर्फ संभावना तक ही सीमित रखा है क्योंकि राजनीतिक दलों को सिर्फ मुद्दों से लाभ उठाने की जरूरत रहती है।खासकर जिस प्रकार से तेजस्वी यादव उसमें पिछड़ों और मुस्लिम मतदाताओं के नाम विशेष रूप से काटे जाने की बात करते हैं, उसे देखते हुए चुनाव बहिष्कार की बात कर देने तक से भी बड़ा लाभ मिलने की संभावना है, और अगर वे इसका प्रतिकूल कार्य करेंगे, तब ये कोई ना कोई बहाना निकालकर चुनाव लड़ लेंगे। तभी तो आरएलडी के नेता चिराग पासवान ने तेजस्वी यादव को चुनौती देते हुए चुनाव बहिष्कार कर दिखाने की चुनौती दे दी लेकिन आबके राजनेताओं में वह शर्म,हया या हिम्मत कहां है कि वह किसी चुनौती को स्वीकार कर सकें, गलत कार्यों का बहिष्कार कर सके और सही कार्यों के पीछे जी जान लगा सकें।

आजकल तो हर राजनीतिक दल, चाहे वह सत्ता धारी दल हो, चाहे विपक्ष हो, हर कोई मामले को सिर्फ इसलिए उठाते हैं कि उसका राजनीतिक लाभ मिल सके। राजनीतिक सुचिताऔर जनकल्याण का मुद्दा दिनों दिन पीछे छुटता चला जा रहा है।

कोई भी राजनीतिक दल अभी जिन लोगों के नाम कट जाएंगे उसे जुड़वाने के लिए जो 1 महीने का वक्त है, उसे लेकर कुछ नहीं बोल रहा हैं, लेकिन लोगों की जानकारी के लिए मैं बता दूं कि ऐसे लोग जिनके सही मतदाता होने के बावजूद चुनाव विशेष मतदाता पुनरक्षण कार्यक्रम के तहत गलत ढंग से नाम काट दिए गए हैं, वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 24 के अंतर्गत जिला निर्वाचन पदाधिकारी के पास अपील कर सकते हैं।

ऊपर वर्णित तमाम संदर्भों से संबद्ध सभी पक्ष चाहे वह चुनाव आयोग सत्ताधारी राजनीतिक दल हो या विपक्षी राजनीतिक दल हो उन्हें सिर्फ अपना पक्ष ही नजर आया है। ऐसे में जानते हैं, उन सवालों के बारे में जो हठधर्मिता से हटकर कोई ऐसा पक्ष प्रस्तुत कर सके जिससे सही भारतीय नागरिकों को मतदान करने का अवसर मिले, कोई भी सही व्यक्ति इससे वंचित न हो और ना ही उन्हें किसी प्रकार की परेशानी का सामना करना पड़े।

सुप्रीम कोर्ट ने एक संवैधानिक संस्था होने के नाते सीधे-सीधे चुनाव आयोग को कोई निर्देश देने की जगह चुनाव आयोग के द्वारा मांगे जा रहे हैं।कागजातों में आधार को भी शामिल करने की बात कही थी। अब इस पर क्या चुनाव आयोग को विचार नहीं करना चाहिए?

दूसरा सवाल यह है कि जब चुनाव आयोग मतदाता सूची को आधार से जोड़ने को सही तरीका मानता है और इसके जरिए वह फर्जी मतदाताओं को हटाने का दावा करता है तो फिर इस डॉक्यूमेंट मानने में क्या परेशानी है?

तीसरा प्रश्न जिनके नाम इसमें छूट जाएंगे उन्हें अपील करने का भले ही अधिकार है, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होता की नाम काटे लोगों के गलत ढंग से नाम काटने पर चुनाव आयोग के कर्मचारी बीएलओ से लेकर जिला निर्वाचन अधिकारी तक की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि कोई सही व्यक्ति मताधिकार से वंचित नहीं रह जाए?

क्या ऐसे लोगों को जिनके नाम काटे गए  व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें या उनके परिवार से इस पक्ष में उनके द्वारा हस्ताक्षर डॉक्यूमेंट जमा नहीं किए जाने चाहिए?

जहां तक फर्जी मतदाता सूची से मतदान प्रभावित करने को लेकर है ,तो क्या अभी तक जिन लोगों के नाम हटाए जाने की बात चुनाव आयोग कर रहा है,  उस फर्जी मतदाता ने पिछले चुनाव को प्रभावित न किया था ?और अगर प्रभावित किया था तो क्या लोकसभा और विभिन्न राज्यों में हुई विधानसभा की चुनाव को फिर से नहीं कराया जाना चाहिए ?

अब नए मतदाता पुनरीक्षण के बाद एक प्रश्न यह है कि जिस प्रकार से कांग्रेस पार्टी इसमें बड़ी संख्या में ओबीसी आदिवासी और दलित आईटी के नाम काटने की बात बता रही है, तो क्या बिना किसी प्रमाण के ऐसी बातें कही जा सकती है ?और नहीं तो देश में वैमनस्यता फैलाने के आरोप में इन पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

एक सवाल यह भी उठता है की बीएलओ के अलावा बीएलए जो राजनीतिक दलों के द्वारा तैनात किए जाते हैं क्या उनके द्वारा गलत आदमी के नाम को हटाए जाने पर इनके द्वारा मामला दर्ज नहीं कराया जाना चाहिए?

ऐसे कई सवाल हैं जिसके जवाब सभी संबद्ध पक्ष चाहे वह चुनाव आयोग हो चाहे राजनीतिक दल वाले हो इसे देना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए ताकि अकारण कोई बात मुद्दा ना बन सके और संविधान प्रदत्त लोगों के अधिकारों का हनन न हो सके, और न ही संसद और विधानसभा की कार्यवाही बाधित्वही सके।

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