हमारे देश में पैसे और पावर का बड़ा खेल चलता है।पैसों के बल पर ये रसूखदार लोग बड़े बड़े अपराध कर भी बच निकलते हैं और ऐशो आराम की जिन्दगी जीते रहते हैं। पुलिस का पैसों के लिए रसूखदार लोगों का चमचा बनना और गुंडो मावालियों से संगती करना तो वर्षों से सुनने में आ रहा था । लेकिन अब रसूखदार लोग पैसों और पावर के बल पर पुलिस को तो पहले ही की तरह अपना चमचा बना ही रहे हैं, अदालतों तक के फैसले को प्रभावित करने में लग गए हैं। दिशा सालियान का मामला हो या सुशांत सिंह राजपूत का मामला,अब तक इसमें कार्यवाही हुई है उसमें लोगों के समक्ष पुलिस और न्यायालय के कुछ भ्रष्ट जजों का ऐसा ही स्वरूप उभरकर सामने आया है। लेकिन दिशा सालियान के मामले में जिस तरह से उनके पिता सतीश सालियान ने अपने वकील निलेश ओझा के माध्यम से इस मामले में आगे भी कार्यवाही जारी रखी और उसके बाद मामला मुंबई की पुलिस के हाथों छीनकर सीबीआई के हाथों में सौंप दी गई क्योंकि न्यायालय के ईमानदार जजों को लगा कि पहले इस मामले में जो कुछ हुआ था वह बहुत ही गड़बड़ हुआ था।इसे देखते हुए अब ऐसा लग रहा है कि अगर रविन्द्र पाटिल का मामले ने भी तूल पकड़ लिया तो सलमान खान जो काले हिरन के शिकार ओर हिट एंड रन के मामले के बावजूद ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे है जेल की सलाखों के पीछे दिन गुजरने को मजबूर हो जाएंगे।आइए जानते हैं कौन थे रवींद्र पाटिल और क्या था उनका सलमान खान कनेक्शन।
रविंद्र पाटील महाराष्ट्र के सतारा के निवासी थे जो एक समान परिवार से आते थे।बाद में इन्होंने मुंबई पुलिस में कांस्टेबल के पद पर योगदान दिया था।ये अभिनेता सलमान खान के पूर्व आधिकारिक पुलिस बॉडीगार्ड थे। सलमान खान के साथ उनका संबंध साल 2002 के चर्चित ‘हिट एंड रन’ केस से जुड़ा है, जिसमें पाटिल इस पूरे मामले के मुख्य चश्मदीद गवाह (Prime Witness) और शिकायतकर्ता (FIR दर्ज कराने वाले) थे।
सलमान खान को जब अंडरवर्ल्ड से धमकियां मिलने लगी तो अभिनेता सलमान ने मुंबई पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगायी। इसके बाद मुंबई ने मुंबई पुलिस ने रवींद्र पाटिल के विशेष कमांडो ट्रेनिंग लेने के कारण उन्हें सलमान खान की सुरक्षा में पुलिस बॉडीगार्ड के तौर पर तैनात किया गया था।
28 सितंबर 2002 की रात जब सलमान खान की लैंड क्रूज़र कार बांद्रा की एक बेकरी से टकराई थी।इस दुर्घटना में फुटपाथ पर सो रहे एक व्यक्ति (नूरउल्लाह महबूब शरीफ) की मौत हो गई थी और चार अन्य लोग घायल हो गए थे।तब रवींद्र पाटिल कार में ही मौजूद थे। उन्होंने ही इस मामले में पहली एफआईआर (FIR) दर्ज कराई थी।
रविन्द्र पाटिल ने अपने बयान में लगातार कहा था कि दुर्घटना के समय सलमान खान ही गाड़ी चला रहे थे और वे शराब के नशे में थे। इन्होंने उन्हें गाड़ी धीमी चलाने की चेतावनी भी दी थी, जिसे अभिनेता सलमान खान ने अनदेखा कर दिया।
मुंबई की एक सत्र अदालत ने सलमान खान को गैर इरादतन हत्या और अन्य आरोपों में दोषी मानते हुए 5 साल की जेल की सजा सुनाई थी।इस हाई-प्रोफाइल मामले के बाद रविन्द्र पाटिल को अपने बयान बदलने के लिए मानसिक और सामाजिक रूप से भारी दबाव का सामना करना पड़ा। अदालती कार्यवाहियों में अनुपस्थित रहने के कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और जेल भी जाना पड़ा। बाद में वे गंभीर रूप से ट्यूबरकुलोसिस यानि टीबी की बीमारी से ग्रस्त हो गए और 4 अक्टूबर 2007 को बेहद तंगहाली और गुमनामी की हालत में एक सरकारी अस्पताल में मात्र 30 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
मुंबई के सत्र अदालत के फैसले के बाद सलमान की तरफ से उनके वकील ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।रवींद्र पाटिल इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण और इकलौते चश्मदीद गवाह (सरकारी गवाह) थे, जो दुर्घटना के समय कार में मौजूद थे।
अभियोजन पक्ष (Prosecution) का तर्क: पाटिल ने अपनी मूल शिकायत (FIR) और शुरुआती बयानों में कहा था कि सलमान खान खुद गाड़ी चला रहे थे। उन्होंने यह भी बयान दिया था कि सलमान ने शराब पी रखी थी और उन्हें गाड़ी धीरे चलाने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन सलमान ने बात नहीं मानी।
बचाव पक्ष (Defense) का तर्क: सलमान के वकीलों ने पाटिल के बयानों को अविश्वसनीय बताया। उन्होंने तर्क दिया कि पहली एफआईआर में पाटिल ने सलमान के नशे में होने या तेज गाड़ी चलाने की बात नहीं लिखी थी, यह बातें बाद में जोड़ी गईं।
बॉम्बे हाईकोर्ट का कानूनी निष्कर्ष (दिसंबर 2015): दुर्भाग्य से, 2007 में टीबी की बीमारी के कारण रवींद्र पाटिल का निधन हो गया था। सेशंस कोर्ट ने उनके पुराने बयानों के आधार पर सलमान को सजा दी थी, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर सलमान खान को इस मामले में बरी कर दिया। कोर्ट का कहना था कि चूंकि पाटिल का निधन हो चुका था, इसलिए बचाव पक्ष को सेशंस कोर्ट में उनसे क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) करने का मौका नहीं मिल सका, जिससे उनके बयान को अकाट्य साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
साल 2015 में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही के अंतिम दौर में, सलमान खान के पारिवारिक ड्राइवर अशोक सिंह ने अचानक कोर्ट में आकर सारा दोष अपने ऊपर ले लिया था।
बचाव पक्ष (Defense) का तर्क: अशोक सिंह ने गवाही दी कि 28 सितंबर 2002 की रात गाड़ी सलमान नहीं, बल्कि वह खुद चला रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि कार का अचानक टायर फट गया था, जिससे स्टीयरिंग जाम हो गया और गाड़ी अनियंत्रित होकर फुटपाथ पर चढ़ गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे दुर्घटना के तुरंत बाद खुद पुलिस स्टेशन गए थे, लेकिन पुलिस ने उनका बयान दर्ज करने से इनकार कर दिया था।
अभियोजन पक्ष (Prosecution) का तर्क: सरकारी वकील ने अशोक सिंह को “झूठा और गढ़ा हुआ गवाह” करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर अशोक सिंह गाड़ी चला रहे थे, तो वे 13 साल तक चुप क्यों रहे और पहले किसी अन्य कानूनी एजेंसी के पास क्यों नहीं गए? अभियोजन का कहना था कि गवाहों के मुताबिक पीड़ितों के अंग कार के पहियों में फंसे थे, जबकि अशोक ने कहा कि उसने नीचे किसी को नहीं देखा।
अदालतों का रुख: मुंबई की सत्र अदालत (Sessions Court) ने अशोक सिंह की गवाही को पूरी तरह खारिज कर दिया था और उन पर कोर्ट को गुमराह करने व झूठी गवाही देने के लिए कार्यवाही करने की बात कही थी। हालांकि, बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर माना कि आपराधिक प्रक्रियाओं के तहत बचाव पक्ष के गवाह को सही समय पर पेश किया गया था, लेकिन कुल मिलाकर सबूतों की कमी (Beyond reasonable doubt) के कारण सलमान खान को बरी कर दिया गया।
वर्तमान में यह कानूनी लड़ाई रुकी नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

