Bihar News : बिहार के गांवों में महिलाओं की भूमिका तेजी से बदल रही है। जो महिलाएं कभी घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं, वे अब स्वयं सहायता समूहों के जरिए आर्थिक गतिविधियों से जुड़कर रोजगार, उद्यम और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी बन रही हैं। खेती-पशुपालन से लेकर सिलाई, खाद्य कारोबार और बाजार से जुड़ी गतिविधियों तक महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है।
इस बदलाव में जीविका परियोजना की अहम भूमिका रही है। वर्ष 2006 में शुरू हुई यह पहल आज बिहार के ग्रामीण इलाकों में व्यापक स्तर पर पहुंच चुकी है। वर्तमान में राज्य में 11.88 लाख स्वयं सहायता समूह (SHG), 73,517 ग्राम संगठन और 1,684 संकुल स्तरीय संघ गठित हो चुके हैं। इन संस्थाओं के जरिए महिलाओं को बचत, बैंकिंग, ऋण और आजीविका के अवसरों से जोड़ा जा रहा है।
छोटी बचत से करोड़ों की आर्थिक ताकत
महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की शुरुआत छोटी-छोटी बचत से हुई, लेकिन अब इसका विस्तार काफी बड़ा हो चुका है। स्वयं सहायता समूहों में महिलाओं की साप्ताहिक बचत बढ़कर 2,693 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। वहीं, सामुदायिक निवेश निधि के रूप में करीब 13,590 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं।
इस पूंजी ने महिलाओं को अपनी जरूरत के मुताबिक आजीविका गतिविधियां शुरू करने और उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर दिया है।
गांव-गांव बैंकिंग पहुंचा रहीं 6,749 बैंक सखियां
ग्रामीण महिलाओं को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में 6,749 बैंक सखियों की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई है। उनके माध्यम से हर साल 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का डिजिटल वित्तीय लेन-देन हो रहा है।
इससे उन ग्रामीण परिवारों को भी बैंकिंग सुविधाएं मिल रही हैं, जिनके लिए बैंक शाखा तक पहुंचना आसान नहीं होता। साथ ही महिलाओं की वित्तीय मामलों में भागीदारी और निर्णय लेने की क्षमता भी मजबूत हुई है।
46.89 लाख महिला किसान आधुनिक खेती से जुड़ीं
जीविका से जुड़ी महिलाएं अब केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं हैं। राज्य में 46.89 लाख से अधिक महिला किसान आधुनिक और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपना रही हैं।
वहीं, 61 महिला-नेतृत्व वाली किसान उत्पादक कंपनियां महिलाओं को सामूहिक उत्पादन और बाजार से जोड़ने का काम कर रही हैं। डेयरी क्षेत्र में भी इसका असर दिखाई दे रहा है। कौशिकी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी प्रतिदिन 35 हजार से अधिक महिला दुग्ध उत्पादकों से करीब 80 हजार लीटर दूध एकत्र कर रही है।
रसोई से सिलाई तक, महिलाओं ने खड़े किए रोजगार
ग्रामीण उद्यमिता के क्षेत्र में भी जीविका से जुड़ी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। सरकारी अस्पतालों और अन्य संस्थानों में संचालित 330 जीविका दीदी की रसोई महिलाओं के लिए रोजगार के साथ सेवा का भी माध्यम बनी हैं।
इसी तरह ‘जीविका दीदी का सिलाई घर’ के जरिए 50 लाख से ज्यादा आंगनबाड़ी बच्चों के लिए पोशाक की आपूर्ति की गई है।
अत्यंत गरीब परिवारों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए सतत् जीविकोपार्जन योजना के तहत 2 लाख से ज्यादा परिवारों को आजीविका से जोड़ा गया। इनमें करीब 1.75 लाख परिवार गरीबी से बाहर निकलने में सफल हुए हैं।
1.68 करोड़ महिलाओं को मिली शुरुआती आर्थिक मदद
महिला आर्थिक सशक्तीकरण को आगे बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत राज्य की 1.68 करोड़ से अधिक महिलाओं को 10-10 हजार रुपये की प्रारंभिक सहायता उपलब्ध कराई गई है।
योजना के तहत उद्यम स्थापित करने और उसके प्रदर्शन के आधार पर आगे 2.10 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसी क्रम में 27 अगस्त को योजना की दूसरी किस्त के रूप में 1 लाख लाभुकों को 20-20 हजार रुपये की राशि हस्तांतरित की गई।
महिला श्रमबल भागीदारी में भी बड़ा उछाल
महिलाओं के आर्थिक जुड़ाव का असर श्रमबल भागीदारी के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में महिला श्रमबल भागीदारी वर्ष 2017-18 के करीब 3-4 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में लगभग 20 प्रतिशत पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 33.5 प्रतिशत तक बताया गया है।
जीविका के जरिए महिलाओं को संगठन, पूंजी, बैंकिंग, प्रशिक्षण और बाजार का अवसर मिलने से उनकी भूमिका केवल परिवार की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं रही। अब वे स्वरोजगार, उद्यमिता और संपदा निर्माण के जरिए बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

