29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण के मतदान की समाप्ति के पश्चात चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चल रहे विधानसभा के चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा एक दूसरे पर लगाई जा रहे आरोप और प्रत्यारोप की वजह से उत्पन्न राजनीतिक गर्मी समाप्त हो गई, पिछले कुछ दिनों से सूर्य की प्रखर रश्मियों से उत्पन्न भयंकर गर्मी भी देश के बड़े हिस्से में पिछले कुछ दिनों में हुई वर्षा और ओला पात के कारण समाप्त हो गई और मौसम सुहावना हो गया। लेकिन अब पूरे देश के लोग एक अलग ही प्रकार की गर्मी से परेशान होने लगे हैं और यह गर्मी है ,चुनाव की समाप्ति के पश्चात पेट्रोल डीजल और गैस के दाम में संभावित मूल्य वृद्धि से लगने वाली आग की गर्मी। हालांकि अभी नरेंद्र मोदी की सरकार ने पेट्रोल डीजल और गैस के दाम में आग लगाकर इसे भड़काया नहीं है। अभी तो इसने सिर्फ कमर्शियल और इंडस्ट्रियल गैस सिलेंडर के दाम में₹900 सी कुछ ज्यादा की वृद्धि कर सिफ इस आग को सुलगाया है।
राजनीतिक सूत्रों से खबर आ रही है की चुनाव की प्रक्रिया समाप्त होते ही यानी मतगणना के परिणाम घोषित होने के बाद चुनाव आयोग के द्वारा मतदान की प्रक्रिया के पूरा होने की घोषणा करते ही सरकार पेट्रोल और डीजल के दाम में चार से पांच रुपया ⁴3प्रति लीटर और घरेलू गैस के दाम में 40 से ₹50 की वृद्धि करने जा रही है। मिडिल ईस्ट में हो रही लड़ाई के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से क्रूड ऑयल और गैस के जहाज के आने में परेशानी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस युद्ध के कारण हुई मूल्य वृद्धि की बात कह कर नरेंद्र मोदी की सरकार पेट्रोल डीजल और घरेलू गैस के दामों में मामूली वृद्धि करने की बात कह रही है और इसके लिए माहौल बनाने के लिए यह सूत्रों ³के हवाले से यानी अपने नेताओं ,प्रवक्ताओं और कुछ अन्य मंत्रियों से जिनके जिम्मे यह विभाग नहीं है, उससे पाकिस्तान और अन्य देशों में हुई मूल्य वृद्धि की तुलना में भारत में भी यह मामूली वृद्धि करना अनिवार्य बताने में लगी हुई है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो सरकार इस समय देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के दौरान जब इसे टाल सकती थी, तो क्या चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने के पश्चात भी इसे टाल नहीं सकती है। सही मायने में तो चुनाव के दौरान भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने पूरी तरह से इसे टाला नहीं था ,तब भी इसने पेट्रोल और डीजल के प्रीमियम टाइप में दो से ढाई रुपए की मूल्य वृद्धि की थी और इंडस्ट्रियल और कमर्शियल एलपीजी गैस तो ब्लैक मार्केटिंग के अलावा और कहीं उपलब्ध ही नहीं था। यह अलग बात है कि तब उसने यह कहकर लोगों की आंख में धूल झोंक दिया और लोगों का ध्यान डीजल और पेट्रोल के प्रीमियम ब्रांड में की गई वृद्धि से हटाने के लिया बड़ा चाल चल दिया। हर चुनाव प्रचार में बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिसमें गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे घरेलू गैस और नॉर्मल पेट्रोल तथा डीजल के दामों में वृद्धि न होने के उदाहरण देते हुए यह कहने लगे कि मिडिल ईस्ट की लड़ाई के बावजूद भारत में पेट्रोल डीजल और गैस के दाम में कोई वृद्धि नहीं की गई है। विपक्षी राजनीतिक दल के नेता भी चुनाव प्रचार में व्यस्त थे ।वे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के द्वारा पेट्रोल और डीजल के प्रीमियम ब्रांड में की गई वृद्धि को मुद्दा नहीं बना सके। लोगों को भले ही आंख में धूल झोंक दिए जाने के कारण यह नहीं दिखने , लेकिन अंदर ही अंदर यह मूल्य वृद्धि असर तो कर ही रहा था ,क्योंकि ट्रांसपोर्टों ने भाड़े में वृद्धि कर दी थी और व्यापारियों ने भी समान के मूल्य में वृद्धि कर दी थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अन्य नेता विभिन्न मुद्दों पर अपने आप को जायज ठहरने के लिए कांग्रेस के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री का उदाहरण देते हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल तथा घरेलू गैस की कीमत ऑन में संभावित वृद्धि को लेकर वह ऐसा कोई उदाहरण नहीं दे रहे हैं, और इस मामले में मिडिल ईस्ट के युद्ध और विभिन्न देशों में पेट्रोलियम पदार्थों में की गई वृद्धि का उदाहरण देते हैं। ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें तो लोगों की आंखों में धूल झोंकना है। ऐसे में इस मामले में अगर वे कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री का उदाहरण देंगे तो खुद ही इसमें फंस जाएंगे। दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व जब मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रीत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 148 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन उस समय भी भारत के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की अधिकतम कीमत₹70 प्रति लीटर थी । मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रीत्व काल में कच्चे तेल का औसत अंतरराष्ट्रीय कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल था, लेकिन कभी भी उनके शासनकाल में भारत में पेट्रोल की कीमत₹70 प्रति लीटर से अधिक नहीं हुआ था। वही जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में काफी गिरावट आने लगी थी और यह 35 से 45 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को भारत के लिए लकी प्रधानमंत्री बताते थे लेकिन इसके बावजूद उनके नेतृत्व वाली सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम कम नहीं किए थे बल्किएक्साइज ड्यूटी में वृद्धि का इसका मूल्य स्थिर रखा था। इतना ही नहीं बाद में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हुई तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि कर दी गई और एक समय भारत में पेट्रोल 114 रुपया प्रति लीटर तक पहुंच गया। पेट्रोल और डीजल कि इस मूल्य वृद्धि से लोगों को आक्रोशित होता देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जब कुछ राज्यों के विधानसभा के चुनाव आए आए तो पेट्रोल के दाम में कमी लाकर इसे 99 रुपए प्रति लीटर कर दिया। और अभी भी भारत में पेट्रोल इसी दर पर बिक रहा है। कुछ राज्यों में सेल टैक्स के कारण कीमत इससे कुछ अधिक या कम है। मिडिल ईस्ट की लड़ाई के बावजूद अभी भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 116 डॉलर प्रति बैरल ही है, जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के औसत 120 डॉलर प्रति बैरल से कम ही है लेकिन फिर भी भारत के बाजार में पेट्रोल की कीमत उनके समय के पेट्रोल की कीमत से₹29 ज्यादा है ।
अब चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के द्वारा पेट्रोल,डीजल और घरेलू गैस की कीमत में संभावित मूल्य वृद्धि से भारत के लोगों के निवाला पर पड़ने वाले असर की करें तो यह एक खतरनाक इशारा करता नजर आता है। एक दंपति और उसके दो बच्चे वाले सबसे छोटा परिवार की इकाई पर विचार करते हैं तो हम पाते हैं कि न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी भारत के लोगों के लिए अतिरिक्त एक बड़ी राशि की जरूरत पड़ेगी। आमतौर पर यह देखा जाता है कि पेट्रोल और डीजल की कीमत में जितने रुपए की वृद्धि की जाती है ट्रांसपोर्टर और व्यापारी मिलकर सामान पर कम से कम उतने ही रुपए प्रति किलो की मूल्य वृद्धि कर देता है। एक सामान्य व्यक्ति को अपने जीवन के सफल संचालन के लिए 2000 से 2500 कैलोरी की आवश्यकता होती है। इसकी व्यवस्था व्यक्ति कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन फैट यानि वासा तथा मिनरल्स यानि खनिज लवण के जरिए करता है।इस लिहाज से कार्बोहाइड्रेट की पूर्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन न्यूनतम 300 ग्राम चावल गेहूं या बाजरे की आटे की जरूरत होती है। चार व्यक्ति वाले परिवार में यह जरूरत प्रतिदिन 1200 ग्राम और महीने में 36 किलोग्राम हो जाता है। अगर पेट्रोल और डीजल के दाम में चार से पांच रुपए की वृद्धि की जाती है तो परिवार को इस न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति के लिए 144 रुपए से लेकर 180 अतिरिक्त रुपए की जरूरत होगी। इसी प्रकार प्रोटीन की जरूरत के लिए मांसाहार की जगह शाकाहार के रूप में दाल का ही उपयोग किया जाए तो भी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 100 ग्राम के हिसाब से प्रतिमाह 12 किलो दाल की आवश्यकता होगी और इसके लिए उसे अतिरिक्त 48 से 60 रुपए की व्यवस्था करनी होगी। मिनरल्स की आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसे प्रति व्यक्ति 300 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से सब्जी का सेवन करना होगा और इस तरह से प्रतिमा उस परिवार को 36 किलो सब्जी का सेवन करना होगा जिसके लिए उसे अतिरिक्त 144 से 180 रुपए का इंतजाम करना होगा। फैट यानि वसा की न्यूनतम जरूरत पूरी करने के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 300 ग्राम तेल,घी, दूध और दही की जरूरत होगी और इस प्रकार से उसे प्रतिमाह 36 किलो इन पदार्थों की जरूरत पड़ेगी और इसके लिए उसे 144 से 180 रुपए की व्यवस्था करनी होगी। इस अतिरिक्त राशि का योग करने पर अगर पेट्रोल का डीजल की संभावित राशि में चार रुपए की मूल्य वृद्धि होती है तो उस पर अतिरिक्त ₹480 का भार पड़ेगा और मूल्य वृद्धि ₹5 होने पर उसे पर अतिरिक्त ₹600 का भार पड़ेगा। अब इसे पकाने के लिए जरूरी गैस के संभावित मूल्य वृद्धि 40 से ₹50 का भी इसमें योग कर दें तो यह राशि बढ़कर ₹530 से 650 रुपए के बीच हो जाएगा। भारत की 80% से भी अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करती है और इसके लिए सरकार अधिकतम 72000 प्रति वर्ष का आय प्रमाण पत्र देता है। इस दृष्टिकोण से ऐसे परिवार की मासिक आय₹6000 से कम ही होती है। इस राशि से वह पहले से ही अपने लिए न्यूनतम खाद्य जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पेट्रोल तथा डीजल के दाम में 4 से 5 रुपए की संभावित वृद्धि की और घरेलू गैस की कीमत में 40 से ₹50 की वृद्धि की तो ऐसे परिवार के लोगों को आधे पेट खाकर ही जिंदगी गुजारनी होगी, क्योंकि उनके पास अपने आय वृद्धि का कोई साधन भी उपलब्ध नहीं है।
अब पेट्रोल डीजल और घरेलू गैस की संभावित मूल्य वृद्धि को टालने के संदर्भ में बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में जीएसटी कलेक्शन सर्वाधिक रहा है।अप्रैल 2026 में भारत का अब तक का सबसे अधिक मासिक GST कलेक्शन दर्ज किया गया है। 1 मई 2026 को जारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2026 में कुल (Gross) जीएसटी संग्रह 2.43 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहें तो इस राशि राशि में से भी कुछ राशि पेट्रोलियम कंपनी को देकर जो भारत सरकार की ही एक अनुसांगीक इकाई है, लोगों को पेट्रोल डीजल तथा घरेलू गैस की संभावित वृद्धि से राहत दे सकते हैं। कुछ और नहीं तो जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 35 से 50 डॉलर प्रति बैरल हुआ करती थी तब इसके मूल्य को स्थिर रखने के लिए इस पर जो एक्साइज ड्यूटी में वृद्धि की गई थी उसे भी पूर्व के स्तर पर ले जाया जाए तो पेट्रोल डीजल तथा घरेलू गैस की कीमत की संभावित वृद्धि को टाला जा सकता है।

