29 मई को पश्चिम बंगाल के लिए हुए दूसरे और अंतिम दौर के मतदान के समाप्ति के पश्चात सभी उम्मीदवारों की राजनीतिक भविष्य का फैसला EVM में बंद हो चुका है। 4 मई को मतगणना के लिए इन सभी EVM को खोला जाएगा और विभिन्न प्रत्याशियों को मिले मत के आधार पर उनकी जीत सुनिश्चित की जाएगी। इसके बाद सही मायने में पता चलेगा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी चौथी बार अपनी पार्टी टीएमसी की सरकार बन सकती है या इस बार बीजेपी बाजी मार लेगी और पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बन जाएगी।
आधिकारिक तौर पर पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनेगी या टीएमसी की पुनर्वापसी होगी यह तो 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इससे पूर्व ही पश्चिम बंगाल में मतदान समाप्ति के बाद एग्जिट पोल के परिणाम आने लगे हैं।इन एग्जिट पोलो में से ज्यादातर एग्जिट पोल बीजेपी को पश्चिम बंगाल में सरकार बनाती हुई दिखा रहा है तो कुछ एग्जिट पोलों में टीएमसी को भी सरकार बनाते हुए दिखाया जा रहा है। टीएमसी अगर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की स्थिति में आती है, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनती है ,तब ममता बनर्जी और इनकी पार्टी टीएमसी जरूर धमाचौकड़ी मचा सकती है। वैसे तो चुनाव प्रक्रिया के दौरान भी ममता बनर्जी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बीजेपी के पक्ष में पश्चिम बंगाल के चुनाव को प्रभावित करने की बात कहती रही है और इस मामले को उन्होंने सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है। इस मामले में अगर न्यायालय का फैसला ममता बनर्जी की पार्टी के पक्ष में गया तो वह चुनाव में बहुमत से दूर रहने की स्थिति में पश्चिम बंगाल में दुबारा दूसरे मुख्य आयुक्त के नेतृत्व में चुनाव करवाने की बात कर सकती है, और दोबारा सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। लेकिन इसके अलावा एक और बड़ा मुद्दा उनके पास है ।यह मुद्दा है चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार के द्वारा बहुमत नहीं रहने के बावजूद लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को विशेष सत्र आहुतकर सदन के पटल पर रखकर पश्चिम बंगाल के चुनाव को प्रभावित करना। 4 मई को मतगणना के पश्चात ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए बहुमत प्राप्त कर पाती हैं या नहीं और बहुमत न पाने की स्थिति में वे इस मुद्दे को लेकर अदालत में जाएंगी या नहीं, इस मुद्दे पर गए बगैर जानते हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने के बावजूद विशेष सत्र आहुतकर नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम लोकसभा में पेश कर उसके गिर जाने के बावजूद चुनाव को प्रभावित करने जैसा कोई काम किया या नहीं?वैसे तो यह बात तमिलनाडु के संदर्भ में भी कहीं जा सकती है, लेकिन हम अपनी चर्चा के केंद्र बिंदु को पश्चिम बंगाल के संदर्भ में ही रखकर देखते हैं।
लोकसभा में केंद्र सरकार के द्वारा लाया गया नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम, 17 अप्रैल को बहुमत के अभाव में लोकसभा में गिर गया। लेकिन इस विधेयक के गिरने के बावजूद बीजेपी चुप नहीं बैठी ,बल्कि इसका पूरी तरह से राजनीतिक लाभ लेने में जुट गई। बीजेपी के तमाम बड़े नेता विपक्षी राजनीतिक दलों पर महिलाओं के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाकर यह कहने लगे कि महिलाएं इसके लिए उन्हें माफ नहीं करेगी। यह बात सिर्फ बीजेपी के नेता ही नहीं कर रहे थे, खुद प्रधानमंत्री भी इसे पूरी जोर-जोर से उठा रहे थे। तमिलनाडु में चुनावी सभा के दौरान तो उन्होंने यह बात कही ही ,उसी दिन रात 8 बजे उन्होंने देश के नाम संबोधन का कार्यक्रम आयोजन कर भी विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं पर महिलाओं के हितों के विरुद्ध काम करने का आरोप लगाते हुए महिलाओं का कोपभाजन होने की बात कही। और ऐसा करते हुए उन्होंने जिन विपक्षी नेताओं के नाम लिए, उसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रमुख थीं। इसके अलावा उन्होंने खुद को और बीजेपी को महिलाओं के हितों का रखवाला भी बता दिया। वे यही नहीं रुके, बल्कि उसके बाद पश्चिम बंगाल में उन्होंने जितनी सभाएं की, सभी में इस बात को दुहराया कि ममता बनर्जी जैसे विपक्षी राजनीतिक दल के नेताओं ने नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को पारित नहीं होने दिया, क्योंकि ये महिला विरोधी है। इसके साथ-साथ वे खुद को और बीजेपी को महिलाओं का हितकारी होने की बात भी करते रहे।
कानूनी रूप से यह कितना जायज है और कितना नहीं, इस पर फैसला करने का अधिकार न्यायालय का है। यहां हमें सिर्फ यह देखना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अन्य नेताओं के द्वारा इस प्रकार कहीं जाने वाली बातों का महिलाओं पर कोई असर पड़ा या नहीं। इसका पता करने के लिए हम वर्ष 2006 से महिलाओं के द्वारा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान डाले गए मत प्रतिशत और वर्ष 2026 यानी वर्तमान विधानसभा चुनाव के दौरान महिला मतदाताओं के द्वारा डाले गए मतों के प्रतिशत का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।
नागरिक अधिकारों को लेकर जागरूक रहने वाले इस पश्चिम बंगाल में महिलाएं हमेशा से बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लेती रही हैं। 2006 और 2011 ईस्वी में हुए पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के दौरान दशमलव के कुछ अंकों के साथ पुरुष मतदाताओं की संख्या ज्यादा थी तो 2016 एवं 2021 ईस्वी में दशमलव के कुछ अंकों के साथ महिला मतदाताओं की संख्या कुछ ज्यादा थी। लेकिन वर्ष 2026 में हुए पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के दोनों चरणों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा रही और कुल मिलाकर यह अंतर दो प्रतिशत के आसपास रहा। महिलाओं के मतदान का यह बढ़ा हुआ प्रतिशत का अंतर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा लाये गए नारी शक्ति बंदन संशोधन अधिनियम के निरस्त होने के बाद बीजेपी के नेताओं के द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहे जाने को लेकर महिलाओं का उत्साह है या नहीं, यह तो अन्वेषण का विषय वस्तु है ,लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर तो इस वर्ष महिलाओं के द्वारा बढ़कर मतदान करने की बात दृष्टिगोचर हो ही रही है।
4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद यदि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से बहुमत से दूर रहती है और ममता बनर्जी पीएम मोदी के नेतृत्व वाले बीजेपी के सरकार द्वारा चुनाव प्रक्रिया जारी रहने के दौरान विशेष सत्र लाकर नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम लाने और बाद में चुनाव प्रचार के दौरान इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने का आरोप लगाते हुए यदि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहे तो इसके लिए उनके पास निम्नलिखित विकल्प उपलब्ध है:-
यदि वे इसे असंवैधानिक और बीजेपी तथा पीएम मोदी का राजनीतिक साजिश मानती हैं, तो वे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकती हैं और पीएम मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को संवैधानिक चुनौती दे सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही महिला आरक्षण कानून के कार्यान्वयन में देरी के खिलाफ याचिकाएं विचाराधीन हैं। ममता बनर्जी या उनकी पार्टी (TMC) इन चल रहे मामलों में हस्तक्षेप याचिका (Intervention Application) दायर कर सकती है।

