ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच युद्ध की स्थितियों की वजह से भारत जैसे देशों में LPG की किल्लत देखने को मिली। इस दौरान LPG के तमाम विकल्प खबरों में रहे। इंडक्शन या इंफ्रारेड चूल्हे को लोगों ने हाथों-हाथ लिया, तो वहीं प्लाजमा चूल्हा और हाइड्रोजन स्टोव जैसी तकनीक की भी बात होती रही। हालांकि प्लाजमा या हाइड्रोजन चूल्हे प्रैक्टिकल नहीं थे, जिस वजह से उन्हें बड़े स्तर पर अपनाया नहीं जा सकता था। हालांकि इस बीच एक नई तकनीक पर आधारित ईंधन उम्मीद बनकर उभरा है, जो कि न सिर्फ प्रैक्टिकल है बल्कि मौजूदा गैस-सिलेंडर वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में पूरी तरह से फिट भी हो जाता है।
दरअसल हम बात कर रहे हैं DME यानी कि Dimethyl Ether की, जिसे कि वैज्ञानिक भविष्य का ईंधन बता रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार DME भविष्य में रसोई गैस की निर्भरता को पूरी तरह बदल सकता है। जहां प्लाज्मा और हाइड्रोजन तकनीक आम आदमी की पहुंच और जेब से बाहर नजर आती हैं, वहीं DME भविष्य की ऐसी तकनीक साबित हो सकती है, जो चूल्हे-सिलेंडर वाले किचन सेटअप में आराम से फि हो जाए।
इसे लेकर CSIR-राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान संस्थान ने X पर एक पोस्ट किया है और बताया है कि उनके शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया यह ईंधन LPG जैसा व्यवहार करता है और इसे हवा में मौजूद प्रदूषणकारी धुएं और कचरे यानी कि बायोमास से तैयार किया जा सकता है। यह ईंधन काफी अच्छी तरह से भारतीय रसोई के सेटअप में समा सकता है और साथ ही ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भर होने की दिशा में बड़ी छलांग साबित हो सकता है।
DME यानी कि Dimethyl Ether ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसे वैज्ञानिक भविष्य का ईंधन मान रहे हैं। आसान भाषा में कहें, तो यह एक सिंथेटिक गैस है जो काफी हद तक LPG की तरह काम करती है। हालांकि यह पर्यावरण के लिए LPG से ज्यादा बेहतर है। दरअसल DME की सबसे बड़ी खासियत इसका सोर्स है। हम सब जानते हैं कि LPG को जमीन के नीचे से निकाला जाता है और यह जीवाश्म ईंधन होता है। वहीं DME आसपास मौजूद कूड़े-कचरे, खेती के अवशेष जैसे कि पराली और कारखानों के धुएं से लैब में तैयार कर सकते हैं।
DME को LPG का विकल्प इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह तकनीक और इस्तेमाल के मामले मे LPG से काफी मेल खाती है।
DME की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे इस्तेमाल करने के लिए आपको बाकी चूल्हों की तरह अपना पुराना गैस चूल्हा, पाइप या सिलेंडर बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। यह मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर में आराम से फिट हो जाता है।
LPG के लिए हम विदेशों पर निर्भर हैं लेकिन DME को अपने ही देश में कोयले, कचरे और पराली से बना सकते हैं। इससे लागत भी काफी कम हो जाती है।
LPG के मुकाबले DME बिलकुल भी कालिख या जहरीला धुआं पैदा नहीं करती। यह इतना स्वच्छ ईंधन है कि बर्तन तक काले नहीं पड़ते।
DME की एक और खासियत है कि इसे भी लिक्विड अवस्था में सिलेंडर में भरा जा सकता है। इससे लोगों की रसोई का मौजूदा सेटअप भी न हीं बदलता है।
DME टेक्नोलॉजी भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर भी बना सकती है। दुनिया में युद्ध जैसे हालातों या तनाव आदि के बीच DME तकनीक विदेशी निर्भरता को खत्म करने का सबसे बड़ा जरिया बन सकती है। इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचती है।
CSIR-NIScPR के अनुसार इसकी शुरुआत मिक्सिंग के तौर पर हो सकती है। दरअसल, मौजूदा LPG सिलेंडरों में बिना किसी तकनीक को बदले 20% तक DME मिलाया जा सकता है। ऐसे में न चूल्हा बदलेगा और न ही सिलेंडर, लेकिन देश की विदेशी गैस पर निर्भरता तुरंत 20% कम हो जाएगी।
DME तकनीक को बनाने में कचरे की भी मुख्य भूमिका होती है, ऐसे में शहरों का कूड़ा और गांवों की पराली, जो आमतौर पर प्रदूषण का कारण बनते हैं, उन्हें इस तकनीक के जरिए कीमती ईंधन में बदला जा सकता है। इसके अलावा देश में तैयार होने की वजह से इसके लॉजिस्टिक्स और इम्पोर्ट का खर्चा भी बचता है। इससे आम आदमी को गैस की कीमतों में राहत भी देना संभव हो सकता है।

