सतीत्व और भक्ति के बल पर मुर्दे में भी प्राण वापस लाने का पर्व -वट सावित्री,जाने वट सावित्री की कथा और वट वृक्ष के महत्व को

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बीरेंद्र कुमार झा

देवताओं की पूजा तो सभी धर्मों में होती है, लेकिन सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है, जिसमें देवताओं की तो पूजा होती ही है, साथ ही साथ जीव जंतुओं और पेड़ पौधों की भी पूजा होती है। सनातन धर्म में मनाया जाने वाला बट सावित्री पूजा एक ऐसी पूजा है,जिसमे वट वृक्ष की पूजा की जाती है। इस पूजा का धार्मिक पक्ष जितना प्रबल है,उतना ही प्रबल इसका वाज्ञानिक पक्ष भी है।

वट सावित्री पूजा का धार्मिक महत्त्व

वट सावित्री पूजा की धार्मिक पक्ष की बात की जाय तो इसे लेकर सावित्री और की कथा आती है। इस कथा के अनुसार सावित्री अपनी शादी के लिए सत्यवान नमक एक युवक को चुनती है।सावित्री के इस चयन की जानकारी जब नारद को होती है तो वे सावित्री के पिता अश्वपति को सत्यवान की आयु मात्र एक वर्ष ही शेष बचे रहने की बात कहकर शावित्री से यह विवाह नहीं करने की बात कहते हैं। इसपर सावित्री सत्यवान की पूर्व में ही अपना पति चुन लेने की बात कहते हुए सत्यवान से ही शादी कर लेती है। जिस दिन सत्यवान के जीवन का अंतिम दिन था, उस दिन सत्यवान जब जंगल में लकड़ी काटने जाता है तो सावित्री भी उसके साथ जिद कर चली जाती है। लकड़ी काटते काटते जब सत्यवान अपने सिर में दर्द होने की बात करता है तो सावित्री सारी स्थिति को भाप जाती है। वह अपने पति के सिर को गोद में लेकर एक वट वृक्ष के नीचे बैठ जाती है,क्योंकि वह जानती है कि वट वृक्ष में भगवान भोले शंकर का वास होता है। वट वृक्ष की लटकती जटा जड़ को शंकर भगवान के जटा का परिचायक माना जाता है।भगवान भोले शंकर के बारे में कहा जाता है की ये विधाता के लिखे लेख को भी बदल सकते हैं। निर्धारित समय पर जब यमराज सत्यवान के प्राण को हरकर वापस यमपुरी लौटने लगते हैं, तो सावित्री भी उसके पीछे पीछे चलने लगती है। कुछ दूर जाने के बाद यमराज पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें सावित्री अपने पीछे- पीछे आते दिखाई पड़ती है। यमराज सावित्री से कहते हैं कि यह तो दुनिया का नियम है कि जिसके प्राण हर लिए जाएंगे सिर्फ वही यमराज के साथ जाएगा,कोई जीवित प्राणी उसके साथ नहीं जा सकता है।ऐसे में तुम अपार धन संपत्ति ले लो और वापस लौट जाओ। ऐसा कहकर यमराज आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन सावित्री पीछे नहीं लौटकर यमराज का अनुसरण करते हुए चलती जाती है।तब यमराज उसे एक वरदान मांगने को कहते हैं।इसपर सावित्री अपने अंधे सास-ससुर के लिए आंख देने की मांग करती है।लेकिन इस मांग के पूरा होने के बावजूद वह वापस नहीं लौट कर फिर से यमराज के पीछे जाने लगती है। यमराज उसे दोबारा वर मांगने के लिए कहते हैं तो वह अपने पिता अस्वपति के लिए एक पुत्र की मांग करती है। लेकिन इस मांग की पूर्ति के पश्चात भी सावित्री यमराज का अनुसरण करना नहीं छोड़ती है। इसपर यमराज सावित्री से एक अंतिम वरदान मांगकर वापस चले जाने की बात करते हैं। तब सावित्री अपने सास ससुर के लिए एक वारिश देने की मांग करती है यमराज इसकी भी स्वीकृति दे देते हैं।लेकिन सावित्री फिर भी वापस नहीं लौटती है तब यमराज क्रोधित हो जाते हैं और सावित्री को श्राप देने की बात करते हैं। इसपर सावित्री कहती है कि आपने मुझे जो वरदान दिया है वह मेरे पति के जीवित हुए बिना संभव नहीं है, क्योंकि मेरे पति मेरे सास ससुर के एकमात्र पुत्र हैं और मेरे सास ससुर का वारिश सिर्फ उनसे ही संभव है।सावित्री की बात सुनकर यमराज कोअपनी गलती का एहसास होता है, लेकिन अपने वचन की प्रतिष्ठा के लिए वे सत्यवान के प्राण वापस कर देते हैं।इस प्रकार सावित्री ने अपने सतीत्व और बुद्धिमता के बल पर न सिर्फ अपने पति के प्राण वापस करवा लिए, बल्कि अपने सास सशुर की आंखें और खोए राज्य के साथ – साथ अपने पिता के लिए पुत्र भी प्राप्त कर लिया।

वट सावित्री व्रत का वैज्ञानिक पक्ष

धार्मिक पक्ष से इतर अगर इस पर्व के वैज्ञानिक महत्व की बात करे तो वट वृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जो दिन – रात फोटोसिंथेसिस और किमोसिंथेसिस की क्रमवार प्रक्रिया से वायुमंडल से कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशिषित करता है।वहीं यह दिनभर के 24 घंटों में से लगभग 20 से 22 घंटे तक यह वायुमंडल में ऑक्सीजन भी मुक्त करता है। अमूमन वटवृक्ष की एक पत्ती 1 घंटे में 5 मिलीग्राम तक ऑक्सीजन मुक्त करती है। वट वृक्ष की विशालता और उसके पेड़ों में मौजूद पत्तियों का अनुमान लगाकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिनभर में यह कितना ऑक्सीजन मुक्त करता है।

वट सावित्री का आध्यामिक महत्व

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बात करें तो वट सावित्री पर्व का अपना एक अलग ही महत्वपूर्ण स्थान है। एक बार जान चली जाने पर विज्ञान भले ही इसके पुनर्स्थापन को लेकर मौन रहता है, लेकिन अध्यात्म में यहां भी बहुत कुछ कहने और सुनने की गुंजाइस बनी रहती है। सावित्री के प्रताप से सत्यवान के प्राण वापस लौटने के अलावा भी शंकराचार्य के भी प्राण त्यागने और फिर वापस जान आने की बात लोकोक्तियों में प्रचलित है।कहा जाता है कि मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में हराने के बाद उनकी पत्नी भारती ने शंकराचार्य को काम विषयक शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। इसपर शंकराचार्य ने इससे अन्भिज्ञ होने की बात कहते हुए भारती से इस विषय पर शास्त्रार्थ के लिए समय मांग लिया था।इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों को उनके स्थूल शरीर को निर्विधन रखने की हिदायत देते हुए अपने मूल शरीर से अपनी आत्मा को निकाल कर उसे एक मुर्दे के शरीर में प्रवेश कराया और उसके द्वारा काम विषयक जानकारी प्राप्त की । फिर उन्होंने उस मुर्दे के शरीर को छोड़कर वापस अपने मूल शरीर में आकर भारती से शास्त्रार्थ की थी। दरसल जब किसी की मृत्यु होती है तो प्रारंभ में इसके प्राण वायु (श्वशन)का शरीर में संचार रूक जाता है।फिर धीरे धीरे शरीर के 7 चक्रों में मौजूद अपान वायु,समान वायु, उडान वायु और व्यान वायु क्रमश: नष्ट होने लगते हैं । जब इन सभी 5 वायु का पूर्णतया नाश होता है,तब कहीं जाकर किसी की पूर्ण रूप से मृत्यु होती है। प्राण वायु यानी स्वसन की अववरुद्धता के बावजूद अन्य चार वायु के नष्ट होने से पूर्व तक इन्हें विशेष प्रक्रिया द्वारा संचालित किए जाने से प्राणवायु की प्रक्रिया फिर से प्रारंभ हो जाती है, जिससे मृत व्यक्ति के पुनर्जीवित होने की पूरी संभावना बनी रहती है।

 

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