Homeदेशबिहार में अगड़े और पिछड़े को साधने में जुटी बीजेपी

बिहार में अगड़े और पिछड़े को साधने में जुटी बीजेपी

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अखिलेश अखिल 

बिहार में बीजेपी की असली चिंता नीतीश और तेजस्वी की नयी राजनीति को पलट कर अपनी स्थिति मजबूत करने की है। बीजेपी जान रही है कि बदले सियासी माहौल में उसकी हालत भले ही बहुत मजबूत नहीं है लेकिन बिहार के जनमानस में उसकी पैठ आज भी बरकरार है। यही वह वजह है जो बिहार में बीजेपी को शक्ति प्रदान करती है। बीजेपी अब नए सियासी समीकरण को तैयार कर रही है। और इसी समीकरण को लेकर अमित शाह बार -बार बिहार का दौरा भी कर रहे हैं। आज भी शाह बिहार पहुँच गए हैं। उनके कई कार्यक्रम हैं। बिहार में भड़के तनाव के बीच शाह का पहुंचना कोई मामूली बात नहीं है। वे पहुंचे हैं तो कुछ मैसेज देंगे और राजनीति को साधेंगे।              
            भारतीय जनता पार्टी  2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल  और जनता दल यूनाइटेड  के महागठबंधन को हराने के लिए ‘अनोखे’ सामाजिक समीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसमें ‘अगड़ी’ जातियों के साथ-साथ ज्यादातर पिछड़े समुदाय शामिल हैं।
          बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन में लालू प्रसाद की राजद भले ही सबसे मजबूत पार्टी है, लेकिन बीजेपी  का मानना है कि उसकी जीत की राह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जेडीयू  के जनाधार में सेंध लगाने पर निर्भर करती है। जेडीयू  को लंबे समय से गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों का व्यापक समर्थन हासिल है।
       केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों  मौर्य शासक अशोक की जयंती पर बिहार में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पहुंचे हैं।  यह पिछले सात महीनों में बिहार का उनका चौथा दौरा है । इस दौरान शाह के जो कार्यक्रम निर्धारित किए गए उन्हें बिहार में आबादी के लिहाज से मजबूत कुशवाहा (कोइरी) समुदाय को साधने की बीजेपी  की महत्वाकांक्षी रणनीति के प्रमुख हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। कुशवाहा समुदाय का मानना है कि सम्राट अशोक उससे ताल्लुक रखते हैं।
     बिहार की आबादी में कुशवाहा समुदाय की हिस्सेदारी सात से आठ प्रतिशत के करीब होने का अनुमान है, जो यादव समुदाय के बाद सर्वाधिक है। चुनावों में कुशवाहा समुदाय ने पारंपरिक रूप से नीतीश का समर्थन किया है। बीजेपी  ने कुशवाहा समुदाय से जुड़े सम्राट चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर इस समुदाय के लोगों को लुभाने की हर संभव कोशिश करने की अपनी मंशा जाहिर कर दी है।
   चौधरी ने नीतीश पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री ने कुशवाहा समुदाय के लिए कुछ भी नहीं किया है, उन्होंने उसे सिर्फ ‘धोखा’ दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बीजेपी को बिहार में विभिन्न समुदायों का समर्थन मिलेगा, जो लोकसभा में 40 सांसद भेजता है। बीजेपी  नेताओं ने कहा कि बिहार में यादव और कुर्मी (नीतीश इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं) दोनों समुदाय के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, ऐसे में कुशवाहा समुदाय को लगता है कि राज्य में अब उसका मुख्यमंत्री होना चाहिए। उन्होंने कहा कि BJP अपने फायदे के लिए इसी बात को भुना सकती है।
     बिहार के वयोवृद्ध नेता एवं राजद-जेडीयू गठबंधन के मुखर आलोचक नागमणि ने कहा कि लोग ‘लालू-नीतीश’ के तीन दशक से अधिक लंबे शासन से ऊब चुके हैं। उन्होंने कहा कि यादवों और कुर्मियों की सत्ता में भागीदारी रही है, लेकिन कुशवाहा पीछे रह गए हैं। नागमणि कुशवाहा समुदाय से आते हैं। कुशवाहा समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिशों के साथ-साथ बीजेपी  आबादी के लिहाज से छोटी ऐसी कई जातियों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने की व्यापक योजना पर भी काम कर रही है, जो अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के दायरे में आती हैं. ये जातियां चुनावी नतीजों का रुख पलटने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
   बीजेपी के एक नेता ने कहा कि पार्टी ने इसी वजह से शंभू शरण पटेल को पिछले साल राज्यसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया था। गौरतलब है कि पटेल को पार्टी संगठन में ज्यादा समर्थन हासिल नहीं है, लेकिन वह धानुक जाति से आते हैं, जो ईबीसी का हिस्सा है। माना जाता है कि इसी वजह से राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवारी में उनका पलड़ा भारी साबित हुआ।
     मुकेश साहनी के नेतृत्व वाली विकासशील इनसान पार्टी जैसे दलों तक पहुंच बनाने की बीजेपी की कोशिशों को भी इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जाता है. सहनी पारंपरिक रूप से केवट के रूप में काम करने वाली कई उपजातियों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। बीजेपी  ने लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के नेता चिराग पासवान के साथ भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे हैं, जो राज्य में सबसे अधिक आबादी वाले दलित समुदाय, पासवानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
      नीतीश के नेतृत्व में बीजेपी के साथ के पूर्व गठबंधन के दौरान ‘अगड़ी जातियां’ और ज्यादातर पिछड़ी जातियां भले ही एक गठबंधन के समर्थन के लिए साथ आई थीं, लेकिन वे पारंपरिक रूप से अलग-अलग पार्टियों की समर्थक रही हैं। अब बीजेपी  इन जातियों को अपने समर्थन में एक साथ लाने की दुर्लभ उपलब्धि हासिल करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

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