#plan #PM Modi #Shah #duo #selection #Chief Minister #Bihar # leak नीतीश कुमार के बाद बिहार में एनडीए के मुख्यमंत्री का बीजेपी के खेमे से बनना लगभग तय हो गया है। इस मामले में अगर बाकी कुछ बचा है, तो वह है, बीजेपी के किसी नेता के एनडीए के अंतर्गत बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना।
जिस प्रकार से कभी कांग्रेस को लेकर उसके तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था कि इंदिरा इज कांग्रेस एंड कांग्रेस इज इंदिरा। उसी तरह से वर्तमान समय में बीजेपी और पीएम मोदी तथा अमित शाह की जोड़ी के बीच होता हुआ प्रतीत होता है। प्रतीत होना शब्द का प्रयोग मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि देवकांत बरुआ के द्वारा कहे गए वाक्य का आगामी चुनाव में कांग्रेस पर कितना दुष्प्रभाव पड़ा था ,इस बीजेपी जानती है, लिहाजा बीजेपी के नेता इस प्रकार की बातें कहते नहीं है, बल्कि मोदी और शाह की जोड़ी ऐसा करके दिखा देती है और उनके ऐसा करने का प्रतिवाद करने वाला फिलहाल तो कम से कम बीजेपी का कोई नेता नजर नहीं आता है। पूर्व में जब अटल और आडवाणी की जोड़ी का ऐसा ही रुतबा हुआ करता था, तब भले ही बीजेपी का कोई नेता इन दोनों पार्टी प्रमुख नेताओं के द्वारा लिए गए निर्णयों का विरोध भी कर सकते थे। इसका एक बड़ा उदाहरण उमा भारती थी ,जिसने बीजेपी के पार्टी संगठन का लाइव प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आडवाणी जी को खुला चैलेंज कर दिया था। आज बीजेपी के किसी भी नेता में ऐसा कर पाने की हिम्मत नहीं है। राजस्थान चुनाव के बाद वसुंधरा राजे सिंधिया जिन्होंने हथियार डालने से पहले पीएम मोदी और नरेंद्र शाह की इच्छा के विरुद्ध खुद राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने के लिए उछल कूद दिखाई तो पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ,उन्हें किस तरह से संट कर दिया कि राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी तो उन्हें नहीं ही मिली,आज वह बीजेपी के अंदर भी किसी महत्वपूर्ण स्थान पर नहीं हैं। अलबत्ता मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने अपनी अकड़ दिखाने की ज्यादा कोशिश नहीं की ,तो भले ही पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने उन्हें मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनाया, लेकिन केंद्र की सरकार में मंत्री पद दे दिया ताकि यह आगे भी पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी के आगे नतमस्तक रहें।
ऐसे में यह तय है कि नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री से इस्तीफा देने के बाद बीजेपी के खाते से बनने वाले मुख्यमंत्री का चुनाव पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी ही करेगी जो इस समय पश्चिम बंगाल,असम,तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर व्यस्त चल रहे हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं की और इन चुनावों से फुर्सत मिलने के बाद ही बिहार के मुख्यमंत्री को चुनने का काम करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है,पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी 24 * 7 चुनावी मोड में ही रहा करती है। ऐसे में जब 10 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ेंगे, तब पीएम मोदी और नरेंद्र शाह की अधूरी तत्काल ही बीजेपी के नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर देंगे।
पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी का फैसला चौकाने वाला होता है। इनका फैसला चौकाने वाला इसलिए होता है , क्योंकि आमतौर पर लोग बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर सिर्फ बिहार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हैं, लेकिन पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी बिहार के मुख्यमंत्री का फैसला करते समय बिहार के अलावा इस समय पांच राज्यों में हो रही विधानसभा चुनाव के साथ-साथ वर्ष 2028 में होने वाली लोकसभा चुनाव और इससे पूर्व विभिन्न उत्तर प्रदेश आदि राज्यों की विधानसभा चुनाव पर भी नजर रख रही है। इसके अलावा पीएम मोदी और अमित शाह की यह जोड़ी विपक्षी गठबंधन की ताकत ही नहीं,बल्कि उसके साथ ही अपने गठबंधन के राजनीतिक दलों की ताकत को भी कमजोर करने की सोच भी रखते हैं,जो भविष्य में बीजेपी को परेशान कर सकती है।
अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बीजेपी कई प्रकार के प्रोपेगेंडा का भी सहारा ले रही है। सम्राट चौधरी विजय सिंह नित्यानंद राय जैसे कई नामों को शगुफे के तौर पर सामने ला रही है। नीतीश कुमार जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे प्रमुख राजनीतिक हस्तियां सम्राट चौधरी के नाम पर सहमति जताकर बीजेपी पर अभी से ही दबाव बनाने की रणनीति पर भी काम कर रही है। लेकिन बीजेपी शायद ही इनमें से किसी को बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपे। वैसे भी बीजेपी के रणनीतिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी जो नाम चर्चा में रहते हैं उस पर कदाचित ही विचार करते हैं और अपने अंतर मंथन से ऐसे नाम को अंत में मुख्यमंत्री के रूप में सामने लाती है जो सभी को चौका जाता है, आम लोगों, विपक्षी राजनीतिक दलों को और उनके अपने घटक दलों को भी। लेकिन इस बार लगता है कि उनका फैसला कहीं न कहीं से लीक हो रहा है।
बिहार के मुख्यमंत्री के लिए चर्चा में जो नाम है उनमें से किसी दलित व्यक्ति का नाम नहीं है। जबकि बीजेपी के आंतरिक सूत्रों के अनुसार बीजेपी के रणनीतिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह मुख्यमंत्री के बहाने एक बड़े वोट बैंक को साधने में लगे हैं जो सिर्फ बिहार ही नहीं, बिहार से बाहर के अन्य राज्यों में भी बीजेपी को फायदा पहुंचाए। ऐसे में पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी दलित वोटों को अपने पक्ष में करने लक्ष्य को सामने रखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री के नाम पर चर्चा कर रही है। लगभग 17 प्रतिशत दलित मत कभी कांग्रेस की थाती हुआ करती थी। इस समय वर्तमान मुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार की इसपर बड़ी पकड़ है।इसके अलावा हम पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की भी पकड़ इस दलित आबादी पर है।LJP रामविलास की भी इन दलित जातियों पर है।
अभी तक बिहार में कुल तीन दलित नेता मुख्यमंत्री बने हैं। इसमें भोला पासवान एक ऐसे दलित नेता थे, जो कुल तीन बार सीएम बने थे। राम सुंदर दास और जीतन राम मांझी एक-एक बार मुख्यमंत्री बने थे। ऐसे में दलित मुख्यमंत्री देकर भी बीजेपी इस बात का फायदा तो नहीं उठा पाएगी उसने बिहार में पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया है। लेकिन इसके जरिए यह एक तरफ जहां विधानसभा के चुनाव या आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष के इस हमले का जवाब देने में सक्षम हो जाएगी कि उसके किसी भी राज्य में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं है। साथ ही इसके द्वारा यह अपने गठबंधन जिनकी इन दलितों पर खासी पकड़ है उसे उनकी पकड़ को भी ढीला कर अपनी पकड़ उन पर मजबूत बनाएगी। खासकर जिस तरह से चिराग पासवान अभी से ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में ताल ठोक रहे हैं और विभिन्न चुनाव में बीजेपी पर दबाव बनाकर गठबंधन के अंदर हैसियत से ज्याद, सीटें लेते रहे, बीजेपी चिराग पासवान पर भी अपने इस दलित मुख्यमंत्री के द्वारा चिराग पासवान पर नकेल कस सकती है।
वर्तमान में देश में बीजेपी शासित प्रदेश में कोई दलित मुख्यमंत्री भी नहीं है।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता (वैश्य),त्रिपुरा में माणिक साहा (वैश्य ),यूपी में योगी आदित्यनाथ (राजपूत), उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी (राजपूत), राजस्थान में भजन लाल शर्मा (ब्राह्मण), महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस (ब्राह्मण),असम में हिमांता बिस्व सरमा (ब्राह्मण), गुजरात में भूपेंद्र पटेल (कुर्मी), हरियाणा में नायाब सिंह सैनी (कुशवाहा), मध्यप्रदेश में मोहन यादव (यादव), छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय (आदिवासी) और ओडिशा में मोहन चरण मांझी (आदिवासी) मुख्यमंत्री हैं। इसलिए बिहार को लेकर बीजेपी में एक राय यह बन रही है कि इस बार प्रयोग के रूप पर दलित को सीएम की कुर्सी पर विराजमान कराया जाए।
इन तमाम परिदृश्यों के मद्देनजर बीजेपी के रणनीतिकार पीएम मोदी और अमित शाह निश्चित रूप से बिहार में किसी ने किसी दलित चेहरे को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन करने की योजना पर काम कर रहे हैं कम से कम इतनी जानकारी तो सूत्रों के हवाले से आने लगी है, चेहरे भले ही चौंकाने वाले हो सकते हैं,क्योंकि इसमें अभी दो तीन चेहरे पर बात चल रही है। पीएम मोदी और अमित शाह दो पैमानों पर इसे तौल रहे हैं। पहला पैमाना दलित और युवा है तथा दूसरा पैमाना दलित और महिला है।
दलित,युवा और रूप में मोदी और शाह की जोड़ी जिन नामों पर विचार कर रही है, उनमें प्रमुख नाम है जनक चमार तथा गुरु प्रकाश का जबकि दलित और महिला के रूप में संगीता कुमारी का नाम है।
बिहार में पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी उपरोक्त समीकरण में भी सौम्या और पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध नेता के चयन को ज्यादा तवज्जो दे रही है। इस लिहाज से इन सारे समीकरणों में युवा दलित नेता गुरु प्रकाश सबसे ज्यादा फिट बैठते हैं। यह सौम्या है पटना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और संघ के जमाने से बीजेपी में आने वाले संजय पासवान के सुपुत्र हैं जिनकी पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा थी।
पीएम मोदी और अमित शाह का यह प्रयास बिहार के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों और केंद्र की राजनीति के दृष्टिकोण से भी एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। ऐसे में बिहार बीजेपी के अन्य बड़े चेहरों के साथ किसी न किसी स्तर पर जातिगत समीकरणों के असंतुलित होने का जोखिम जरूर जुड़ा है, लेकिन पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी बिहार के मुख्यमंत्री के चयन को लेकर कितना सा रिस्क तू ले ही सकते हैं क्योंकि बिहार विधानसभा का चुनाव होने में अभी लगभग 5 साल का एक लंबा वक्त है। इस बीच पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी तो इस असंतुलन को संतुलित करने के लिए अपना बेहतर प्रयास तो करेंगे ही, गुरु प्रकाश भी अपनी कार्य कुशलता से बिहार की राजनीति में पकड़ बनाकर पीएम मोदी और अमित शाह के अपने ऊपर किए गए विश्वास के मुद्दे पर खरा उतरने का प्रयास करेंगे।
गुरु प्रकाश में भी नीतीश कुमार की भांति सभी वर्गों और जातियों को साथ लेकर चलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।एक उच्च शिक्षित दलित युवा चेहरे के रूप में गुरु प्रकाश की स्वीकार्यता है, जिससे न केवल विपक्षी गठबंधन के दलित आधार में सेंध लगेगी, बल्कि चिराग पासवान जैसे सहयोगियों की ‘बार्गेनिंग क्षमता’ को भी कुशलता से नियंत्रित किया जा सकेगा। जिन मापदंडों से बीजेपी ने नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, उन मापदंडों से गुरु प्रकाश को मुख्यमंत्री बनाया जाना सटीक प्रतीत होता है।

