पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव और उसके बाद चुनाव के परिणाम को लेकर अक्सर खेला होवे की बात कही जाती है। खेला होवे वाला यह वाक्यांश प्रमुख रूप से पश्चिम बंगाल में 2021ईस्वी में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान सुनने को मिला था। यह मूल रूप से प्रतिक्रियात्मक वाक्यांश था, जिसे ममता बनर्जी 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपने भाषणों में अक्सर बोला करती थीं। दरअसल उस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा लगने लगा था कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत लगभग तय है। ऐसे में वे ममता बनर्जी को चिढ़ाने वाले अंदाज में अपने सभी भाषणों में दीदी ओ दीदी वाले वाक्यांश से संबोधन करते हुए उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करने लगे थे। ममता बनर्जी ने पीएम मोदी के इसी दीदी ओ दीदी वाले वाक्यांश को पकड़ लिया और उसके जवाब में खेला होवे वाला वाक्यांश कहने लगी। और वास्तव में 2021 ईस्वी में हुए विधानसभा चुनाव में खेला हो गया। टीएमसी को बहुमत मिल गया और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बन गईं।
भले ही ममता बनर्जी उस वर्ष हुए विधान सभा चुनाव में नंदीग्राम से विधान सभा का चुनाव हार गई थी। इसके बावजूद उस चुनाव में ममता बनर्जी की टीएमसी पार्टी को पिछले चुनाव से भी बंपर जीत हासिल हुई, और उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी को बरकरार रखा। फिर बाद में वे भवानीपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधान उपचुनाव जीतकर पश्चिम बंगाल विधान मंडल की निर्वाचित सदस्य बन गई, जिस कारण उनके मुख्यमंत्री का पद किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं हुआ और उन्होंने अपना 5 वर्ष का मुख्यमंत्रीत्व काल पूरा किया।
वर्ष 2026 में हो रहे विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ने पिछले चुनाव में जीत का पर्याय मानकर इस वाक्यांश खेला होवे को वर्तमान विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान इसका प्रयोग करने लगीं।। वर्ष 2021 ईस्वी में चुनाव के दिन हुई व्यापक हिंसा और उसमें टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगे आरोप यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पश्चिम बंगाल में खेला होवे वाक्यांश का क्या टीएमसी के दृष्टिकोण से क्या अर्थ है।
इस बार पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शास्त्री जैसे बीजेपी के बड़े नेता 2021 के चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा जोर-जोर से प्रचारित करने वाले वाक्यांश खेला होवे को जीत की चाबी मानते हुए चुनावी सभा में बोलते नजर आए, शायद इन्हें भी यह लगा होगा की इस वाक्यांश का प्रयोग कर वे वर्ष 2021 ई के विधानसभा चुनाव में सत्ता प्राप्ति से दूर रह जाने के अपनी कसक को पूरा कर लेंगे। हालांकि बीजेपी का तरीका ममता बनर्जी के प्रत्यक्ष प्रभाव करने वाले तरीके से थोड़ा अलग होता है⁶। इसके तरीके में ईडी,इनकम टैक्स, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के सहयोग से टीएमसी के समर्थक जो टीएमसी के लिए वोट का जुगाड़ करते हैं, उसे जेल में डालकर टीएमसी को डिमोरलाइज कर अपने कार्यकर्ताओं से कुछ नए अंदाज में ऐसा खेल करवाना था, जिससे यह चुनाव में टीएमसी को हरा सके।
लेकिन इस बार चुनाव में न्यायपालिका की भूमिका ऐसी रही कि इस बार पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ना तो ममता बनर्जी कोई खेल कर पाई और ना ही बीजेपी। इन दोनों को न्यायपालिका ने बांध कर रख दिया। 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव से 2 दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने आई पैक मामले में जबरन फाइल गायब करने के लिए ममता बनर्जी को लताड़ लगाई, तो कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के द्वारा अराजकता फैलाने के नाम पर टीएमसी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के फैसले पर रोक लगाकर बीजेपी की चुनाव आयोग और जांच एजेंसी की आड़ लेकर खेला करने के इरादे पर भी पानी फेर दिया। यह दोनों पार्टियों इस बार कोई खेल नहीं कर पाए और चुनाव के दिन कुछ छिटफुट घटनाएं ही घटी ।तब जनता ने अपना असली खेल दिखा दिया।
हां! पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने बड़ा खेल जरूर किया जिन्होंने 23 अप्रैल की शाम 5:00 बजे तक मतदान के प्रतिशत को बढ़कर 90% तक पहुंचा दिया। और इनका खेल ऐसा कि टीएमसी इसे अपने पक्ष में हुआ खेला बता रही है, तो बीजेपी अपने पक्ष में हुआ है खेला। मतदाता का यह खेला मतदाता गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मामले में जनता को हो रही परेशानी के विरोध में भी हो सकता है और घुसपैठियों को भगाने के पक्ष में भी हो सकता है। मतदाताओं के द्वारा किए गए इस खेला का उद्देश्य कुछ भी हो सकता है,जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता। लेकिन कुछ भी हो,पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने 90% मतदान कर एक नया कीर्तिमान तो बना ही दिया है।

