बिहार में लौंडा नाच की राजनीति

0
22

इस समय बिहार एक घटना को लेकर पूरे देश में चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया है। यह घटना बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव से जुड़ी हुई है। लाल यादव ने 29 मार्च को 10 सर्कुलर स्थित अपनी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास पर एक लौंडा नाच का आयोजन करवाया। इस लौंडा नाच के कार्यक्रम में उनके साथ उनकी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उनका पुत्र और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी के कई प्रमुख व्यक्ति शामिल थे। सभी ने इस लौंडा नाच का खूब आनंद लिया। यह कार्यक्रम भले ही लाल यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री रावड़ी देवी के आवास पर आयोजित की गई थी, लेकिन सोशल मीडिया और मेन स्ट्रीम मीडिया के सहारे देश के बड़े हिस्से में लोगों ने इस कार्यक्रम को देखा।इसके बाद इसे लेकर चर्चा का बाजार गर्म हो गया। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आने लगी। इस चर्चा बाजार और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की बात बाद में पहले लाल यादव और इस लौंडा नाच के इतिहास की कर लेते हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस लौंडा नाच का उदय 11वीं सदी के दौरान तब हुआ जब सार्वजनिक रूप से महिलाओं के नाचने पर पाबंदी थी और आम लोगों के लिए तवायफों का नृत्य देखना मुश्किल था। तब शोषित समाज ने अपने मनोरंजन के लिए पुरुषों को महिलाओं की वेशभूषा में नचाने की परंपरा शुरू की थी।

19वीं सदी इस लौंडा नाच के चरमोत्कर्ष का काल था, जब भिखारी ठाकुर ने लौंडा नाच को एक सुव्यवस्थित लोक रंगमंच में बदल दिया था। उन्होंने इसे सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि विदेशिया जैसे नाटकों के द्वारा दहेज प्रथा, शराबबंदी जैसे सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने का एक बड़ा माध्यम भी बना दिया।

लौंडा नाच मुख्य रूप से बिहार के भोजपुर क्षेत्र में प्रचलित है। यह बारात, विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर आयोजित किया जाता है।

इस समय इस लौंडा नाच के कलाकारों की अपनी एक अलग ही पहचान थी। भिखारी ठाकुर जिन्होंने इस लौंडा नाच को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा था ,उन्हें भले ही कोई पद्म पुरस्कार से नवाज नहीं गया था और जिनके लिए अभी भारत रत्न जैसे देश का प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की मांग की जा रही है, लेकिन इन्होंने भोजपुरी के शेक्सपियर के रूप में अपनी एक महत्वपूर्ण छवि गढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली थी।रामचंद्र मांझी, जो भिखारी ठाकुर की मंडली के प्रमुख नर्तक थे, उन्हें पद्मश्री तक से सम्मानित किया गया था, जिन्होंने इस कला को देश-विदेश में प्रसिद्धि दिलाई।

लौंडा नाच का मुख्य क्षेत्र बिहार और उत्तर प्रदेश का भोजपुरी भाषी क्षेत्र (जैसे- आरा, छपरा, सारण, सिवान, बलिया) है। यह पारंपरिक लोक नृत्य भोजपुरी संस्कृति का हिस्सा है, जिसे पुरुष महिलाओं के वेश में करते हैं। यह विशेष रूप से विवाह,मुंडन तथा खुशी के अन्य मौकों पर काफी लोकप्रिय है।

पहले यह लौंडा नाच एक स्वस्थ मनोरंजन का केंद्र बिंदु था। ‘बिदेसिया’ जैसे नाटकों के हिस्सा के रूप में इसके द्वारा दहेज प्रथा और पलायन, बेमेल विवाह जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर प्रहार किया जाता था। लेकिन कालांतर में इसमें अश्लीलता हावी होने लगी।अब,यह मनोरंजन की जगह अश्लीलता परोसने का जरिया बन गया है, जहाँ अश्लील गानों का इस्तेमाल होता है।
आज के लौंडा नाच में नर्तकों द्वारा द्विअर्थी संवाद (double-meaning dialogue) और अंग प्रदर्शन पर अधिक जोर दिया जाता है। जिससे शिक्षित और आधुनिक समाज इस लौंडा नाच से अपनी दूरी बनाने लगा है।

अपने ठेठ गंवई अंदाज में राजनीति करने में माहिर लालू यादव अपने शासन काल के दौरान अक्सर लौंडा नाच करवाते थे। राजगीर महोत्सव मंदार महोत्सव आदि राजकीय कार्यक्रमों में भी लालू यादव को लौंडा नाच का आनंद उठाते, अपनी जंघा पर ताल ठोकते और अपने पास बुलाकर कलाकारों को पैसे देते देखा जाता था।

लालू यादव लौंडा नाच इसलिए नहीं करवाते थे कि इसके द्वारा वह लौंडा नाच या उसके कलाकारों को सम्मान देना चाहते थे, बल्कि वे इस लौंडा नाच का आयोजन इसलिए करवाते थे, ताकि इस नाच के जरिए परोसे जाने वाली अश्लीलता और फूहड़ता को देखने के लिए बड़ी संख्या मैं युवा वर्ग यहां आ सके। इस लौंडा नाच के अवसर पर लालू यादव अपनी हरकतों और भाषणों में मजाकिया लहजे में ही भूरा बाल साफ़ करो ,लाठी में तेल पिलाओ आदि ऐसा कुछ कह जाते थे, जिससे युवाओं के इस भीड़ का एक बड़ा हिस्सा उन्हें अपना आईकॉन मान लेता था और चुनाव के समय लालू यादव और उसकी पार्टी के लिए वोट का जुगाड़ किया करते थे। कई जगहों पर तो यह युवा वास्तविक मतदाताओं को डरा धमकाकर भगाकर लालू यादव की आरजेडी पार्टी के लिए खुद ही वोट डाल दिया करते थे।

चारा घोटाला में जेल चले जाने के बाद जब तक लालू की पत्नी राबड़ी देवी बिहार के मुख्यमंत्री बनी रही और लालू यादव जमानत पर जेल से बाहर आए,तब भी कुछ खास अवसर पर वे इस लौंडा नाच का आयोजन करवा लेते थे, लेकिन 2005 ईस्वी में जब से नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाला, तब से अपने राजनीतिक पराभव और खराब स्वास्थ्य की वजह से लालू यादव लौंडा नाच का आयोजन नहीं करवाने लगे थे।

दरअसल नीतीश कुमार की एक अलग ही समाजवादी सोच थी। लालू यादव के लौंडा नाच , चरवाहा विद्यालय तथा तेल पिलावन लाठी मोटावन रैली की जगह नीतीश कुमार ने बच्चियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल, पंचायत में महिलाओं का आरक्षण, ग्रामीण सड़कों का विकास तथा दलित और महादलित के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम चलाकर इन वर्गों को लालू यादव के प्रभाव से हटाकर अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने में सफलता प्राप्त कर ली।

अब एक बार लालू यादव ने जब फिर से लौंडा नाच का आयोजन करवाया है तो इसके पीछे भी उनकी एक बड़ी राजनीतिक चाल छिपी हुई है। इस लौंडा नाच में अपनी खुशी प्रकट कर लालू यादव नीतीश कुमार को यह संदेश देना चाहते हैं कि भले ही बीजेपी दबाव बनाकर उनसे बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन लेना चाहती है। लेकिन अगर नीतीश कुमार उनके पाले में आ जाएं तो दोनों मिलकर न सिर्फ वर्तमान समय में बीजेपी के नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रयास पर पानी फेर देंगे ,बल्कि आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की समाजवादी शैली वाली राजनीति और उनकी गवाही अंदाज वाली राजनीति दोनों की एक जुटता बिहार में बीजेपी को राजनीतिक परिदृश्य से ही गायब कर देगी। शायद यही एक बड़ा कारण है की लालू यादव ने रावड़ी आवास पर आयोजित इस लौंडा नाच कार्यक्रम के पीछे जो बैनर लगाया था उसमें हम बिहार लिखा हुआ था। अब जरा बिहार विधान मंडल के विधायकों के आंकड़ों के जरिए लाल यादव के इस लौंडा नाच के द्वारा नीतीश कुमार को दिए जा रहे संदेश पर एक नजर डालते हैं। वर्तमान विधान मंडल में महा गठबंधन के पास 35 विधायक हैं। जिस प्रकार से राज्य सभा चुनाव के दरम्यान असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम पार्टी ने महागठबंधन के उम्मीदवार को समर्थन देने की बात कही थी उसे देखते हुए एआइएमआइएम के पांच विधायकों को भी इसमें जोड़ दें तो उनके विधायकों की संख्या 40 हो जाती है। इसमें अगर जदयू के 85 विधायकों को जोड़ दें तो इसकी संख्या 125 तक पहुंच जाती है,जो 243 सदस्यीय बिहार विधान मंडल में बहुमत के लिए न्यूनतम आंकड़े 122 से 3 ज्यादा होता है। ऐसे में नीतीश कुमार महागठबंधन के पक्ष में आकर बीजेपी के ना चाहते हुए भी बिहार का मुख्यमंत्री बने रहने में कामयाब हो जाएंगे और फिर आगामी चुनाव में भी नीतीश कुमार का सोशल इंजीनियरिंग और लालू यादव का गंवई अंदाज बिहार में बीजेपी को पनपने नहीं देगा।

अब लालू यादव ने तो इस लौंडा नाच के माध्यम से अपना संदेश नीतीश कुमार को दे दिया है लेकिन नीतीश कुमार लालू यादव के संदेश को बहुत महत्व देंगे ,ऐसा फिलहाल नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि जेडीयू केएमएलसी नीरज कुमार ने लालू यादव के द्वारा नीतीश कुमार के प्रति दिखाए जा रहे इस हमदर्दी को लौंडा नाच का पाप तक बता दिया है। फिर भी राजनीति की अपनी एक अलग चाल होती है,जिससे चलकर कब कौन और कहां पहुंच जाए कहना कठिन होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here