अखिलेश अखिल
चुनाव लड़ना कौन चाहता है? और फिर सत्ता गवाने का भय किसे नहीं होता? लेकिन भारतीय संसदीय व्यवस्था में हर पांच साल पर चुनाव तो होने हैं और जनता के नुमाइंदे कहलाने वाले नेताओं को चुनावी मैदान में जाना ही पड़ता है। 2024 में फिर लोकसभा चुनाव होने हैं। एक तरफ अपना सब कुछ खो चुकी कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा के जरिए जिन्दा होने का भगीरथ प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ राजधारी बीजेपी किसी भी सूरत में सत्ता बरकरार रखने की चुनौती का सामना कर रही है।
बीजेपी को लगने लगा है कि अगले चुनाव में सौ फीसदी धार्मिक अजेंडे पर चुनाव नहीं जीते जा सकते। वह जानती है कि केवल हिन्दू मुसलमान की राजनीति अब देश के लोगों के लिए आकर्षण वाली नहीं रही। बीजेपी यह भी जानती है कि देश के युवाओं का मन बदला है और बहुत से शहरी लोग भी धार्मिक और जातीय राजनीति से खफा हो रहे हैं। भारत की आतंरिक समस्या के साथ ही पडोसी देशो से मिल रही भारत को चुनौती और खासकर भारत चीन विवाद पर अब जनता बहुत कुछ समझ गई है। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव जीतना कठिन तो है लेकिन मुश्किल नहीं। बीजेपी को सबसे ज्यादा भय एंटी इंकम्बेंसी को लेकर है। पार्टी को लगने लगा है कि लगागतार तीन बार सत्ता की राजनीति संभव नहीं। कई मसले ऐसे हैं जो सालों से वही के वही हैं ऐसे में जनता सबसे ज्यादा सवाल उन्ही मुद्दों पर पूछने लगी है। सरकार को यह भी मालूम है कि मोदी की लहर में भले ही दर्जनों नेता चुनाव जीतने में सफल तो रहे हैं लेकिन जनता में उनकी पैठ नहीं है। पार्टी को इस बात का भी भान है कि दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों की कोई पहचान नहीं है। उनके काम से जनता खुश भी नहीं है।
ऐसे में बीजेपी को लगने लगा है कि विपक्ष की चुनौती का सामना तो किया जा सकता है लेकिन जनता का सरकार के खिलाफ मुखर होना और एंटी इंकम्बेंसी की वजह से पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में बीजेपी के भीतर एक रणनीति यह बन रही है कि लोकसभा चुनाव में ऐसे राज्य सभा के सांसदों को उतारा जाए जिनकी पहचान भी है और साफ़ चेहरे भी। खबर के मुताबिक़ बीजेपी के भीतर इस पर सहमति भी बन गई है कि करीब दो दर्जन से ज्यादा मौजूदा सांसदों को टिकट न देकर राज्य सभा सांसदों को मैदान में उतारा जाए। इसके साथ ही करीब दो दर्जन नए उम्मीदवारों को चुनाव में मौक़ा दिया जाए। ऐसे में इस बात की सम्भावना बढ़ गई है कि अगले लोकसभा चुनाव में करीब 40 से 50 मौजूदा सांसदों के टिकट कट सकते हैं। बीजेपी के भीतर सबसे ज्यादा बवाल इसी को लेकर है।
असल में पिछले दिनों भाजपा के राज्यसभा सांसदों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक हुई है, जिसमें उन्होंने सांसदों से जमीन पर काम करने को कहा है। इन सांसदों की जिम्मेदारी भी उन क्षेत्रों में ज्यादा है, जहां भाजपा का लोकसभा सांसद नहीं है। बताया जा रहा है कि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने उच्च सदन में पार्टी के सदस्यों से अलग अलग समूहों में सुबह के नाश्ते पर मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने सांसदों के साथ लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा की।
बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री राज्यसभा सांसदों से कहा कि उनका कोई चुनाव क्षेत्र नहीं है इसलिए उनके पास ज्यादा समय है कि वे अलग अलग जगह पर जाएं और लोगों को जोड़ने का काम करें। मोदी ने सबसे ज्यादा चर्चा सोशल मीडिया को लेकर की। भाजपा के जानकार सूत्रों के मुताबिक उन्होंने सभी सांसदों से कहा कि वे सोशल मीडिया में अपन फॉलोवर बढ़ाने के लिए काम करें। उनकी सोशल मीडिया प्रेजेंस का भी आकलन किया गया और बताया जा रहा है कि यह भी पूछा गया कि उन्होंने केंद्र सरकार के कामकाज, फैसलों या नमो ऐप के जरिए शेयर की जाने वाली सामग्री का कितना प्रचार किया। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने सांसदों से काशी करिडोर, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, महाकाल लोक आदि को देखने जाने के लिए भी कहा और यह भी कहा कि वे लोगों के लिए इन जगहों की यात्राओं का आकलन करें।
दरअसल पीएम मोदी चाह रहे हैं कि उनकी सरकार ने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की जगहों पर जो काम किया है वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखाया जाए। इसके अलावा वे यह भी चाहते हैं कि पार्टी के जाने माने चेहरे या मशहूर नेता इस बार खुद चुनाव लड़ें ताकि एंटी इन्कंबैंसी को कम किया जा सके।
बता दें कि पिछली बार एकाध राज्यसभा सांसद लोकसभा का चुनाव लड़े थे। जैसे रविशंकर प्रसाद को पटना साहिब सीट से लड़ाया गया था। इस बार ऐसे सांसदों की संख्या बढ़ सकती है। सूत्रों के मुताबिक़ ऐसे कोई दो दर्जन राज्य सभा सांसदों को चिन्हित किया जा रहा है। इस समय राज्यसभा में भाजपा के 92 सांसद हैं। सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, बिहार में सुशील मोदी, राकेश सिन्हा व सतीश चंद्र दुबे, छत्तीसगढ़ में सरोज पांडेय,ओडिशा में धर्मेंद्र प्रधान, तेलंगाना में डॉक्टर के लक्ष्मण, गुजरात में डॉक्टर मनसुख मंडाविया, महाराष्ट्र में नारायण राणे, असम में सर्बानंद सोनोवाल जैसे राज्यसभा सांसदों के बारे में कहा जा रहा है कि ये अगला लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे।

