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अब चुनाव आयोग पर पड़ी मोदी सरकार की टेढ़ी नजर, सरकार ने राज्यसभा में पेश किया विधेयक

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विकास कुमार
मोदी सरकार ने एकतरफा फैसला ले लिया है,देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म किए जाने की कोशिश हो रही है। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सीजेआई की भूमिका खत्म किए जाने को लेकर मोदी सरकार ने राज्यसभा में एक विधेयक पेश किया है। हालांकि, विधेयक के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी उपलब्ध नहीं है,लेकिन कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री के हाथों की कठपुतली बनाने की कोशिश हो रही है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, इस फैसले का मकसद मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाना था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि इनकी नियुक्तियां पीएम, विपक्ष के नेता और सीजेआई की सदस्यता वाली एक समिति करेगी। इस समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाएगी। न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ये फैसला दिया था।

वहीं कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में बदलाव का हर मंच पर विरोध करेगी। कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने यह आरोप लगाया है कि यह कदम निर्वाचन आयोग को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों की कठपुतली बनाने का प्रयास है,वेणुगोपाल ने कहा कि यह चुनाव आयोग को पूरी तरह से प्रधानमंत्री के हाथों की कठपुतली बनाने का खुला प्रयास है। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले का क्या, जिसमें एक निष्पक्ष आयोग की आवश्यकता की बात की गई है। प्रधानमंत्री को पक्षपाती चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है?। यह एक असंवैधानिक, मनमाना और अनुचित विधेयक है,हम हर मंच पर इसका विरोध करेंगे।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उनके नियुक्ति के पहले के प्रावधान को कायम रखा जाना चाहिए। क्योंकि प्रधानमंत्री,लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई अगर मिलकर किसी का नाम तय करेंगे तो इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पवित्रता कायम रहेगी। अगर चुनाव आयोग निष्पक्ष होकर काम करेगा तभी भारत में लोकतंत्र जीवित रह सकता है।

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