Homeदेशमातोश्री पहुंच रहे हैं नीतीश कुमार ,मिशन 2024 को देंगे धार !

मातोश्री पहुंच रहे हैं नीतीश कुमार ,मिशन 2024 को देंगे धार !

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अखिलेश अखिल 

हालांकि शराब घोटाले को लेकर कांग्रेस और आप पार्टी में घमासान मचा ही लेकिन नीतीश कुमार को  लगता है कि गए सब ठीक हो जाएगा। विपक्षी एकता को धार देने के लिए आज नीतीश कुमार नवीन  पटनायक से भी मिल रहे हैं। उनकी अगली यात्रा मुंबई की है। कहा  जा रहा है कि नीतीश कुमार 11 तारीख को मुंबई जायेंगे और मातोश्री जाकर उद्धव ठाकरे से मिलेंगे। उद्धव से मुलाक़ात और बात के बाद नीतीश कुमार उसी दिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार से भी बैठकी  करेंगे। विपक्षी एकता की रह में नीतीश की इस यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है। खबर यह भी ही कि आगामी 17 या 18 तारीख को पटना में प्रस्तावित विपक्षी एकता की बैठक को लेकर भी चर्चा हो सकती है।                  
बता दें कि इससे पहले नीतीश कुमार ने राहुल गांधी, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अलावा देश के कई दिग्गज नेताओं के साथ मुलाकात की है। बीजेपी की राजनीति मुंबई में उत्तर भारतीयों के दम पर चलती है, लेकिन बीजेपी के मराठी नेतृत्व को उत्तर भारतीय लीडरशिप नहीं चाहिए। इससे उत्तर भारतीय मतदाताओं और बीजेपी के उत्तर भारतीय नेताओं में आम धारणा बन गई है कि सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए बीजेपी सिर्फ उनका इस्तेमाल करती है। उसे उत्तर भारतीयों से वोट चाहिए, लेकिन सरकार और संगठन में नेतृत्व का मौका नहीं देगी। इससे ये लोग बीजेपी से उकता गए हैं। वे मौके की तलाश में हैं। संभव है कि बीएमसी चुनाव से पहले बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर हो। उद्धव सेना, शिंदे सेना और कांग्रेस की पैनी नजर इन उत्तर भारतीय वोटरों और नेताओं पर है।
        नीतीश -उद्धव और शरद पवार की मुलाकात तो वैसे आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर है। ऐसे भी महाराष्ट्र में अभी एमवीए के तहत कांग्रेस ,उद्धव की शिव सेना और शरद पवार की एनसीपी काफी मजबूत मानी जाती है लेकिन इस मजबूत गठबंधन को देश स्तर तक बनाये रखने के लिए विपक्षी एकता की जरूरत ही .कहा जा रहा है कि अगर विपक्ष मिलकर चुनाव लड़ेगा तो बीजेपी को हराया जा सकता है। ऐसा संभव भी हो सकता है क्योंकि पिछले दो लोकसभा चुनाव का गणित देंखे तो बीजेपी को करीब 36 फीसदी एकमुश्त वोट मिलते रहे हैं जबकि बाकि वोट विपक्षी दलों में बंटते रहे हैं। विपक्षी दलों को लग रहा है कि अगर हम एक होकर चुनाव लड़े और एक सीट पर एक ही उम्मीदवार उतरे तो बीजेपी को परास्त किया जा सकता है।      
  ऊपर से देखने में विपक्ष का यह फॉर्मूला सटीक तो लगता है लेकिन क्या यह इतना आसान है ? देश के भीतर बड़ी संख्या में क्षेत्रीय पार्टियां है और कई दल तो राज्य की राजनीति में मजबूत दखल भी रखते हैं। उनकी राजनीति कुछ अलग होती है लेकिन उनकी राजनीति कई जगह बीजेपी को चुनौती भी देती है। मसलन यूपी में सपा और बसपा की राजनीति काफी गहरी है। उधर बंगाल में ममता की राजनीति के सामने सब पस्त हैं। दिल्ली और पंजाब में आप की राजनीति काफी गहरी हो गई है। फिर इसी तरह से तेलंगाना ,आंध्रा ,ओडिशा ,तमिलनाडु के साथ ही पूर्वोत्तर की राजनीति में भी क्षेत्रीय दलों की अपनी महत्ता है और भूमिका भी। इन दलों को कैसे साधा जाएगा यह एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में विपक्षी एकता की बात ऊपर से तो अच्छा लगता है लेकिन सभी को साथ लेकर चलने की बात भी है। अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर देश की रजनीति करवट ले सकती है।        
उधर ,नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे के साथ जो बैठक होनी है उसके कुछ और मायने भी हैं। इस मुलाकात का बड़ा असर बीएमसी चुनाव पर भी पड़ेगा। दरअसल बीएमसी में आज भी उद्धव की पकड़ है और यह वर्षों से चला आ रहा है। बीजेपी चाहकर भी उद्धव की सेना को बीएमसी से बेदखल नहीं कर प् रही है। बीजेपी ने शिंदे को तोड़कर जो खेल किया था उसमे बीएमसी में पैठ बढ़ाने की भी रणनीति थी लेकिन शिंदे के जरिये बीजेपी को कोई बड़ा लाभ नहीं मिला। हल में ही बीजेपी ने की तरह के सर्वे के जरिये यह जानने की कोशिश की कि बीएमसी में उद्धव सेना की पकड़ कमजोर हुई या  नहीं। सर्वे की  रिपोर्ट बीजेपी  को और भी भ्रमित करती रही। रिपोर्ट बताती है कि बीएमसी में उद्धव की सेना पहले से भी ज्यादा मजबूत हुई है।  
  बीजेपी की परेशानी यह है कि वह बिहार और यूपी के लोगों से वोट तो लेती है लेकिन वहां के लोगों को न तो टिकट देती है और न ही संगठन में रखती है। बीजेपी का यह खेल समझ से परे है। जबकि उद्धव की सेना बिहार और यूपी वालों को अपने साथ रखती रखती  है। उसे चुनाव भी लड़ाती ही और संगठन से भी जोड़ती है। अभी नीतीश कुमार की  इस यात्रा को उसी नजरिये से जोड़कर देखा जा रहा है। उद्धव को भी लग रहा है कि नीतीश बिहारी भाइयों को सन्देश देंगे तो बीएमसी चुनाव से लेकर आगामी लोकसभा चुनाव में शिवसेना के पक्ष को मजबूती मिलेगी। और ऐसा संभव भी है। 

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