Homeदेशदेश के कई राज्यों ने अबतक नहीं बनाया पेसा कानून

देश के कई राज्यों ने अबतक नहीं बनाया पेसा कानून

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झारखंड समेत चार राज्यों ने अब तक पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया एक्ट (PESA) के प्रावधानों के अनुसार कोई कानून नहीं बनाया है । पेसा कानून नहीं बनाने वाले राज्यों की सूची में उड़ीसा ,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड शामिल है। पेसा एक्ट 1996 में अनुसूचित राज्यों को कानून बनाकर ग्रामसभा को शक्ति देने का प्रावधान किया गया था। पेसा एक्ट के लागू होने से अनुसूचित क्षेत्र में जमीन के हस्तांतरण करने या नहीं करने का पूरा अधिकार ग्रामसभा को होता है।

पेसा एक्ट 1996 के बाद बना झारखंड

झारखंड का गठन पीसा 1996 के लागू होने के बाद हुआ है। पांचवी और छठी अनुसूची में शामिल सभी राज्यों की अपने-अपने पंचायती राज अधिनियम में पेशा के प्रावधानों को दिसंबर 1997 तक शामिल करने की बाध्यता थी। इस अधिनियम के प्रावधानों के लागू करने के लिए 10 राज्यों को ऐसा कानून बनाना था ।हालांकि किसी भी राज्य में राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से इस निर्धारित समय सीमा में पेसा रूल नहीं बनाया। झारखंड और छत्तीसगढ़ के लिए 1997 तक पेसा कानून बनाने वाली शर्त लागू नहीं थी क्योंकि तब इन दोनों राज्यों का गठन ही नहीं हुआ था।

छह राज्यों ने बनाया पेसा कानून

अब तक 10 राज्यों में से 6 राज्यों ने पेशा कानून बना लिया है।जिन राज्यों ने यह कानून बनाया है, उसमें आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात का नाम शामिल है।तेलंगाना ने आंध्र प्रदेश के कानून को ही स्वीकार करते हुए अपने यहां लागू कर लिया है। झारखंड सरकार ने अब तक पेशा कानून यह कहते हुए नहीं बनाया है कि इसने झारखंड पंचायत राज अधिनियम में पेसा कानून के अनुरूप ही ग्रामसभा को शक्ति देने का प्रावधान कर दिया है। पेसा एक्ट की धारा 4 (बी, सी, डी, ई) यथा ग्राम सभा के गठन, परंपराओं के संरक्षण का अधिकार, योजना और लाभुकों के गांवों के चयन आदि का अधिकार ग्राम सभा को देने के लिए पंचायत राज अधिनियम की धारा 2,3 और 10 की विभिन्न उप धाराओं में प्रावधान किया गया है। न्यायिक विवादों के दौरान शीर्ष अदालत में झारखंड पंचायत राज अधिनियम में किए गए प्रावधानों को संवैधानिक रूप से सही माना है।

झारखंड सरकार ने वर्ष 2003 में ग्राम सभा संचालन नियमावली बनाई

झारखंड सरकार ने वर्ष 2003 में ग्राम सभा संचालन नियमावली बनाई जिसमें परंपरा के अनुसार मानकी, मुंडा, प्रधान, मांझी आदि को ग्राम सभा की बैठकों में अध्यक्षता करने का अधिकार दिया गया है। ग्राम सभाओं को फैसला करने और ग्राम पंचायतों में उसे क्रियान्वित करने का अधिकार भी पंचायत राज अधिनियम में दिया गया है। पेसा कानून के अनुरूप ही लघु खनिजों के लिए लीज और लाइसेंस देने से पहले ग्रामसभा की सहमति लेने का प्रावधान किया गया है। वन विभाग ने भी 2014 में अधिसूचना जारी कर लघु वनोपज पर अपना अधिकार समाप्त कर दिया है। अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन के हस्तांतरण की शक्ति ग्राम सभा को देने के बिंदु पर पंचायत राज में प्रावधान करने की कार्यवाही की जा रही है। सरकार ने भू – अर्जन अधिनियम में ग्राम सभा की सहमति आवश्यक करार दिया है।

द्वैत व्यवस्था है झारखंड में

पैसा के अंतर्गत कानून बना दिए जाने की स्थिति में झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में त्रिस्तरीय पंचायत द्वारा चुने प्रतिनिधि की जगह पर ग्राम प्रधान मुंडा मांग की जैसे परंपरागत प्रधान ही रहते। फिलहाल झारखंड में द्वैत व्यवस्था लागू है।यहां पेसा एक्ट नहीं बनाने की स्थिति में पंचायती राज में अधिनियम में संशोधन करते हुए ग्राम प्रधान, मुंडा, मानकी आदि की भी व्यवस्था रखी गई है।साथ ही त्रिस्तरीय पंचायत से चुने गए जनप्रतिनिधि भी रहते हैं।इस द्वैत व्यवस्था की वजह से कई बार कई जगहों में योजना चयन को लेकर टकराव की स्थिति भी आती है जिससे कई योजनाएं प्रभावित होती है।
बीरेंद्र कुमार झा

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