बीरेंद्र कुमार झा
भारत ने जी – 20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन के जरिए चीन को कूटनीतिक मोर्चे पर कई झटके दिए हैं। चीन को सम्मेलन की सफलता और इसके जरिए भारत की बढ़ती कूटनीतिक धमक का एहसास संभवत पहले ही से लग गया था, इसलिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहले ही इस आयोजन से दूरी बना ली और वे खुद इसमें शामिल नहीं हुए ।अलबत्ता इस सम्मेलन के जरिए भारत ने यह दिखा दिया कि वैश्विक कूटनीति में अब उसका मुकाबला करना चीन के लिए संभव नहीं है।
दिल्ली घोषणा पत्र पर बनाई सहमति
जी – 20 शिखर सम्मेलन के बाद जारी दिल्ली घोषणा पत्र पर आम सहमति कायम करना भारतीय कूटनीतिक कौशल की सबसे बड़ी उपलब्धि है । चीन को इसकी कतई उम्मीद नहीं थी। उसे अंदेशा था कि यूक्रेन के मुद्दे पर भारत को आम सहमति बनाने में मुश्किलें जरूर आएगी क्योंकि पश्चिमी देशों के दबाव में रूस का बचाव करना भारत के लाइक्स मुश्किल होगा,लेकिन भारत ने अपनी सूझबूझ से इस समस्या से पार पा लिया।
दक्षिण अफ्रीका यूनियन को प्रवेश दिला बढ़ाई ताकत
इसी तरह दक्षिण अफ्रीका यूनियन को भारत की पहल पर जी-20 में शामिल करना भी भारत की कूटनीतिक जीत है,साथ ही यह चीन के लिए झटका भी है। इससे अफ्रीकी देशों देश में भाrरत का कारोबार और रणनीतिक संबंधों को लेकर प्रभाव बढ़ेगा और चीन का प्रभाव कम होगा। चीन ने हालांकि शुरुआती दौर में इस मामन मामले में छुपी साथ रखी थी,लेकिन अंततः वह भी इसपर सहमत हो गया।
चीन ने महसूस किया कि जी – 20 के सभी सदस्य इसके पक्ष में हैं, इसलिए शिखर सम्मेलन से दो दिन पूर्व ही उसने इसका समर्थन कर दिया।भारत के लिए दक्षिण अफ्रीका यूनियंस के 55 देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है
क्योंकि जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का स्थायी सदस्य बनने का मौका आएगा तो अफ्रीकी देशों का सहयोग निर्णायक साबित होगा।
चीन का कर्ज के जाल में देश को फसाने के हथकंडा पर रोक
चीन कर्ज के जाल में फंसे देश के वित्तीय प्रबंधन से जुड़े प्रस्ताव को लेकर भी अनमना हो रहा था और वह नहीं चाहता था कि इसे मंजूरी मिले, जबकि भारत इसके पक्ष में था और इसे मंजूरी भी मिल गई। इससे श्रीलंका समेत कर्ज में फंसे कई देशों को फायदा होगा। जो देश इससे लाभान्वित होंगे , उसमें ज्यादातर ऐसे छोटे देश हैं जो चीन के कर्ज के जाल में फंसकर तबाह हो रहे हैं, लेकिन अब चीन का इन देशों को कर्ज के जाल में फसाने का हथकंडा भविष्य में काम नहीं आएगा।
आर्थिक गलियारे की घोषणा से चीन को जवाब
शिखर सम्मेलन के दौरान भारत मध्य पूर्व आर्थिक गलियारे की घोषणा भी चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का जवाब है। दरअसल चीन दूसरे देशों में रेल सड़क और बंदरगाह बनाकर व्यापारिक कॉरिडोर बनता है और उसकी सीमाओं में हस्तक्षेप भी करता है, लेकिन भारत की यह पहल
न सिर्फ बड़ी है, बल्कि इसमें शामिल देशों की संप्रभुता का भी पूरा ख्याल रखा जाएगा।
इस पहल से भारत और यूरोपीय देशों के बीच व्यापार संपर्क बढ़ेगा। इसका दियरगामी परिणाम यह होगा कि इससे भविष्य में चीन का भारत और यूरोपिय देशों को होने वाला निर्यात घटेगा।
जैव ईंधन गठबंधन की पहल चीन के लिए चुनौती
शिखर सम्मेलन के जरिए भारत की जैव ईंधन गठबंधन की पहल भी चीन के लिए चुनौती है,क्योंकि चीन सबसे बड़ा प्रदूषक है और उसने आज तक हरित क्षेत्र में कोई अंतरराष्ट्रीय पहल नहीं की है।वहीं भारत पूर्व अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस की शुरुआत कर चुका है और अब जैव ईंधन गठबंधन की पहल कर जलवायु मोर्चे पर भी इसने बढ़त ले ली है।योग और मोटा अनाज को बढ़ावा देना भी भारत की महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहल है।
भारत की संस्कृति का प्रसार
इस शिखर सम्मेलन के जरिए न सिर्फ भारत की कूटनीतिक धमक बढ़ी है,बल्कि इससे भारत की संस्कृति का भी प्रसार हुआ है।।भारत ने जी – 20 की अध्यक्षता के दौरान वसुधैव कुटुंबकम की भावना को बढ़ावा दिया। इसलिए चीन मीडिया में इसे लेकर कहानी लिखी जा रही है कि भारत स्कूटनीतिक मंच के जरिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

