आखिर अमेरिका में पीएम मोदी ने प्रेस को जो कहा वह सही है ?

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अखिलेश अखिल 

यह भी कोई कम आश्चर्य नहीं कि भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री कभी प्रेस से मिला ही नहीं हो ! आजाद भारत का यह ऐसा सच है जो जिसे इतिहास के पन्नो में  ही  दर्ज ही किया जायेगा। दर्ज हो चूका भी है। प्रधानमंत्री मोदी पहली बार 2014 में प्रधानमंत्री बने। पांच साल तक पत्रकार वार्ता से दूर ही रहे। कुछ कथित पत्रकारों ने उनसे निजी मुलाकात और बात भी की लेकिन देश और समाज की नीति से जुडी कोई भी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंची। अप्रत्यक्ष रूप से पीएम मोदी बहुत कुछ कहते रहे हैं और उनका तंत्र उनके कहे का प्रचार भी करता रहा है लेकिन वे हमेशा प्रेस का सामना करने से कतराते ही रहे हैं।  
    2019 में मोदी फिर से प्रधानमंत्री बने। बनाना ही था। बीजेपी को अपार बहुमत जो मिला था। बीजेपी का यह स्वर्णिम काल था। अगले चुनाव में बीजेपी का यह स्वर्णिम काल बरकरार रहेगा या नहीं लेकिन सच तो यही है कि काल की गति बदलती रहती है। अगर समय बदल गया तो बीजेपी की कहानी कुछ आबूर भी हो सकती है।      इस चार साल में भी पीएम  मोदी प्रेस से नहीं मिले। मोदी ने प्रेस को बौना  ही कर दिया। पहले जितना संभव था सारे प्रेस को अपने में समेत लिया और जो समेत में नहीं आया उसे कचरा में फेंक दिया। गोदी मीडिया की फ़ौज इतनी बड़ी हो गई कि पत्रकारिता का माला जपने वाले लोग या पत्रकार की पहचान ही मिटा दी गई। पत्रकारिता से जुड़े ऐसे ऐसे नाम मटियामेट हो गए जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। यह भी आजाद भारत का एक अलग सच है। यह ऐसा सच है जिस पर आने वाली पीढ़ियां सिर्फ रुदाली ही कर सकती है।      
 प्रधानमंत्री अभी तक किसी भी विदेश यात्रा में बह प्रेस वार्ता से बचते ही रहे हैं। दुनिया की मीडिया भारतीय मीडिया के बारे में सब कुछ जानती है और पीएम मोदी के काल में मीडिया पर लगे अंकुश को भी समझती है। तभी दुनिया के प्रेस इंडेक्स  में भारत का स्थान काफी  नीचे जा चुका है। कह सकते हैं कि भारत में पत्रकारिता होती  ही नहीं है। जो दिख रही है ,सब प्रायोजित है।      
 लेकिन इस बार पीएम मोदी अमेरिका में प्रेस के सामने आ गए। उनकी मज़बूरी जो थी। अमेरिका के राजकीय यात्रा पर गए पीएम मोदी को वहां राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ प्रेस के सामने आना ही था।  दो डाइस लगे थे। एक तरफ बाइडेन थे और दूसरी तरफ पीएम मोदी। सामने पत्रकारों का हुजूम। एक से एक धुरंधर  पत्रकार। न किसी का डर और न किसी का दबाव। आजाद पत्रकार के सामने पीएम मोदी की दशा को आप देख सकते हैं। सवाल शुरू हुए।        
     पीएम मोदी से अमेरिका के व्हाइट हाउस में पत्रकार ने सवाल किया कि भारत हमेशा से खुद को बड़ा लोकतंत्र कहता रहा है, लेकिन मानवाधिकार संगठन कहते हें कि आपकी सरकार ने धार्मिक रुप से अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया है। आप इस पर क्या कहना चाहेंगे ?    इसके जवाब में पीएम मोदी ने कहा कि लोग कहते नहीं बल्कि भारत लोकतांत्रिक है। भारत और अमेरिका के डीएनए में लोकतंत्र है। लोकतंत्र हमारी रगो में है, लोकतंत्र हम जीते हैं। हमने सिद्ध किया है कि डेमोक्रेसी कैन डिलीवर। जब मैं डिलीवरी की बात कहता हूं तब जाति, पंथ, धर्म किसी भी तरह के भेदभाव की वहां पर जगह नहीं होती है। भारत सबका साथ, सबका विश्वास और सबका प्रयास, उन मूलभूत सिद्धांतों को लेकर चलता है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों में कोई भेदभाव नहीं है।  
    क्या पीएम मोदी से जो सवाल किये गए थे ,पीएम मोदी ने वही जबाव दिया ? जरा सोंचिये।फिर कई और सवाल किये गए लेकिन पीएम मोदी ने हर सवाल का जवाब अपने अंदाज में दिया ! ऐसे में दुनिया  कि पीएम मोदी जो कह रहे हैं वह सही है या नहीं ?   आज ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव वाले पीएम मोदी के बयान पर निशाना साधा है। ओवैसी ने अल्पसंख्यकों के साथ हुए तीन भेदभाव गिनाए। कहा कि विदेश में प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, जबकि भारत में वे पीछे हट जाते हैं। ओवैसी ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री ने 9 साल में पहली बार सवाल लिए और उस सवाल-जवाब में उन्होंने भारत में भेदभाव न किए जाने की बात कही। मणिपुर में 300 गीरजाघरों को जला दिया गया, वह भेदभाव नहीं है? सीएए का क़ानून भेदभाव के आधार पर बना। भाजपा के पास 300 मंत्री हैं, जिसमें एक भी मुस्लिम नहीं है। यह भेदभाव की मिसालें हैं। पीएम  विदेश में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, भारत में पीछे क्यों हट जाते हैं?

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