विदेश मंत्री एस जयशंकर की खरी खरी, अमेरिका और यूरोप करते हैं पाखंड

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बीरेंद्र कुमार झा

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ग्लोबल नॉर्थ की हिपोक्रेसी पर जमकर निशाना साधा है। एस जयशंकर ने कहा कि यह दुनिया आज भी डबल स्टैंडर्ड वाली है,जो देश प्रभावशाली हैं,वे बदलाव का प्रतिरोध कर रहे हैं। जो देश ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली है उन्होंने अपनी कई क्षमताओं का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है ।ऐस जयशंकर ने यह बात संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थानीय मिशन,संयुक्त राष्ट्र भारत और रिलायंस फाउंडेशन के सहयोग से ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कही।दक्षिण का उदय, साझेदारियां, संस्थाएं एवं विचार शीर्षक वाले इस मंत्रीस्तरीय सत्र में उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि बदलाव के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की जगह राजनीतिक दवाब जिम्मेवार है।भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि दुनिया में इस तरह की भावना बढ़ रही है। ग्लोबल साउथ एक तरीके से इसे प्रतिबंधित करता है, लेकिन इसका राजनीतिक प्रतिरोध भी हो रहा है।

क्या है ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ

ग्लोबल साउथ शब्द का इस्तेमाल उन विकासशील और अल्प विकसित देशों के लिए किया जाता है जो मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में है। पूरी दुनिया में भारत की मान्यता ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में है। वही ग्लोबल नॉर्थ का इस्तेमाल विकसित देशों के लिए किया जाता है।इनमें मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप, इजराइल,जापान दक्षिण कोरिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल है।

एस जयशंकर ने कहीं यह बात

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि जो देश प्रभावशाली स्थितियों में है, वह बदलाव का प्रतिरोध कर रहे हैं। हम सबसे अधिक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ऐसा देखते हैं। उन्होंने कहा जिनका आज आर्थिक प्रभुत्व है, वह अपनी उत्पादन क्षमताओं का लाभ उठा रहे हैं । जिनका संस्थागत या ऐतिहासिक प्रभाव है, वह भी अपनी कई क्षमताओं का वास्तव में हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। एस जयशंकर ने कहा कहा कि ये बातें तो उचित कहेंगे,लेकिन आज भी वास्तविकता यही है कि यह बहुत हद तक दोहरी मानकों वाली दुनिया है। उन्होंने कहा स्वयं कोविड इसका एक उदाहरण है। भारतीय विदेश मंत्री ने आगे कहा कि संपूर्ण परिवर्तन में एक मायने में स्थिति यह है कि जब ग्लोबल साउथ अंतरराष्ट्रीय प्रणाली पर अधिक से अधिक दवाब बना रहा है और न सिर्फ ग्लोबल नॉर्थ बल्कि ऐसे कई देश जो स्वयं को नॉर्थ का हिस्सा नहीं मानते वे भी बदलाव को रोक रहे हैं ।

G20 सम्मेलन का किया जिक्र

एस जयशंकर ने कहा कि सांस्कृतिक पुनरसंतुलन का वास्तविक अर्थ दुनिया की विविधता को पहचानना, विश्व की विविधता का सम्मान करना और अन्य संस्कृतियों एवं अन्य परंपराओं का सम्मान करना है। उन्होंने इस महीने की शुरुआत में दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन का जिक्र किया और मोटे अनाज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ ऐतिहासिक रूप से गेहूं कम और मोटा अनाज अधिक खाता है। एस जयशंकर ने कहा कि बाजार के नाम पर बहुत कुछ किया जाता है ठीक वैसे ही जैसे आबादी के नाम पर बहुत कुछ किया जाता है। उन्होंने कहा कि अन्य लोगों की विरासत,परंपरा, संगीत, साहित्य और जीवन जीने के तरीके का सम्मान करना उस बदलाव का हिस्सा है, जिसे ग्लोबल साउथ देखना चाहता है।

पीएम मोदी के बात की भी की चर्चा

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित कहा कि आइए पहले उन लोगों से बात करें जो वार्ता की मेज पर नहीं होंगे।आइए जानें कि उन्हें आपके लिए क्या कहना है। इसलिए भारत ने वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट 2023 का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि शिखर सम्मेलन की मेजबानी ने भारत को यह कहने के लिए प्रमाणित और अनुभव पर आधारित आधार दिया है।हमने 125 देशों से बात की है ,और यह बात उन्हें वास्तव में परेशान कर रही है।यही कारण है कि हमें इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

यूरोपीय देशों पर बात

इस कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ,रिलायंस फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जगन्नाथ कुमार, भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट समन्वयक शोंबी शार्प और ओआरएफ के अध्यक्ष समीर शरण ने भी संबोधित किया।समीर शरण ने ऐस जयशंकर की टिप्पणी का जिक्र किया कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं है। उन्होंने कहा कुछ लोगों को लगता है कि यूरोप के लिए ऐस जयशंकर का रूप सख्त है, इसके जवाब में एस जयशंकर ने कहा कि ऐसा नहीं है। एस जयशंकर ने कहा कि पूरी दुनिया जिन मुख्य समस्याओं से जूझ रही है, उसमें लोन , सतत विकास लक्ष्य संसाधन ,जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी कार्रवाई से जुड़े संसाधन,डिजिटल पहुंच पोषण और लैंगिक मामले शामिल है।

 

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