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संत रविदास मंदिर के बहाने दलितों को साध रही है बीजेपी, मध्य प्रदेश में 119 सीटों पर हार-जीत तय करते हैं दलित वोटर

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विकास कुमार
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। 2023 के नवंबर महीने में मध्य प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हो सकते हैं। इसलिए एक बार फिर से सत्ता में वापसी के लिए बीजेपी ने कमर कस लिया है। सबसे पहले बीजेपी ने दलितों को रिझाने में ताकत झोंकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश में दलित आइकन संत रविदास को समर्पित एक मंदिर की आधारशिला रखी है। भारत के महान संत रविदास के मंदिर के निर्माण में एक सौ करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। साथ ही बीजेपी ने मध्य प्रदेश में संत रविदास समरसता यात्रा भी निकाली है। यह यात्रा मध्य प्रदेश के 52 में से 46 जिलों से होकर गुजरी है। मंदिर निर्माण और यात्रा के जरिए बीजेपी अनुसूचित जाति के वोटरों तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। वहीं विपक्षी कांग्रेस इसे 16 फीसदी दलित वोटरों को साधने की बीजेपी की चाल बता रही है।

मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजे तय करने में दलित वोटरों की अहम भूमिका रही है। मध्यप्रदेश में कुल आबादी का 15 दशमलव 6 फीसदी अनुसूचित जाति का है। यानी प्रदेश में कुल 1 करोड़ ,13 लाख , 42 हजार दलित आबादी हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा की दो सौ तीस में से 35 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल और विंध्य क्षेत्रों में दलित वोटरों की निर्णायक भूमिका है। 2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इन क्षेत्रों में 80 फीसदी से ज्यादा सीटों पर कब्जा किया था।

बीजेपी ने एससी-आरक्षित सीटों में से 28 पर जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस ने केवल चार सीटें जीतीं थी,लेकिन 2018 के चुनावों में कांग्रेस इन आरक्षित सीटों में से 17 सीट जीतने में कामयाब रही थी। जबकि बीजेपी के खाते में 18 सीटें आई थी। दलितों की सियासी ताकत को देखते हुए उन्हें रिझाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी अपनी तरफ से पूरा जोर लगा रही है। मध्य प्रदेश में 35 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं। वहीं दौ सौ 30 विधानसभा सीटों में से 84 सीटों पर दलित वोटर ही जीत-हार तय करते हैं। इसलिए बीजेपी संत रविदास के मंदिर का निर्माण कर दलित वोटरों के दिलों में जगह बनाना चाहती है। अब रविदास मंदिर के निर्माण से बीजेपी को कितना सियासी फायदा मिलेगा। ये तो चुनाव के नतीजों से ही पता चलेगा।

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