अखिलेश अखिल
देश की राजनीति अब वैसी नहीं रही जिसकी कल्पना आजादी के समय की गई थी। तब तो यही माना गया था कि जनता की सेवा करने निकले नेता , सांसद और विधायक सदन में बैठकर लोगो के कल्याण की बात करेंगे ,नीति बनाएंगे और देश का विकास करेंगे। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। देश की संसद और विधान सभाएं अपराधियों ,दागियों से भरने लगी। जिन लोगो के खिलाफ कार्रवाई की जानी थी वैसे ही लोग नेता बनते गए। आज तक यही सिलसिला जारी है।
संसदीय राजनीति करने वाले अधिकतर नेताओं पर कोई न कोई मुकदमा दर्ज है। इस मामले में सबसे ज्यादा मुक़दमे वाम दलों के नेताओं पर हैं। वजह है जनता की समस्या और जनता के अधिकार को लेकर वाम दलों के नेता सबसे ज्यादा आगे रहते हैं। सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं और परिणाम उनके ऊपर दर्ज मुक़दमे के रूप में सामने आता है। हाल के वर्षों में देश के कई इलाकों में जिस तरह धर्म और जाति के नाम पर खेल होते दिख रहे हैं इसमें भी बड़ी संख्या में नेताओं पर मुक़दमे दर्ज हो रहे हैं। कई नेताओं पर चुनाव के दौरान दिए गए भाषण भी मुक़दमे के कारण बनते हैं। यही हाल कांग्रेस ,बीजेपी और अन्य दलों के नेताओं का भी है जो जनता की मांग को लेकर मुक़दमे के शिकार हो जाते हैं। खासकर जबसे देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का विस्तार हुआ है और राज्यों में उसकी शक्ति बढ़ी है ,राजनीतिक मुक़दमे ज्यादा बढ़ते गए हैं।
हालांकि इस बारे में अभी तक कोई साफ़ खाका सामने नहीं है कि कितने फीसदी नेता राजनीतिक मुक़दमे के शिकार है लेकिन माना जा रहा है कि 30 से 35 फीसदी देश के नेता राजनीतिक साजिश के तहत मुकदमों के जाल में फसे हैं। राजनीतिक साजिश के शिकार नेताओं की कहानी को यहां आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है लेकिन यह तय है कि नेता राजनीतिक मुकदमों के शिकार होते हैं लेकिन उससे भी बड़ा सच ये है कि राजनीति का अपराधीकरण तेजी से होता जा रहा है।
ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या राजनीति वाकई गुंडों का खेल है? लोकसभा से लेकर विधान सभाओं में दागी नेताओं की भरमार है तो राज्यसभा और विधान परिषद में करोड़पतियों और धनकुबेर व्यापारियों का अधिपत्य। दागी नेता हमारे लिए कानून बना रहे हैं तो करोड़पति नेता हमारे आर्थिक विकास की नीतियां बनाते हैं। गजब का तमाशा है। इसे हम लोकतंत्र कहिये या फिर दागी तंत्र या धनकुबेर तंत्र। सच यही है मौजूदा राजनीति लोकतंत्र को चिढ़ा रही है और दागी-धनकुबेर नेताओं की वजह से लोकतंत्र हांफ रहा है।
पहले के जमाने में डाकुओं के गिरोह होते थे। मिलकर ये सब अपने टारगेट को लूटते थे। लेकिन अब राजनीति के दम पर वही खेल जारी है। देश की राजनीतिक पार्टियां गिरोह में बदल गई है। देश में शायद ही कोई दल हो जो यह दावा कर सके कि उसका दामन पूरी तरह साफ़ है। धर्म के नाम पर राजनीति करने वाला दल भी दागियों, अपराधियों को अपने पाले में किये हुए है। और शायद सबसे ज़्यादा।
आज का सच यही है कि लोकतंत्र का हम कितना भी गुणगान करते रहे लेकिन गुंडई करने वालो से लेकर चोरी ,हत्या,बलात्कार ,ठगी और डकैती के आरोपी भारत की छाती को रौंद रहे हैं और लोकतंत्र को कलंकित किये हुए हैं। ऐसे में भारत का लोकतंत्र किसी प्रहसन से कम नहीं है।
2019 के लोकसभ चुनाव परिणाम को ही देखें तो आँखे फटी रह जाती है। कुल 542 सांसद चुनकर संसद में पहुंचे। इनमे से 233 सांसद दागी पाए गए हैं। यानी कि मौजूदा सदन में करीब 43 फीसदी सांसद किसी न किसी अपराध के आरोपी हैं और इनमे 159 सांसद ऐसे हैं जिनपर गंभीर आरोप हैं। इनपर डकैती, बलात्कार, हत्या और हत्या के प्रयास के आरोप हैं। यहां यह भी बता दें कि चूंकि मौजूदा सदन में एनडीए के 353 सांसद हैं, जाहिर है कि बीजेपी और एनडीए के सबसे ज्यादा सांसद दागी हैं। बाकी दलों की बात कौन करें। बीजेपी चूंकि शुचिता, देशभक्ति और अहिंसा की बात ज्यादा करती है लेकिन चुनाव में दागियों से उसे कोई परहेज नहीं।
ऐसा नहीं है कि दागी नेताओं की उपस्थिति कोई पहली बार मौजूदा लोकसभा में हुई है। पिछले 2014 और 2009 के चुनाव का भी अध्ययन करें तो यही सब देखने को मिलता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में 185 दागी नेता चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे थे। इनमे 112 सांसदों पर हत्या, बलात्कार और हत्या के प्रयास के कई और गंभीर आरोप लगे थे। यानी कुल 34 फीसदी दागी नेता हमारे लोकतंत्र की शोभा बढ़ा रहे थे। 2009 के चुनाव में 162 अपराधी किस्म के नेता चुनाव जितने में सफल हुए थे। इनमें से 76 नेताओं पर गंभीर आरोप थे। इस तरह से 2009 दागी नेताओं का प्रतिशत करीब 30 फीसदी था। इस तरह इन तीन लोकसभा चुनाव को ही देखें तो साफ़ हो जाता है कि दागियों की संख्या लोकसभ में लगातार बढ़ती जा रही है। 2009 में दागियों की संख्या जहां 30 फीसदी थी वही 2014 के चुनाव में यह बढ़कर 34 फीसदी हो गई और 2019 के चुनाव में यह रिकॉर्ड पार करते हुए 43 फीसदी पर पहुँच गई। ऐसे में तो यह भी कहा जा सकता है कि संसद में दागियों के लिए करीब 33 फीसदी सीटों का आरक्षण लागू है। महिलाओं को आज तक संसदीय चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण नहीं मिल पाया लेकिन दागियों के लिए सभी दलों ने मौन होकर ही 33 फीसदी का आरक्षण तय कर रखा है।
