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क्या पूर्वोत्तर के चुनाव परिणाम ने ममता को विपक्षी एकता से सतर्क कर दिया है ?

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अखिलेश अखिल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों विपक्षी एकता से दूर होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि विपक्ष को उनकी कोई जरूरत नहीं। सच तो यही है कि वह  मजबूत स्तम्भ हैं और मोदी सरकार पर हमला करने वाली ताकतवर नेता भी। लेकिन वे आज कल कांग्रेस के साथ खड़ी होने से कतरा रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर ममता चाहती क्या है ? क्या वे कोई तीसरा फ्रंट खोलना चाहती है जिसमे गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी पार्टियों की एकता बने। ऐसा संभव भी हो सकता है। या फिर ममता बनर्जी अकेले चुनाव लड़ना चाहती है जिसकी घोषणा वह पहले भी कर चुकी है। एक तीसरी बात भी सामने दिख रही है। माना जा रहा है कि ममता अभी केवल बंगाल पर फोकस करना चाहती है। उन्हें लग गया है कि बंगाल में उनकी मजबूती बनी रहेगी तो केंद्र में भी उनकी धमक रहेगी। ममता की यह सोच उत्तर पूर्व राज्यों के हालिया चुनाव परिणाम के बाद शायद बदली हो।

महीने भर पहले कई लोगो को यह लग रहा था कि ममता कही अंत में बीजेपी के साथ न चली जाए। राजनीति में यह सब होता भी रहता है। यहां कोई परमानेंट दुश्मन तो होता नहीं। लाभ -हानि के स्तर पर समझौते होते हैं और बिगड़ते भी है। फिर यह भी कहा जा रहा था कि ममता भी पीएम उम्मीदवार हो सकती हैं और विपक्षी एकता को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका बड़ी हो सकती है लेकिन इस पर उन्होंने खुद ही विराम लगा दिया।
पिछले दिनों ही उन्होंने कहा था कि वह किसी दौड़ में नहीं है और अकेले चुनाव लड़ेगी।

उन्होंने कांग्रेस और बीजेपी को एक ही तराजू में तौलने की बात भी कही थी। लेकिन बाद में जब संसद सत्र का दूसरा चरण शुरू हुआ तो वे कांग्रेस के साथ जाने से पीछे हटती चली गई। बजट सत्र के पहले चरण में ममता की पार्टी विपक्षी एकता के हर कार्यक्रम में सहभागी होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह एक बड़ा सवाल है। अडानी का मामला जब बजट सत्र के पहले चरण में आया था तो टीएमसी और कांग्रेस मिलकर एक साथ सरकार पर हमला कर रहे थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। ममता सरकार पर अभी भी हमला कर रही है लेकिन वह विपक्ष के साथ नहीं है। उनके सांसद कई दूसरे मसले पर सरकार हैं लेकिन विपक्षी एकता की बैठक में नहीं जाते।

कहा जा रहा है कि टीएमसी में यह बदलाव अचानक नहीं हुए हैं। इस बदलाव के पीछे पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के हालिया परिणाम है। ममता ने त्रिपुरा और मेघालय में कांग्रेस को पूरी तरह से तोड़कर अपनी पार्टी को मजबूत  किया था। टीएमसी को यह उम्मीद थी कि इन तीन राज्यों के चुनाव में उन्हें काफी बेहतर परिणाम मिलेंगे। मेघालय में तो उसे सरकार बनाने की भी उम्मीद थी। त्रिपुरा में भी कुछ ऐसी ही आशाएं जगी थी। लेकिन मिला कुछ भी नहीं। मेघालय में टीएमसी को पांच विधायक मिले और इतने ही विधायक कांग्रेस के भी जीत सके। जानकार मानते हैं कि ममता को इस परिणाम से बड़ा धक्का लगा है। ममता सोचने को मजबूर हुई है। अब ममता सिर्फ बंगाल पर फोकस करना चाहती है ताकि 42 सीटों में से अधिक सीटों पर टीएमसी की जीत हो सके। इसके लिए जरुरी है कि बीजेपी और कांग्रेस दूरी दिखाएं। कहा जा रहा है कि अगर बंगाल में बीजेपी ,टीएमसी और कांग्रेस -लेफ्ट के बीच त्रिकोणीय लड़ाई होती है तो ममता को बड़ा लाभ होगा। ममता इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। ममता की यह रणनीति कारगर होती है ,इसे देखने की जरूरत होगी।

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