हेट स्पीच अस्वीकार्य, सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश ,रोकने के लिए केंद्र सरकार बनाई कमेटी

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बीरेंद्र कुमार झा

सुप्रीम कोर्ट ने नफरत भरे भाषण के मामलों पर गौर करने के लिए केंद्र सरकार से एक समिति गठित करने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा है की हेट स्पीच किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जाएगी। उच्चतम न्यायालय ने नूंह में दोनों समुदायों के बीच सौहार्द और भाईचारा बरकरार रखने की जरूरत पर बल दिया।साथ ही उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के नूंह में हाल हुई हिंसा में दर्द मामलों की जांच के लिए राज्य के पुलिस निदेशक की ओर से बनाई गई समिति पर भी विचार किया गौरतलब है कि बीते दिनों राज्य में हुई हिंसा में छह लोगों की मौत हो गई थी। उच्चतम न्यायालय हरियाणा समेत विभिन्न राज्यों में हुई रेलिया में एक विशेष सामुदाय के सदस्यों की हत्या और उनके सामाजिक एवं आर्थिक बहिष्कार के आह्वान बावत संबंधी कथित घोर नफरत भरे भाषणों को लेकर दाखिल याचिकापर सुनवाई कर रहा था।

18 अगस्त तक दें जानकारी

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति वीएन भट्टी की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज से निर्देश लेने और 18 अगस्त तक समिति के बारे में सूचित करने के लिए कहा। पीठ ने कहा की समुदायों के बीच सद्भाव और सौहार्द होना चाहिए। सभी समुदाय जिम्मेदार हैं ।नफरत की भाषण की समस्या अच्छी नहीं है और कोई भी इसे स्वीकार नहीं कर सकता ।पीठ ने कहा कि हम डीजीपी से उनके नामित तीन या चार अधिकारियों की एक समिति गठित करने के लिए कह सकते हैं, जो एसएचओ से सभी जानकारियां प्राप्त कर उसका अवलोकन करेगी ।यदि वह जानकारी प्रमाणिक है तो समिति संबंधित पुलिस अधिकारी को उचित निर्देश जारी करेगी। एसएचओ और पुलिस स्तर पर पुलिस को संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को वीडियो सहित सभी सामग्री एकत्र करने और उसके 21 अक्टूबर 2022 के फैसले की अनुसरण में नियुक्त नोडल अधिकारियों को सौंपने का भी निर्देश दिया ।सुनवाई के दौरान नटराजन ने कहा कि भारत सरकार भी नफरत फैलाने वाले भाषण के खिलाफ है,जिसकी पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि नफरत फैलाने वाले भाषणों से निपटने का तंत्र को जगह पर काम नहीं कर रहा है पत्रकार शाहीन अब्दुल्ला की ओर से दाखिल अर्जी में उच्चतम न्यायालय के 2 अगस्त के उसे आदेश का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि हम उम्मीद करते हैं कि राज्य सरकारें और पुलिस यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी समुदाय के खिलाफ कोई नफरत भरा भाषण ना दिया जाए और कोई हिंसा न हो या संपत्तियों का नुकसान न पहुंचा जाए।

इस मामले में अब्दुल्ला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि लोगों को नफरत भरे भाषणों से बचाने की जरूरत है और इस तरह का जहर परोसे जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। जब पीठ ने सिब्बल से एक समिति गठित करने के विचार के बारे में पूछा तो वरिष्ठ वकील ने कहा मेरी दिक्कत यह है कि जब कोई दुकानदारों को और अगले 2 दिन में एक समुदाय के लोगों को बाहर निकालने की धमकी देता है तो यह समिति मदद नहीं करने वाली है। सिब्बल ने कहा कि पुलिस कहती रहती है कि प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है, लेकिन अपराधियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता या उन पर मुकदमा नहीं चलाया जाता ।समस्या प्राथमिकी दर्ज करने की नहीं है,समस्या यह है कि क्या प्रगति हुई।वेकिसी को गिरफ्तार नहीं करते हैं, न ही किसी पर मुकदमा चलाया जाता है।प्राथमिकी दर्ज करने के बाद कुछ नहीं होता है। इस मामले में अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।

नफरत भरे भाषण नहीं दें

उच्चतम न्यायालय ने कहा था की नफरत भरे भाषणों से माहौल खराब होता है और जहां भी आवश्यक हो वहां पर्याप्त पुलिस बल या अर्धसैनिक बल को तैनात किया जाना चाहिए और सभी संवेदनशील क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे के जरिए वीडियो रिकॉर्डिंग सुनिश्चित की जाए। अर्जी में कहा गया है कि अदालत के आदेश के बावजूद हरियाणा के नूंह में सांप्रदायिक झगड़ों के बाद विभिन्न राज्यों में 27 से अधिक रैली आयोजित की गई और नफरत भरे भाषण दिए गए। इसमें कहा गया है कि उपरोक्त आदेश के बावजूद विभिन्न राज्यों में 27 से अधिक रैली आयुर्वेद की गई जहां एक समुदाय विशेष के लोगों की हत्या और सामाजिक एवं आर्थिक बहिष्कार का आवाहन करने वाले नफरत भरे भाषण खुलेआम दिए गए हैं।

याचिकाकर्ता ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त और उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के पुलिस महानिदेशक और अन्य अधिकारियों को पर्याप्त कार्रवाई करने तथा यह सुनिश्चित करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है कि वहां ऐसी रेलिया का आयोजन न करने दी जाए। पत्रकार अब्दुल्ला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने अदालत से कहा था कि दक्षिणपंथी संगठनों,विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ओर से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में 23 प्रदर्शनों की घोषणा की गई थी,जिसके बाद शीर्ष अदालत ने 2 अगस्त को एक आदेश पारित किया था,जिसमें कहा गया था कि संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई जाए और नफरत की भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।गौरतलब है की 31 जुलाई को एक भीड़ द्वारा एक धार्मिक यात्रा को रोकने की कोशिश के बाद नूंह में भड़की हिंसा में दो होमगार्ड सहित 6 लोगों की मौत हो गई थी।

 

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