विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अब पीछे छोड़ा जातिगत जनगणना का मुद्दा

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बीरेंद्र कुमार झा

करीब 1 महीने पहले 2 अक्टूबर को जब बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी कर दिए, तब ऐसा लगा था, जैसे देश की सियासत में भारी उबाल आ जाएगा ।कोई इसे मंडल पार्ट 2 बता रहा था तो कोई इसे नई ओबीसी क्रांति। जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात होने लगी थी। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार के इस कदम में भारतीय जनता पार्टी को हराने का मंत्र देखने लगे थे। कांग्रेस ने तो राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक सत्ता में आने पर जातिगत जनगणना करने का वादा तक कर दिया। चुनावी राज्यों में कांग्रेस ने जातिगत जनगणना के मुद्दे को जोर-जोर से उठाया, लेकिन अब इसका सुर मंद पड़ता नजर आ रहा है। चुनावी राज्यों में जातिगत जनगणना का मुद्दा अब कहीं गुम सा होता हुआ दिख रहा है। चुनावी राज्यों में अपने प्रचार अभियान की शुरुआत में पूरी शिद्दत से इसे उठाने वाली कांग्रेस के सुर भी अब इसे लेकर नरम पड़ गए हैं।

कांग्रेस ने भी राज्यों के विधानसभा चुनाव में जाति जनगणना के मुद्दे को लगभग पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि कांग्रेस को जिन मुद्दे के सहारे यह लग रहा था कि वह बीजेपी को हरा देगी, आखिर पार्टी ने उस जातिगत जनगणना के मुद्दे को पीछे क्यों छोड़ दिया?

माना जाता है कि कांग्रेस जातिगत जनगणना को लेकर लाख प्रयास कर भी अनुकूल हवा बनाने में विफल रही। कांग्रेस के नेताओं ने चुनावी रैलियां में जातिगत जनगणना करने के वायदे तो किए लेकिन यह बताने से गुरेज करते रहे कि जातिगत जनगणना के बाद आखिर क्या? जाति का जनगणना से ओबीसी को क्या लाभ है ,पार्टी लोगों को यह समझने में पूरी तरह से विफल रही है।

कांग्रेस द्वारा जातिगत जनगणना से पीछे हटने की विवशता

कांग्रेस के इस मुद्दे को छोड़ देने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। इनमें से कुछ प्रमुख ओबीसी का होमोजिनस वोट बैंक न होना,लीडरशिप फैक्टर,बिहार जातिगत गणना को राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता नहीं मिलना और सवर्ण मतदाताओं का प्रभाव आदि शामिल है।

ओबीसी का होमोजिनस वोट बैंक न होना

ओबीसी कोई होमोजेनियस वोट बैंक नहीं है।इसमें भी अगड़ा और पिछड़ा की लड़ाई रही है।इसी वजह से लोअर ओबीसी इसे लेकर उदासीन है। ऊपर से खतरा यह है कि ओबीसी तो एक मुश्त पक्ष में आने से रहे,जो स्वर्ण साथ में हैं वह भी ना विदक जाए। लेकिन

लीडरशिप फैक्टर

लोकल लीडरशिप की बात करें तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दोनों ही नेता खुद भी ओबीसी हैं।दोनों राज्यों में कांग्रेस ओबीसी की पार्टी बनी हुई है। मध्य प्रदेश की बात करें तो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों ही सामान्य वर्ग से आते हैं,वहीं बीजेपी की ओर से सीएम शिवराज ओबीसी नेता है।राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक बीजेपी को लोकल लीडरशिप की जगह पीएम मोदी का चेहरा आगे का मैदान में उतरने की रणनीति में भी जातिगत जनगणना के मामले में कांग्रेस को बैक फुट पर धकेल दिया है।पीएम मोदी खुद को ओबीसी नेता, वंचित वर्ग से आने वाला नेता बताने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं। ऐसे में जातिगत जनगणना को लेकर कांग्रेस की अधिक मुखरता से उल्टा पाला पड़ने का खतरा भी था।

बिहार जातिगत गणना को राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता नहीं मिलना

बिहार सरकार ने जब जाति का जनगणना के आंकड़े जारी किए तब विपक्ष को यह उम्मीद थी कि अब यह मुद्दा दूसरे राज्यों में भी बड़ा रूप ले लेगा,जगह-जगह आंदोलन होंगे।ओबीसी समाज के लोग जिनकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा बुलंद कर सड़कों पर उतर जाएंगे और फिर इस जन आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार बैक फुट पर आ जाएगी और विपक्ष को नतीजे में पॉलिटिकल गेन मिल जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम बड़े नेता केंद्रीय कैबिनेट सचिव बैंक के अधिकारियों में ओबीसी जाति की भागीदारी का जिक्र कर सरकार पर हमलावर भी हुए,लेकिन वैसा नतीजा नहीं मिला, जैसे नतीजे की विपक्षी पार्टियों को उम्मीद थी।यह मुद्दा जनता को कनेक्ट नहीं कर पाया। इसके पीछे की वजह को लेकर कहा जा रहा है ओबीसी आरक्षण का लाभ हर राज्य में कुछ गिनी चुनी जातियां तक की सीमित रह गया है। बहुत सी जातियां तक इसका लाभ नहीं पहुंच पाया और यह भी एक बजह है कि लोवर ओबीसी इसे लेकर उदासीन है।

स्वर्ण वोट का प्रभाव

विभिन्न राज्यों में सवर्ण वोट भी एक बड़ा फैक्टर है।मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां सवर्णों की आबादी15 % होने का अनुमान है। इंडिया टीवी सीएनएक्स के ओपिनियन पोल के मुताबिक प्रदेश की करीब 60 सीटों पर ब्राह्मण और 45 सीटों पर ठाकुर यानी राजपूत मतदाता डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकते हैं।राजस्थान की बात करें तो केवल ब्राह्मणों की आबादी ही यहां करीब 13% होने का अनुमान है। ब्राह्मण मतदाता सूबे की 30 सीटों पर हार जीत तय करते हैं।राजपूत समाज का भी राजस्थान के सियासत में मजबूत दखल है।200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा की करीब पांच दर्जन से अधिक सीट ऐसी है जिसे लेकर कहा जाता है कि यहां स्वर्ण मतदाता जीत- हार तय करने की स्थिति में।ऐसे मगर स्वर्ण मतदाता छिटक गए तो कांग्रेस के लिए सत्ता की राह मुश्किल ही नहीं असंभव हो जायेगी। 2018 के चुनाव में बीजेपी को इनकी नाराजगी का मूल्य चुकाना पड़ा था।

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