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महाराष्ट्र कांग्रेस में घमासान , थोराट के इस्तीफे  के बाद पटोले की बारी!

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न्यूज़ डेस्क 
क्या बाला साहेब थोराट के इस्तीफे के बाद अब पटोले की बारी है ? ये सवाल महाराष्ट्र कांग्रेस के बीच उठ रहे हैं। जिस तरह से पटोले से नाराज होकर थोराट ने इस्तीफा दिया है उसके बाद अब इस बात की सम्भावना बढ़ गई है कि पटोले भी अब ज्यादा दिनों तक सूबे के अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे। छत्तीसगढ़ में आयोजित हो रहे पार्टी के अधिवेशन पर संभवतः इस पर कोई फैसला हो जाए।

कांग्रेस कई मोर्चों पर लड़ रही है। संसद में उसकी लड़ाई सरकार से है लेकिन कई राज्यों में पार्टी के भीतर भी लड़ाई चल रही है। माना जा रहा था कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस के भीतर सब ठीक हो जाएगा लेकिन ऐसा अभी नहीं हुआ। महाराष्ट्र में पार्टी के भीतर गुटबाजी के साथ ही आतंरिक युद्ध भी जारी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले और पार्टी के वरिष्ठ नेता बाला साहेब थोराट के बीच जो कुछ भी होता दिख रहा है उससे पार्टी पर साफ़ असर पड़ता दिख रहा है। थोराट और पटोले में बिल्कुल तालमेल नहीं है और वे एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। दोनों एक दूसरे पर तरह -तरह के आरोप लगते हैं जिससे पार्टी के भीतर और बाहर गलत सन्देश जा रहा है। इससे पार्टी हाई कमान भी चिंतित है।

पिछले दिनों थोराट ने कांग्रेस विधायक दल के नेता से इस्तीफा दे दिए। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष खड़गे को पत्र लिखा है और कहा है कि पटोले के साथ काम करना मुश्किल है। बताया जा रहा है कि थोराट और पटोले दोनों को हटाने की पहले से तैयारी थी। फरवरी के अंत में रायपुर में होने वाले कांग्रेस महाधिवेशन को बाद दोनों को हटाया जाना था और साथ ही कुछ और राज्यों में संगठन में बदलाव होना था। लेकिन उससे पहले ही थोराट ने इस्तीफा देकर आलाकमान पर दबाव बना दिया है।

असल में यह विवाद विधान परिषद के हाल में हुए चुनाव के कारण शुरू हुआ है। उसमें भी नासिक सीट पर सत्यजीत तांबे की उम्मीदवारों को लेकर जो विवाद हुआ उसका नतीजा है कि थोराट ने इस्तीफा दिया है। असल में सत्यजीत तांबे और थोराट रिश्तेदार हैं। थोराट रिश्ते में तांबे के मामा लगते हैं। नासिक सीट पर पहले सुधीर तांबे एमएलसी थे और पार्टी ने उन्हीं को टिकट दिया, जबकि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। सो, उन्होंने नामांकन नहीं किया और उनकी जगह बेटे सत्यजीत तांबे ने परचा भर दिया। उनका आरोप है कि पटोले ने उनको गलत फॉर्म दे दिया, जिससे उनको निर्दलीय लड़ना पड़ा। संयोग से तांबे जीत भी गए। इसके बाद पटोले के खिलाफ अभियान तेज हो गया। थोराट ने इस्तीफा देकर इस अभियान को और तेज कर दिया है। दूसरी ओर पटोले की राहुल गांधी से करीबी सभी जानते हैं। तभी यह देखना दिलचस्प होगा कि महाराष्ट्र के बारे में क्या फैसला होता है।

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