वीरेंद्र कुमार झा
ईडी के 7 वें समन जिसमें ईडी ने मुख्यमंत्री से ही पूछताछ के लिए जगह बताने की बात कही है,के चलते झारखंड की राजनीति, खासकर सत्ताधारी दल में इस समय काफी उथल-पुथल मची हुई है।तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच सत्ताधारी दल जेएमएम गांदो विधायक सरफराज अहमद के द्वारा इस्तीफा दिए जाना कई बातों की ओर इशारा करता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ईडी के द्वारा गिरफ्तार किए जाने की स्थिति में उत्पान परिस्थिति से हेमंत सोरेन की स्थिति के बाद पत्नी कल्पना सोरेन के सत्ता संभालने से लेकर सोरेन परिवार के विधायक बसंत सोरेन या सीता सोरेन समेत जेएमएम की किसी अन्य विश्वासी विधायकों को सत्ता सौंपने या फिर शिबू सोरेन को ही एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनने तक की चर्चा आम हो गई है। हालांकि इस बैठक में दिखावे के लिए ही सही सरकार के कामकाज ,आपकी सरकार ,आपके द्वार जैसे योजनाओं पर चर्चा समेत लोक सभा चुनाव जैसे मुद्दे पर मीटिंग में चर्चा की जाएगी।
कल्पना सोरेन बन सकती है मुख्यमंत्री
ईडी द्वारा जारी समन के बाद गिरफ्तार होने की स्थिति में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद हेमंत सोरेन के लिए सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के दृष्टिकोण से सबसे सुरक्षित तरीका अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनना होगा। संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार ऐसा किया भी जा सकता है लेकिन इसके मार्ग में भी कई रोड हैं।
6 महीने के अंदर चुनाव जीतकर सदन में आना
संविधान के अनुच्छेद 164 ( 4 )के अनुसार राज्यपाल किसी भी व्यक्ति को चाहे वह सदन का सदस्य हो या ना मुख्यमंत्री बन सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के 6 माह के अंदर ही उन्हें अनिवार्यता रूप से सदन की सदस्यता ग्रहण करने की अनिवार्यता होगी। ऐसा न कर पाने की स्थिति में उसे अपने पद से त्यागपत्र देना होगा, हालांकि जेएमएम चाहे तो फिर से दोबारा 6 महीने के लिए कल्पना सोरेन को ही मुख्यमंत्री पद के लिए नामित कर सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति में विपक्षी राजनीतिक दल बीजेपी के द्वारा जनता में जेएमएम के परिवारवाद किए जाने की बात जोर – शोर से उठने से बीजेपी को फायदा और सत्ताधारी दल जेएमएम,कांग्रेस और आरजेडी को नुकसान हो सकता है।
वैसे नामित मुख्यमंत्री द्वारा चुनाव जीतकर 6 महीने के अंदर सदन में पहुंचने के मामले में जेएमएम का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत ही खराब है। यहां तक कि पार्टी सुप्रीमो शिबू सोरेन भी जब झारखंड विधानसभा के सदस्य ना रहते हुए 2009 ईस्वी में मुख्यमंत्री बने थे तो 6 महीने के अंदर सदन की सदस्यता प्राप्त करने में असमर्थ रहे थे और उन्हें तमाड़ के चुनाव में राजा पीटर के हाथों हार का सामना करना पड़ा था ।
हेमंत सोरेन के एसटी सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र से नहीं लड़ सकती चुनाव
कल्पना सोरेन उड़ीसा के मयूरभंज जिला की निवासी हैं। ऐसे में झारखंड में उनके लिए पति हेमंत सोरेन के बरहेट सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की संभावना नहीं है।इस सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की स्थिति में इन्हें पति का सहानुभूति वोट मिलने की संभावना 5ही अन्यत्र कहीं मिलना संभव नहीं। झारखंड बीजेपी अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी इस बात को लेकर जगह-जगह अपनी भाषणों में झारखंड में मुखिया के चुनाव में इसी नियम के आधार पर दूसरे राज्यों से आई बहुओं को सुरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने नहीं दिया गया था।
हालांकि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इसका एक बेहतर विकल्प खोज लिया है। इसने अपने गांडेय के विधायक सरफराज अहमद से इस्तीफा दिलवा कर कल्पना सोरेन के चुनाव लड़ने के लिए एक बेहतर चुनाव क्षेत्र तैयार कर लिया है।यह सीट सामान्य होते हुए भी जेएमएम के गढ़ के रूप में जाना जाता है क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आदिवासी और मुस्लिम है जिसे झारखंड मुक्ति मोर्चा का परंपरागत वोटर माना जाता है।
मुंबई हाईकोर्ट का फैसला
मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में 6 महीने के अंदर झारखंड विधानसभा के सदस्य बनने के मार्ग में एक बड़ा रोड़ा मुंबई हाई कोर्ट का फैसला भी है, जिसे उसने 2019 में महाराष्ट्र के काटोल विधानसभा के उपचुनाव के दौरान दिया था।इस फैसला के अनुसार अगर किसी राज्य में चुनाव होने की तिथि 1 वर्ष के अंदर है तो वहां उपचुनाव नहीं करवाकर निर्धारित समय पर ही चुनाव होंगे। झारखंड की बात की जाए तो यहां भी अब विधानसभा चुनाव होने में 1 वर्ष से कुछ कम का ही वक्त रह गया है।ऐसे में कल्पना सोरेन के मुख्यमंत्री बनाकर चुनाव लड़ने की स्थिति में विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को कोर्ट में उठा सकती है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इस बाबत झारखंड के राज्यपाल क राधाकृष्णन को एक ज्ञापन भी दिया है।
बसंत सोरेन,सीता सोरेन या शिबू सोरेन के मुख्य मंत्री बनने की संभावना
कल्पना सोरेन के मुख्यमंत्री बनकर शेष कार्यकाल पूरा करने की स्थिति में अड रोड को देखते हुए इस मीटिंग में एक विकल्प यह भी बचता है की परिवार के किसी अन्य सदस्य को जो विधायक हैं, उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए। हालांकि इस बात की संभावना बिल्कुल कम है, क्योंकि अगर एक बार हेमंत सोरेन अपने छोटे भाई बसंत सोरेन या भाभी सीता सोरेन को मुख्यमंत्री का पद सौंप देते हैं, तो फिर आगे इसे वापस लेना उनके लिए भी कठिन हो जाएगा। साथ ही वे अपना वर्चस्व बनाने के लिए पार्टी में हेमंत सोरेन की स्थिति को कमजोर भी कर सकते हैं। ऐसे में हेमंत सोरेन शायद ही इस प्रकार के किसी वैकल्पिक व्यवस्था की बात करें ।
ऐसी स्थिति में एक अन्य विकल्प जो परिवार के अंदर बचता है वह यह है कि शिबू सोरेन को फिलहाल मुख्यमंत्री बना दिया जाए।
हालांकि शिबू सोरेन के पिछले रिकार्ड के मुताबिक वे दोबारा सदन में वापसी नहीं कर पाए थे और उन्हें मुख्यमंत्री का पद त्यागना पड़ा था, लेकिन इस बार बरहेट का एक विकल्प उनके के पास है,जो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का चुनाव क्षेत्र है। वहां वे सहानुभूति वोट भी पायेंग और परंपरागत वोट भी।इस प्रकार वे 6 महीने के अंदर चुनाव जीत कर सदन का सदस्य बन सकते हैं, बशर्ते मुंबई हाई कोर्ट का फैसला लागू न हो।साथ ही वापस अपने हाथ में इनसे सत्ता वापस लेना हेमंत सोरेन के लिए अपेक्षाकृत आसान होगा।
जम के किसी भरोसेमंद विधायक को मुख्यमंत्री का पद सौंपना
सोरेन परिवार के सदस्यों को मुख्यमंत्री सौंपने के अलावा पार्टी के अंदर एक अन्य विकल्प मौजूद है कि हेमंत सोरेन वैसे किसी विधायक को मुख्यमंत्री बना दें जो वापस उन्हें सत्ता सौंप सके। हालांकि इस बात की भी संभावना बिल्कुल कम है, क्योंकि एक तो परिवार के सदस्यों के बीच मतभेद घर गहराने का खतरा है, जिससे पार्टी की स्थिति कमजोर हो सकती है वहीं दूसरी तरफ आज की राजनीति में किसी भी व्यक्ति की महत्वकांछ इतनी बढ़ गई है, कि कोई व्यक्ति कितने दिनों तक अहसानमंद रहेगा कहना कठिन है।
ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज बुलाई गई सत्ताधारी दल के विधायकों की बैठक में क्या निर्णय लेते हैं।

