प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा संसद में विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण संशोधन (नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम) 17 अप्रैल को पारित नहीं हो सका और गिर गया। इससे पूर्व 16 अप्रैल और 17 अप्रैल को सत्ता पक्ष और विपक्ष के द्वारा इस पर चर्चा की गई। इस दौरान विपक्ष सत्ता पक्ष पर कड़े आप लगातार और सत्ता पक्ष उसका जवाब देने में लगा रहा। प्रधानमंत्री तक इस मामले को लेकर बाबू को गए और विपक्षी राजनीतिक दलों से यहां तक कह दिया कि आप नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को पास करवा दीजिए मैं इसका सारा क्रेडिट आप लोगों को ही दे दूंगा।सरकारी खजाने से पैसा खर्च कर विज्ञापन छपवा दूंगा। तो वहीं दूसरी तरफ नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सत्ताधारी पार्टियों को खूब खरीद सुने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जादूगर तक कह दिया और एक प्रकार से चुनौती दे डाली कि किसी भी हालत में वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को इस रूप में महिला आरक्षण संशोधन यानी नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को पारित नहीं होने देंगे और इसके बाद जब सदन में इस मामले को लेकर मत विभाजन हुआ तो राहुल गांधी की कहानी बातें सत्य हो गई और नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इसके पक्ष में दो तिहाई बहुमत न जुटा पाने के कारण लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित नहीं हो सका।
इसके बाद शुरू हो गया इसे लेकर महासंग्राम। बीजेपी के महिला सांसदों के नेतृत्व में एनडीए की महिला सांसदो ने संसद परिसर में महिलाओं को संसद में उनका हक नहीं मिलने देने को लेकर विपक्ष को घेरते हुए प्रदर्शन करना शुरू कर दिया तो विपक्ष की तरफ से राहुल गांधी ने मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन की आड़ में परिसीमन का सहारा लेकर दक्षिण के प्रदेशों की संसद में हकमारी और एससी एसटी तथा ओबीसी के साथ छलावा करने का आरोप लगाते हुए कई ट्वीट कर दिए। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने नरेंद्र मोदी की सरकार पर मुसलमान महिलाओं की हकमारी का सवाल उठा दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि इस राजनीतिक महासंग्राम में आखिर जीत किसकी हुई? क्या नेता विपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व वाली विपक्षी गठबंधन जिसने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को पारित नहीं होने दिया उनकी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी दल की जो इस नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम के गिर जाने की स्थिति में विपक्ष को महिलाओं के को विभाजन होने की बात कर रहे थे उनकी?
बात संसद में महिला आरक्षण यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के दृष्टिकोण से करें तो 17 अप्रैल को लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम के गिर जाने के बावजूद ना तो राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की और ना ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन की जीत या हार हुई है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम के लोकसभा से पारित नहीं होने के बावजूद 2023 ईस्वी में संसद के दोनों सदनों से पारित और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा हस्ताक्षरित होने के बाद 17 अप्रैल 2026 में इसका नोटिफिकेशन हो जाने के बाद यह अभी भी पूर्ण रूप में अक्षुण्ण है। अंतर इतना ही हुआ कि अब यह 2029 के आम चुनाव से लागू नहीं होकर 2034 के बाद होने वाले आम चुनाव से लागू होगा।
राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को भले ही इस बात में अपनी जीत नजर आती हो कि उसने नरेंद्र मोदी की करिश्माई चाल को पकड़ लिया है और पहली दफा नरेंद्र मोदी को पर्याप्त बहुमत नहीं रहने पर भी किसी अधिनियम को ऐसे करिश्मा के बल पर पास कर लेने से रोक दिया है। अब इस ज्ञान के बल पर वह बार-बार नरेंद्र मोदी को संसद में परास्त करते रहेंगे। लेकिन इसके बावजूद 2023 ईस्वी में कानून का रूप ले चुका नारी शक्ति वंदन अधिनियम जिसका नोटिफिकेशन 17 अप्रैल को हो गया वह जब 2034 के बाद होने वाले आम चुनाव में लागू होगा,तो वह परिसीमन के बाद ही होगा और तब और तब भी इसमें महिलाओं का जाति के आधार पर कोई वर्गीकरण नहीं होगा सिर्फ एससी एसटी की महिलाओं को इसमें क्षैतिज आरक्षण का लाभ मिलेगा। हां इसके बहाने उन लोगों ने ओबीसी को और दक्षिण भारतीय लोगों को अपने पक्ष में करने का जो प्रयास किया है , वह अगर सफल होता है तब भले ही इनका यह प्रयास इनकी जीत कहलाएगी। और इस बात की परीक्षा भी अभी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में हो जाएगा। इस दो राज्यों के चुनाव में अगर विपक्षी गठबंधन को पहले की अपेक्षा इन वर्गों का ज्यादा मत प्राप्त होता है तब तो यह उनकी जीत मानी जाएगी अन्यथा यह माना जाएगा की नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम जिसे इन लोगों ने लोकसभा में पारित नहीं होने दिया उसमें ये जीत कर भी हार गए।
अब बात नरेंद्र मोदी की अगवाई वाली सत्ताधारी गठबंधन की कर लेते हैं जो इससे पूर्व तक कई अवसरों पर सदन में पर्याप्त बहुमत नहीं रहने पर भी भावुकता पूर्ण भाषणों और अपने चमत्कारिक क्रियाकलापों से विपक्षी गठबंधनों में सेंधमारी कर अधिनियम को पारित करवा लेते थे, लेकिन इस बार नारी वंदन संशोधन अधिनियम पारित करवाने के मामले में ना तो उनकी भावुकता काम आई और नहीं कोई चमत्कार कर पाए। ऐसा नहीं था नरेंद्र मोदी या अमित शाह इस बात समझ नहीं पा रहे थे। वे भी इस बात को जानते थे कि उनके पास बहुमत का पर्याप्त आंकड़ा नहीं है और ऐसे में यह नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम संसद में पारित नहीं हो सकेगा। लेकिन इसके बावजूद अगर उन्होंने इस अधिनियम को लाने के लिए हिमाकत की थी तो उसके पीछे भी एक बड़ा चाल छिपा हुआ था। और छिपा हुआ क्या यह तो जब लोकसभा में नारी शक्ति बंधन संशोधन अधिनियम पर बहस चल रहा था तब नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत बीजेपी के कई नेताओं ने राहुल गांधी और विपक्ष के नेताओं को खुलकर इस बात की चेतावनी थी अगर उन लोगों ने इस अधिनियम को पारित करने में मदद नहीं की तो उन्हें महिलाओं का कोपभाजन होना पड़ेगा। यानी अंदर ही अंदर उनकी यह चाल थी कि इस अधिनियम के अंतर्गत परिसीमन के बहाने वे उत्तर के राज्यों में जहां बीजेपी की पकड़ है, वहां आनुपातिक रूप से सांसदों की संख्या बढ़ा लेंगे ताकि 2029 में होने वाले आम चुनाव में अगर दक्षिण के राज्यों में इन्हें हमेशा की तरह कम ही सीटों पर सफलता मिली,तो भी उत्तर के राज्यों बढ़े हुए सीटों के आधार पर ये केंद्र की सत्ता पर काबिज हो जायेंगे। और अगर यह नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम सदन में पारित नहीं हो सका तो भी विपक्ष पर महिलाओं के हितों के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाकर यह महिलाओं में अपनी पकड़ को और मजबूत कर लेंगे जिससे 2029 ई के चुनाव में या इससे पूर्व हो रहे विभिन्न राज्यों के चुनाव में इन्हें राजनीतिक मजबूती मिल जाएगी। वैसे भी बीजेपी के सांसदों या विधायकों की जीत में महिलाओं का बड़ा योगदान रहता है और यह भी महिलाओं को अपने पक्ष में करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन अपनी योजनाओं के माध्यम से देते रहते हैं। यानी कुल मिलाकर बीजेपी को को इस नारी शक्ति बंधन अधिनियम के पारित हो जाने या गिर जाने दोनों ही स्थिति में लाभ ही लाभ नजर आ रहा था हां पारित होने की स्थिति में दोहरा लाभ होता जो अब सिर्फ महिलाओं के समर्थन के रूप में इकहरा लाभ होकर ही रह गया। हालांकि पश्चिम बंगाल के चुनाव में महिलाओं के समर्थन से मिलने वाला लाभ इन्हें विधायकों के जीत के रूप में मिल पाएगा या नहीं क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी की पकड़ महिलाओं के साथ-साथ मुसलमान और अन्य वर्गों पर भी काफी अच्छी है। इसके अलावा अगर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की महिलाओं को इस बात की भनक लग गई की महिला वोटरों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के उद्देश्य मात्र से नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए गठबंधन ने इस नई शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को लाया है तो जिस प्रकार से 2021 में हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में दीदी तो दीदी जैसे वाक्यांशों का प्रयोग नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार किए जाने से महिलाओं ने इसे अपना अपमान समझा था और बीजेपी से किनारा कर लिया था, वैसा ही कहीं इस बार भी ना हो जाए।

