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उद्धव ने अगर इंडिया गठबंधन का छोड़ा साथ, तो मुश्किल में पड़ जायेगा कांग्रेस का हाथ

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विपक्षी गठबंधन इंडिया के सभी घटक दल अगर साथ भी रहते तो नरेंद्र मोदी को तीसरी बार केंद्र की सरकार बनाने से रोक पाते या नहीं रोक पाते यह तो लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलता , लेकिन विपक्षी गठबंधन इंडिया की नियति का तो अभी से ही पता चलने लगा है।इसकी जो स्थिति बनती चली जा रही है,उससे तो इस बात का भी शंसय होने लगा है कि शायद यह अपना अस्तित्व भी बचा पाएगी या नहीं।सबसे पहले तो इसके सूत्रधार नीतीश कुमार ही इस गठबंधन को बीच मझधार में छोड़कर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए खेमे में चले गए। इसके बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन के एक तरह से संयोजक माने जाने वाले घटक दल कांग्रेस पर लगातार हमलावर हो रही है। यह तो कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में दो से ज्यादा सीट देने के लिए तैयार ही नहीं हो रही है,भले ही इसके लिए वे इंडिया गठबंधन से अलग हो जाने तक को तैयार बैठी हैं।उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी कांग्रेस को लेकर ताल ठोक रही है। कांग्रेस से पूछे बगैर ही लोकसभा चुनाव 2024 के लिए कांग्रेस की सीट तय कर दे रहे हैं और एक तरह से कांग्रेस को चुनौती भी दे रहे हैं कि ज्यादा सीटों की मांग की तो फिर यहां भी इंडिया गठबंधन की खैर नहीं।

इसके बाद अब महाराष्ट्र में भी इंडिया गठबंधन के विखंडन की सुगबुगाहट होने लगी है।23 सीटों की मांग तो उद्धव गुट वाली शिवसेना (यूबीटी)शुरू से ही कर रही है, और अब तो उसने बीजेपी से जुड़ने की इच्छा भी प्रकट करना शुरू कर दिया है।दूसरी तरफ बीजेपी की तरफ से भी उद्धव को लेकर सकारात्मक संदेश मिलने लगे हैं।यानी कुल मिलाकर देखें तो इंडिया गठबंधन अब महाराष्ट्र में भी दरकता नजर आ रहा है।पुराने साथियों को जोड़ रही बीजेपी की नेतृत्ववाली एनडीए में नीतीश की ही तरह अपनी पार्टी के साथ उद्घव ठाकरे भी जुड़ जय तो कोई आश्चर्य नहीं। हां! इस स्थिति में कांग्रेस एकबार फिर से हाथ मलते रह जायेगी।

महाराष्ट्र में अटकलें का नया दौर

शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए बदले सुर से महाराष्ट्र की राजनीति से लेकर देश की राजनीति तक अटकलें का एक नया दौर शुरू हो गया है। इससे जहां विपक्षी गठबंधन इंडिया में संशय पैदा हुआ है, वहीं बीजेपी नेताओं ने भी दबे स्वर से यह कहना शुरू कर दिया है कि राजनीति में किसी के लिए भी दरवाजे हमेशा- हमेशा के लिए बंद नहीं होते हैं। दरवाजे होते ही हैं खुलने और बंद करने के लिए।

क्या कहा उद्धव ठाकरे ने

उद्धव ठाकरे ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि वह नरेंद्र मोदी को यह बताना चाहते हैं कि हम कभी भी आपके दुश्मन नहीं थे। आज भी हम आपके दुश्मन नहीं है।पिछले चुनाव में वे और शिवसेना उनके साथ थी। हमने पिछली बार अपने गठबंधन (शिव सेना और बीजेपी) के लिए प्रचार किया था और आप प्रधानमंत्री बने थे।बाद में आपने हमें खुद से दूर कर दिया।हमारा हिंदुत्व और भगवा आज भी कायम है।

उद्धव ठाकरे का यह बयान उस समय आया है जबकि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन इंडिया दरक रहा है और बीजेपी नए तथा पुराने साथियों को जोड़ रही हैं। महाराष्ट्र में बीजेपी ने दो प्रमुख दलों शिवसेना और एनसीपी को तोड़कर उन्हें अपने साथ मिल लिया है। दोनों ही दलों के अधिकांश नेता बीजेपी की साथ है। ऐसे में विपक्षी गठबंधन महाराष्ट्र में बेहद कमजोर हुआ है। उद्धव ठाकरे सदन से लेकर अदालत व चुनाव आयोग तक पार्टी और चुनाव चिन्ह की लड़ाई हार चुके हैं।ऐसे में एनसीपी और कांग्रेस के साथ चुनाव में जाने पर उनकी दिक्कतऔर बढ़ सकती हैं।

बाला साहेब के उत्तराधिकारी होने को लेकर बीजेपी की भी है उद्धव पर नजर

महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट का फिर से बीजेपी के साथ जुड़ना, बीजेपी के लिए भी बड़ा लाभ का सौदा होगा। दरअसल जमीन पर जनता के बीच अभी भी उद्धव ठाकरे को ही बालासाहेब ठाकरे और शिवसेना का उत्तराधिकारी माना जाता है। राज्य की जनता ने बालासाहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे की पार्टी ‘ मनसे ‘ को स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को भी जनता चुनाव के दौरान स्वीकार नहीं करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

वहीं दूसरी तरफ एनसीपी की अधिकांश ताकत अजीत पवार के साथ पहले से ही बीजेपी के साथ है।ऐसे में अगर उद्धव ठाकरे की एनडीए में वापसी होती है, तो महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन इंडिया का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इन तमाम बातों का मूल्यांकन करते हुए ही बीजेपी के एक प्रमुख नेता ने उद्धव ठाकरे की रैली में नरेंद्र मोदी और बीजेपी को लेकर दिए गए बयान पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है और न ही राजनीति के दरवाजे कभी बंद होते हैं।

ऐसा हुआ तो इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ेगा कांग्रेस पर

महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे और बीजेपी के पुनर्मिलन को लेकर चल रही अटकल अगर मुकाम तक पहुंच जाती
है ,तो इसका सबसे बुरा प्रभाव कांग्रेस पर पड़ेगा, जो हर जगह गठबंधन की राजनीति में लगातार अलग-अलग पड़ती चली जा रही है। जिन नेताओं और दलों पर कांग्रेस को सबसे ज्यादा भरोसा था,वही कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं।वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की कोशिश भी कांग्रेस को अलग-अलग कर उसे और ज्यादा निचले स्तर पर ले जाने की है,ताकि वह अपने दल के लिए कम से कम 370 और एनडीए के लिए 400 पर का आंकड़ा प्राप्त कर ले। वहीं कांग्रेस के पास ऐसी स्थिति में बेचारगी और लापरवाही में हाथ मलने के अलावा कुछ बच नहीं जाता है।आगामी चुनाव में इसका प्रतिकूल प्रभाव कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी देखने को मिल सकता है।

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