चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट, 25 राज्यों के हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक व्यवस्थित कर न्यायालयीन प्रकरणों के निराकरण पर जोर दिया है। भोपाल में हुए न्यायाधीशों के सम्मेलन में सात साल तक की सजा वाले अपराधों के मुकदमों को प्राथमिकता देकर लंबित मामलों से निपटने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया है। इसके साथ ही मीडिया ट्रायल और राज्यों की बार-बार मुकदमेबाजी कम करने पर भी कॉन्फ्रेंस में डिस्कशन हुआ है।
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी इंडिया द्वारा भोपाल में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के लिए आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का केंद्र बिंदु एकीकृत, कुशल और जन-केंद्रित न्यायपालिका का निर्माण था। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों के मार्गदर्शन में हुए इस सम्मेलन में प्रशासन के संस्थागतकरण और एक राष्ट्रीय न्यायिक नीति के निर्माण पर डिस्कशन किया गया।
इसका उद्देश्य न्यायिक शासन को पारंपरिक मॉडल से एक रणनीतिक, डेटा-आधारित प्रणाली में परिवर्तित करना है लेकिन यह ध्यान रखना है कि उच्च न्यायालय आधुनिक कानूनी मांगों की जटिलताओं से निपटने में सक्षम हों और साथ ही देश भर में संस्थागत अखंडता बनाए रखें। अकादमी के निदेशक द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव के साथ सम्मेलन का समापन हुआ।
न्यायिक प्रक्रिया को सुव्यवस्थित कर मामलों का निराकरण किया जाएगा, इसके लिए रोडमैप तैयार किया गया है।
7 साल तक की सजा वाले अपराधों के मुकदमों को प्राथमिकता देकर लंबित मामलों से निपटने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया है।
मीडिया ट्रायल के मुद्दों पर चर्चा हुई और इस बात पर जोर दिया गया कि निर्दोषता की धारणा को संरक्षित करने के लिए न्याय न्यायालय में ही मिलना चाहिए।
राज्य द्वारा दायर किए गए पुराने या अनावश्यक मुकदमों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
राज्य की बार-बार मुकदमेबाजी करने की भूमिका को कम करके और डिजिटल नवाचार और भाषाई समावेशिता के माध्यम से सुधारों को संस्थागत रूप देकर एक आधुनिक, सुलभ, एकसमान और नागरिक-केंद्रित न्याय प्रणाली बनाने की सामूहिक प्रतिबद्धता जताई गई।
कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए भोपाल आए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और देश के 25 राज्यों के हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के परिजन ने भोपाल और आसपास के पर्यटन स्थलों की खूबसूरती का आनंद लिया है। नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी में न्यायाधीशों की कॉन्फ्रेंस के बीच उनके परिजनों ने भी बैठक की।भोजपुर के विख्यात शिव मंदिर और ट्राइबल म्यूजियम समेत अन्य स्थानों में विजिट कर भोपाल की खूबसूरती को पास से देखा। इसके बाद रविवार दोपहर बाद सभी न्यायाधीश वापस लौट गए।
वहीं शनिवार को हुई कॉन्फ्रेंस की खास बात यह रही कि दिल्ली के बाद भोपाल इकलौता शहर है। जहां सीजेआई समेत सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीश व हाईकोर्ट के सभी 25 चीफ जस्टिस एक साथ जुटे। यहां पहले दिन न्यायपालिका में तकनीक और एआई के इस्तेमाल पर फोकस रहा। इसमें जस्टिस सूर्यकांत समेत सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों ने बात रखी। यहां कहा गया कि मुकदमों की पेंडेंसी निपटाने में एआई मददगार हो सकता है। मुकदमों की प्रक्रिया तेज करने में इसका इस्तेमाल होना चाहिए लेकिन फैसले में एआई की भागीदारी बिल्कुल न हो। फैसले तो पूरी तरह न्यायाधीशों के विवेकाधीन ही होने चाहिए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में एआई के उपयोग और इसके विकास को लेकर एक समिति का गठन किया है। दिसंबर 2025 में इसका पुनर्गठन किया गया है। यह समिति सुप्रीम कोर्ट और अधीनस्थ न्यायपालिका में एआई टूल्स को अपनाने, विकसित करने और इनके उपयोग के लिए एक रोडमैप तैयार करेगी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा इसके अध्यक्ष हैं।
भोपाल में हुई कॉन्फ्रेंस की थीम एकीकृत, कुशल और जन-केंद्रित न्यायपालिका रही। काॅन्फ्रेंस में देशभर के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने डिजिटल नवाचार के माध्यम से भाषाई और भौगोलिक बाधाओं को तोड़ने पर विचार-विमर्श किया। एकीकृत, कुशल और जन-केंद्रित न्यायपालिका थीम पर जस्टिस जेके महेश्वरी, जस्टिस बीबी नागरत्ना, जस्टिस पी. नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस जॉय माल्या बागची, जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली ने अलग-अलग विषयों पर अपनी बात रखी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत का कहना है कि भारत जैसे विशाल देश में जन केंद्रित न्यायपालिका के लिए तेजी से मुकदमों के निराकरण (क्विक डिस्पोजल) की व्यवस्था बनाना बहुत जरूरी है। इस काम में इन्फॉर्मेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, डिजिटल डिवाइस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यायपालिका के काम की गति बढ़ाने में बड़ी मददगार हो सकते हैं। मौजूदा नीतियों में सुधार के साथ ही न्यायपालिका के परफॉर्मेंस का भी नियमित मूल्यांकन होना चाहिए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत के साथ एनजेए के डायरेक्टर जस्टिस अनिरुद्ध बोस और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशगण ने इसमें विचार रखे।
