अखिलेश अखिल
2011 की जनगणना में जाति आधारित सामाजिक आर्थिक स्थिति के ब्यौरे को मोदी सरकार ने जारी नहीं किया था। इसके अलावा ओबीसी के भीतर नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण को लेकर कम प्रभुत्व वाली जातियों की स्थिति देखने के लिए बनाई गई ‘जी रोहिणी’ कमीशन की रिपोर्ट भी नहीं आई है, जबकि 2017 में इस कमीशन को बनाने के बाद से 11 बार एक्सटेंशन दिया जा चुका है। इस आयोग के बारे में भी कुछ जानकारी जरूरी है। चुकी इस आयोग का गठन मोदी सरकार द्वारा ही किया गए है लेकिन इसके संभावित परिणाम को लेकर बीजेपी अब सहज नहीं है। यही वजह है कि इस आयोग को हमेशा एक्सटेंशन मिलता रहता है।
बता दें कि रोहिणी आयोग का गठन अक्तूबर 2017 में संविधान के अनुच्छेद-340 के तहत किया गया था। उस समय आयोग को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये 12 सप्ताह का समय दिया गया था, हालाँकि इसके बाद से कई बार आयोग के कार्यकाल में विस्तार किया जा चुका है।
बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं की जाँच करने तथा उनकी दशा में सुधार करने से संबंधित सिफारिश प्रदान के लिये एक आदेश के माध्यम से आयोग की गठन कर सकता है। इस आयोग का गठन भी इसी आधार पर किया गया।
इस आयोग का गठन केंद्रीय ओबीसी सूची में मौजूद 5000 जातियों को उप-वर्गीकृत करने के कार्य को पूरा करने हेतु किया गया था।नियम के मुताबिक, अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्र सरकार के तहत नौकरियों और शिक्षा में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है।उप-श्रेणीकरण की आवश्यकता इस धारणा से उत्पन्न होती है किओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल कुछ ही संपन्न समुदायों को 27 प्रतिशत आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है। जबकि अधिकतर को कुछ भी नहीं मिलता। यही मानकर उप श्रेणीकरण की बात कही गई ताकि उप-श्रेणीकरण से केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अवसरों का अधिक समान वितरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
गौरतलब है कि सर्वप्रथम वर्ष 2015 में ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ने ओबीसी को अत्यंत पिछड़े वर्गों, अधिक पिछड़े वर्गों और पिछड़े वर्गों जैसी तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किये जाने की सिफारिश की थी। ओबीसी आरक्षण के लाभ का अधिकांश हिस्सा प्रायः प्रभावशाली ओबीसी समूहों द्वारा प्राप्त किया जा रहा है, इसलिये ओबीसी के भीतर अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिये उप-कोटे को मान्यता देना अति आवश्यक है। बता दें कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पास सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिकायतों और उनसे संबंधित कल्याणकारी उपायों के क्रियान्वयन की जाँच करने का अधिकार है।
आयोग के विचारार्थ विषय
इस आयोग के गठन के साथ ही इसके विषय की भी चर्चा की गई थी ताकि आयोग इधर -उधर नहीं भटके। जिन विषयों को सामने रखा गया था उनमे प्रमुख थे असमानता की जाँच करना। इसके अंतर्गत केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल जातियों या समुदायों के बीच आरक्षण के लाभों के असमान वितरण तथा उनकी सीमा की जाँच करना है। मापदंडों का निर्धारण गई। इसके तहत ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण के लिये वैज्ञानिक तरीके से एक आवश्यक तंत्र और मापदंडों का निर्धारण करना है।
फिर वर्गीकरण विषय भी रखे गए ताकि उप-वर्गीकरण के दायरे में आने वाली जातियों या समुदायों या उप-जातियों की पहचान करना और उन्हें उनकी संबंधित उप-श्रेणियों में वर्गीकृत करना है। और मौजूदा त्रुटियों को समाप्त करना के विषय भी निर्धारित किये गए। इसमें ओबीसी की केंद्रीय सूची में विभिन्न प्रविष्टियों का अध्ययन करना और किसी भी प्रकार की पुनरावृत्ति, अस्पष्टता, विसंगति तथा वर्तनी या प्रतिलेखन की त्रुटी में सुधार करने के संदर्भ में सलाह देना शामिल किया गया।
समिति के समक्ष चुनौतियाँ
केंद्र सरकार की नौकरियों और विश्वविद्यालय में प्रवेश में विभिन्न ओबीसी समुदायों के प्रतिनिधित्त्व तथा उन समुदायों की आबादी की तुलना करने के लिये आवश्यक डेटा की उपलब्धता अपर्याप्त है।
इसके बाद वर्ष 2021 की जनगणना ओबीसी से संबंधित डेटा एकत्र करने को लेकर घोषणा की गई थी, हालाँकि इस संबंध में अभी तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई है।
आयोग द्वारा अब तक की गई जाँच
वर्ष 2018 में, आयोग ने पिछले पाँच वर्ष में ओबीसी कोटा के तहत दी गई केंद्र सरकार की 1.3 लाख नौकरियों का विश्लेषण किया था।आयोग ने पूर्ववर्ती तीन वर्षों में विश्वविद्यालयों, IIT, NIT, IIM और AIIMS समेत विभिन्न केंद्रीय शिक्षा संस्थानों में ओबीसी प्रवेशों से संबंधित आँकड़ों का विश्लेषण किया था। आयोग के मुताबिक,ओबीसी के लिये आरक्षित सभी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों की सीटों का 97 प्रतिशत हिस्सा ओबीसी के रूप में वर्गीकृत सभी उप-श्रेणियों के केवल 25 प्रतिशत हिस्से को प्राप्त हुआ।उपरोक्त नौकरियों और सीटों का 24.95 प्रतिशत हिस्सा केवल 10 ओबीसी समुदायों को प्राप्त हुआ।नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थानों में 983 ओबीसी समुदायों (कुल का 37%) का प्रतिनिधित्व शून्य है।विभिन्न भर्तियों एवं प्रवेश में 994 ओबीसी उप-जातियों का कुल प्रतिनिधित्व केवल 2.68% का प्रतिनिधित्व है।
वर्ष 2019 के मध्य में आयोग ने यह सूचित किया कि उसकी मसौदा रिपोर्ट (उप-वर्गीकरण पर) तैयार है। व्यापक रूप से यह माना जाता है कि इस रिपोर्ट के वृहद् राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं और इसे न्यायिक समीक्षा का सामना भी करना पड़ सकता है, इसलिये इसे अभी तक जारी नहीं किया गया है।
केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी का हिस्सा
अभी तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक 42 मंत्रालयों/विभागों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी का प्रतिनिधित्व इस प्रकार है:केंद्र सरकार की सेवाओं के तहत ग्रुप ए में 16.51 %,केंद्र सरकार की सेवाओं के तहत ग्रुप बी में 13.38 फीसदी ,ग्रुप सी में 21.25 फीसदी (सफाई कर्मचारियों को छोड़कर)और ग्रुप सी 17.72 फीसदी (सफाई कर्मचारी) के साथ।
आगे की राजनीति
लेकिन सच यही है कि रोहिणी आयोग अभी तक अपनी कोई फाइनल रिपोर्ट नहीं दे सकी है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार को अब लगने लगा है कि अगर रिपोर्ट सामने आ गई तो तो एक नया बखेड़ा खड़ा होगा। सरकार की नियत को जानकर ही नीतीश तेजस्वी यादव ने जातिगत गणना की बात कही और फिर फिर आज बिहार में यह सब कराया भी जा रहा है। इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आज यह बिहार तक सिमित है लेकिन जो परिणाम उसके बाद देश के भीतर एक नयी राजनीति सामने आएगी और फिर केंद्र और राज्यों के बीच खींचतान बढ़ेगी। मंडल की यह राजनीति कमंडल पर भारी पडेगा।
क्षेत्रीय पार्टियों में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत दर्जन भर से ज्यादा पार्टियों की मांग है कि बीजेपी ओबीसी की सही तादाद बताए और उसके बाद आरक्षण की 50 फ़ीसदी की सीमा को बढ़ाए। अगर बीजेपी इसे नहीं मानती है तो इनके लिए यह कहने में आसानी होगी कि बीजेपी अन्य पिछड़ी जातियों के साथ धोखा कर रही है जबकि उनके ही वोट से वह सत्ता में पहुंची है। इसके अलावा मंडलवादी पार्टियां सामान्य जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए जो 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया गया है, उसमें उप-वर्गीकरण की ओर इशारा कर रही हैं। क्षेत्रीय पार्टियों ने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि बीजेपी ने ओबीसी को लेकर जो क़दम उठाए हैं, उसे ऊंची जातियों को अपने पक्ष में रखने के लिए संतुलित किया है। बीजेपी में बड़ी संख्या में ओबीसी सांसद हैं, लेकिन ऊंची जातियों की भावना की उपेक्षा नहीं की गई है, ख़ास कर उत्तर प्रदेश में जहां इनका वोट क़रीब 18 से 20 फ़ीसदी है।
बिहार में जातिगत गणना के परिणाम आने के बाद देश में इसकी मांग और भी बढ़ेगी। और यूपी में समाजवादी पार्टी ने इसे मुद्दा बना लिया तो खेल गंभीर हो सकते हैं। बीजेपी अभी सबकुछ देख रही है।

