अखिलेश अखिल
पहले की राजनीति दलित और मुस्लिमों पर टिकी थी लेकिन अब पिछड़ी राजनीति कुलाँचे मार रही है। सब जान गए हैं कि पिछडो की ताकत बड़ी है। पिछड़े इकट्ठे हो जाए तो खेल बन भी सकता है और ख़राब भी। कांग्रेस हमेशा से ही ब्राह्मण ,दलित और मुस्लिम समाज की ही राजनीति करती रही। लेकिन यह सब अब ख़त्म हो चुका है। ब्राह्मण और सवर्ण समाज जैसे ही कांग्रेस से बाहर हुआ कांग्रेस की राजनीति डूबती चली गई। वजह है एक समय था जब सवर्णो के कहने पर दलित और समाज के और वर्ग के लोग उसे ही वोट करते थे जिसे सवर्ण समाज के नेता चाहते थे। लेकिन जैसे ही बीजेपी के साथ सवर्ण जुटे कांग्रेस कमजोर होती गई। बाकी की कांग्रेस की राजनीति को क्षेत्रीय दलों ने ख़ाक कर दिया। देश में जितनी भी क्षेत्रीय पार्टियां सामने आयी सबके सब कांग्रेस के खिलाफ ही। चुकी सत्ता के केंद्र में तब कांग्रेस ही थी। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।
कांग्रेस आज काफी कमजोर है। पार्टी के भीतर सुविधाभोगी नेता काफी रहे। कभी नेहरू के नाम पर वोट मिलता रहा तो कभी इंदिरा के नाम पर। कभी राजीव् गाँधी के नाम पर वोट मिले तो कभी सोनिया गाँधी के नाम पर। कह सकते हैं कि गाँधी परिवार के नाम पर ही कांग्रेस आगे बढ़ती रही और कांग्रेस के नेता सत्ता सरकार में बने रहे। लूट भी की। कमाई भी की। भ्रष्टाचार भी खूब हुए। घोटाले तो इतने हुए जिसकी गिनती नहीं की जा सकती। अंत यही हुआ कि कांग्रेस बदनाम होती गई और मौकापरस्त नेता पार्टी से बाहर निकलते गए। खाये पीये और अघाये नेता किसी भी पार्टी में पहुँचते रहे। आज बू दूसरी पार्टियों के नेताओं की सूची देखेंगे तप पता चलेगा कि करीब 60 से 70 फीसदी पुराने नेता कभी कांग्रेस राज में लाभ कमाते रहे हैं।
राजनीति बदलती है। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है। एक समय यह भी था कि कांग्रेस के खिलाफ देश की सभी पार्टियां एक होकर जनता पार्टी नमक अलाइंस खड़ा किया था। जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच 1977 में आमना सामना हुआ और कांग्रेस बुरी तरह से हार गई। तब इंदिरा गाँधी का राज था। लेकिन फिर ढाई साल के बाद ही चुनाव हुए और कांग्रेस वापस आ गई।
आज वही हाल बीजेपी के साथ है। बीजेपी के खिलाफ 28 पार्टियां इंडिया अलाइंस बनाकर चुनौती देने को तैयार है हालांकि बीजेपी के साथ भी तीन दर्जन पार्टियां हैं। लेकिन चुनौती तो बीजेपी को मिलती दिख रही है। और सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस ही देती नजर आ रही है। कोई नहीं जानता की आगे कांग्रेस का क्या भविष्य होगा लेकिन इतना तो साफ़ है कि बीजेपी की हालत पिछले चुनाव से कमतर होने वाली है। देश का मिजाज बदल गया है और बदले मिजाज को कोई रोक तो नहीं सकता।
तो चर्चा हो रही थी पिछड़ी जातियों की राजनीति की। हमारे देश में पिछड़ी जातियों की संख्या काफी है। हर राज्य में अलग -अलग तरह की पिछड़े लोग है और सरकार और विपक्ष के लोग इन जातियों के नाम पर राजनीति भी करती है। पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की भी व्यवस्था है लेकिन अब जब खेल समझ में आगया तो बिहार में जातिगत जनगणना भी कराई गई है। अगर यह जनगणना पिछड़ी जातियों के लाभ केव रूप में सामने आएगी तो देश का खेल ही। कहा जा रहा है कि देश में पिछड़ी जातियों की संख्या करीब 60 फीसदी के करीब है। लेकिन यह तो सिर्फ एक अनुमान भर है। असली परिक्षण तो अभी बिहार से होना है। अगर जिस लाभ के लिए यह परिक्षण किया गया है अगर वह वह निशाने पर लग गया तो देश की राजनीति की बदल जाएगी। बीजेपी को इसी का डर है। और यह डर स्वाभाविक बी ही है।
बदले हालत में अब बीजेपी समेत सभी पार्टियां पिछड़ों की राजनीति करती नजर आ रही है। वैसे बीजेपी काफी सा,मई से यह राजनीति कर रही है और पिछड़े वोट का बड़ा हिस्सा बीजेपी को मिलता भी है। लेकिन जो हिस्सा बीजेपी को वोट नहीं देता और कई पार्टियों में बंट जाता है अगर वह एक साथ मिल जाए तो बीजेपी की परेशानी बढ़ेगी और बीजेपी की राजनीति भी कुंद हो जाएगी। बीजेपी भी इस खेल को समझ रही है।
इधर कांग्रेस ने भी पिछड़ों की राजनीति को साधने की कोशिश की है। इस कोशिश में कांग्रेस को कितना लाभ मिलेगा यह कोई नहीं जानता। लेकिन यह भी सच है कि पिछड़ों का एक बड़ा तपका कांग्रेस से जुड़ता जा रहा ही और कहा जा रहा ही कि आने वाले समय में कांग्रेस दलित। पिछड़ा और मुस्लिम का कॉकटेल खड़ा कर सकती है। यही वजह है कि महिला आरक्षण पर बहस के दौरान राहुल गाँधी ने पिछडो के आरक्षण का जिक्र किया और देश सचिवों में मात्र तीन पिछड़े सचिव की बात कही।
गुरुवार को ओबीसी के मुद्दे पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के आरोप पर पलटवार किया। उन्होंने कांग्रेस नेता से पूछा कि वह बताए कि 2004 से 2014 के बीच कितने ओबीसी सेक्रेटरी थे और कहां थे?
20 सितंबर को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर बोलते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र की मोदी सरकार पर अन्य पिछड़ा वर्ग की अनदेखी करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि आज भारत सरकार के 90 में से सिर्फ 3 सेक्रेटरी ओबीसी हैं। वहीं, उनके सवाल पर पलटवार करते हुए भाजपा अध्यक्ष JP नड्डा ने राहुल गांधी से पूछा कि 2004 से 2014 के बीच कितने ओबीसी सेक्रेटरी थे और कहां थे? इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि अगर आज सरकार में सिर्फ 3 ओबीसी सचिव है तो इसके पीछे कारण क्या है?
2004 से 2014 तक कितने ओबीसी सेक्रेटरी थे?
राहुल गांधी को संसद में घेरते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा ने कहा कि पहले कांग्रेस को अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए। उन्होंने कितने ओबीसी को बड़े पद पर पहुंचाया। बीजेपी ने तो देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया है।
लेकिन क्या सच में नड्डा ने जो कहा वह ठीक ही कहा ? सच तो यही है कि बीजेपी के अध्यक्ष ने जो कहा वह गलत है। देश का पहला ओबीसी प्रधानमन्त्री तो देवगौड़ा ही थे। फिर मोदी कैसे हो गए ? संसद में इस तरह की झूठी बातें नहीं की जनि चाहिए। मंडल की राजनीति का बीजेपी हमेशा विरोध की करती रही है। और अगर नरेंद्र मोदी देश ओबीसी प्रधान मंत्री बने भी हैं तो उसका श्रेय तो लालू यदव से लेकर मुलायम सिंह और नीतीश कुमार से लेकर उन तमाम समाजवादियों को दी जनि चाहिए जो मंडल आयोग की रिपोर्ट के लघु करने में भूमिका ादा की थी। इसके असली हेरॉन तो वीपी सिंह ही थे। सच में कहा गए ही कि लड़ता कोई और है और भोगता कोई और है।

